Tata Harrier EV में बार-बार खराबी के मामले में हैदराबाद उपभोक्ता आयोग ने वाहन वापस लेकर 10% मूल्यह्रास के बाद रकम लौटाने का आदेश दिया।
Tata Harrier EV: टाटा हैरियर ईवी में बार-बार आई तकनीकी दिक्कतों के मामले में हैदराबाद जिला उपभोक्ता आयोग ने खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने टाटा सेलेक्ट मोटर्स को वाहन वापस लेने और निर्धारित मूल्यह्रास की कटौती के बाद रकम लौटाने का निर्देश दिया है। साथ ही खरीदार को मानसिक परेशानी और मामले में हुए खर्च के लिए कुल 65,000 रुपये देने का भी आदेश दिया गया है।
यह आदेश 7 सितंबर 2026 को पारित किया गया। मामले में वाहन की स्मार्ट-की, सेंट्रल लॉकिंग और स्टार्ट होने से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया गया था।
27.98 लाख रुपये में खरीदी गई थी Tata Harrier EV
आयोग के समक्ष दायर शिकायत के मुताबिक, साझेदारी फर्म मेसर्स रेफ्रिजरेशन इक्विपमेंट एंड सॉल्यूशंस ने 1 अगस्त 2025 को टाटा सेलेक्ट मोटर्स से Tata Harrier EV Empowered + 75 APC खरीदी थी। वाहन की कीमत करीब 27.98 लाख रुपये थी और खरीद के लिए कुछ राशि का भुगतान ऋण के माध्यम से किया गया था। शिकायतकर्ता पवन बागरेचा के अनुसार, कार मिलने के कुछ ही दिनों बाद उसमें तकनीकी समस्याएं सामने आने लगीं।
स्मार्ट-की और सेंट्रल लॉकिंग में आई बार-बार खराबी
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वाहन कई बार स्टार्ट नहीं हुआ। इसके अलावा स्मार्ट-की कनेक्टिविटी और सेंट्रल लॉकिंग सिस्टम में भी परेशानी आती रही।
दावे के मुताबिक, करीब एक महीने के भीतर चार बार ऐसी समस्या सामने आई और एक मौके पर वाहन बीच रास्ते में भी रुक गया। शुरुआती तौर पर डीलर ने समस्या को सॉफ्टवेयर से जुड़ी गड़बड़ी बताया।
समस्या दोबारा सामने आने के बाद ग्राहक ने वाहन बदलने की मांग की। शिकायतकर्ता का कहना था कि मरम्मत और सर्विस के बावजूद दिक्कत पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
ग्राहक ने कितने रुपये के मुआवजे की मांग की थी?
उपभोक्ता आयोग में शिकायतकर्ता ने वाहन की रकम के साथ मानसिक परेशानी और कथित उत्पीड़न के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा मांगा था। इसके अलावा कथित लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए 10 लाख रुपये दंडात्मक हर्जाने की भी मांग की गई थी।
वहीं, डीलर ने सेवा में कमी के आरोपों को खारिज किया। उसका कहना था कि किसी विशेषज्ञ या ऑटोमोबाइल इंजीनियर की रिपोर्ट से वाहन में निर्माण संबंधी दोष साबित नहीं हुआ है।
डीलर ने क्या दलील दी?
डीलर ने आयोग को बताया कि वह केवल अधिकृत बिक्री और सर्विस सेंटर है। उसने यह भी कहा कि वाहन निर्माता को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था।
डीलर के मुताबिक, शिकायत मिलने के बाद उसने आवश्यक कार्रवाई की। सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए समस्या को ठीक करने की कोशिश की गई और वारंटी के तहत लॉक भी बदला गया।
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आयोग ने सर्विस रिकॉर्ड और जॉब कार्ड की जांच की
आयोग की पीठ ने दोनों पक्षों की ओर से पेश किए गए दस्तावेज, बातचीत, जॉब कार्ड और वाहन के सर्विस रिकॉर्ड का परीक्षण किया।
आयोग ने पाया कि वाहन खरीदने के कुछ समय बाद ही स्मार्ट-की और सेंट्रल लॉकिंग से संबंधित शिकायतें दर्ज की गई थीं। रिकॉर्ड में वाहन के लॉक या अनलॉक न होने और स्टार्ट करने में परेशानी जैसी शिकायतें भी दर्ज थीं।
आयोग ने यह भी माना कि सर्विस कराने के बावजूद समस्या दोबारा सामने आई और वाहन के बीच रास्ते में रुकने की बात भी रिकॉर्ड से सामने आती है।
आयोग ने सेवा में कमी मानी
आयोग के अनुसार, उपलब्ध दस्तावेजों और सर्विस हिस्ट्री से यह साबित होता है कि शिकायतकर्ता की बताई गई समस्याएं लगातार बनी रहीं। ऐसे में सेवा में कमी के सवाल पर फैसला ग्राहक के पक्ष में गया।
आयोग ने विशेषज्ञ रिपोर्ट की जरूरत को भी इस मामले में आवश्यक नहीं माना, क्योंकि डीलर और शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए सर्विस रिकॉर्ड ही वाहन में बार-बार सामने आई समस्याओं की पुष्टि कर रहे थे।
10 प्रतिशत मूल्यह्रास काटकर रकम लौटाने का आदेश
आयोग ने डीलर को वाहन वापस लेने और उसकी कीमत में 10 प्रतिशत मूल्यह्रास काटकर शेष रकम ग्राहक को वापस करने का निर्देश दिया।
आदेश के अनुसार, गणना के लिए 26,64,761.90 रुपये की राशि को आधार बनाया गया है। इसमें से 10 प्रतिशत मूल्यह्रास की कटौती के बाद बची राशि खरीदार को लौटानी होगी।
इसके अलावा आयोग ने मानसिक परेशानी और आर्थिक कठिनाई के लिए 50,000 रुपये मुआवजा तथा मामले में हुए खर्च के तौर पर 15,000 रुपये देने का आदेश दिया।
10 लाख रुपये का दंडात्मक हर्जाना नहीं मिला
ग्राहक की ओर से मांगे गए 10 लाख रुपये के दंडात्मक हर्जाने को आयोग ने मंजूर नहीं किया। आयोग ने माना कि मुआवजा उचित और न्यायसंगत होना चाहिए तथा इसका उद्देश्य अनुचित रूप से लाभ पहुंचाना नहीं है। इस तरह ग्राहक को कुल 65,000 रुपये अतिरिक्त मुआवजा और खर्च के रूप में देने का आदेश दिया गया है।
45 दिनों में करना होगा आदेश का पालन
आयोग ने डीलर को आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करने के निर्देश दिए हैं। यदि निर्धारित अवधि में रकम वापस नहीं की जाती है, तो आदेश की तारीख से वास्तविक भुगतान तक वापसी राशि पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज लागू होगा।
यह मामला नई कार में बार-बार आने वाली तकनीकी समस्याओं और उपभोक्ता के सेवा अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

