तेजी से पिघलते हिमालयी ग्लेशियरों से एशिया के 2 अरब लोगों की जल सुरक्षा पर संकट, ‘पीक वाटर’ का खतरा बढ़ा।
हिमालयी क्षेत्र में तेजी से घटते ग्लेशियरों ने एशिया की जल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण हिमालय आने वाले दशकों में ‘पीक वाटर’ की स्थिति की ओर बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि एक समय के बाद ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों में पानी की मात्रा बढ़ने के बजाय लगातार कम होने लगेगी।
हिमालय को एशिया का प्रमुख जल स्रोत माना जाता है। यहां से निकलने वाली नदियां भारत समेत कई एशियाई देशों में करोड़ों लोगों की पेयजल, कृषि और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती हैं। ऐसे में ग्लेशियरों के सिकुड़ने का असर सिर्फ पर्वतीय इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी जल संकट बढ़ सकता है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से बढ़ रहा खतरा
अध्ययन के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पिछले कुछ दशकों में तेज हुई है। ग्लेशियरों के पीछे हटने के बाद कई जगहों पर हिमनदी झीलें बन रही हैं। इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने पर अचानक बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा पैदा हो सकता है।
ऐसी झीलें अक्सर अस्थिर बर्फ, मलबे और चट्टानों से घिरी होती हैं। इनके टूटने की स्थिति में नीचे की घाटियों में रहने वाली आबादी को अचानक बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है।
भारत में सैकड़ों हिमनदी झीलें जोखिम में
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 200 हिमनदी झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें से लगभग 56 झीलों को बेहद उच्च जोखिम वाला माना गया है। इन झीलों के आसपास और निचले क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए अचानक आने वाली बाढ़ गंभीर खतरा बन सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्लेशियरों की निगरानी और जोखिम वाली झीलों की लगातार जांच आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण होगी।
हिमालय में तेजी से घट रहा ग्लेशियर क्षेत्र
काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्ट के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत के मुकाबले ग्लेशियरों के पिघलने की गति काफी बढ़ गई है।
1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र के कुल ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा कम हुआ। प्रमुख नदी घाटियों में भी ग्लेशियरों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा बेसिन के ग्लेशियरों में करीब 21 प्रतिशत, ब्रह्मपुत्र बेसिन में 16 प्रतिशत और सिंधु बेसिन में लगभग 6 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई।
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बर्फबारी में कमी से बढ़ रही परेशानी
ग्लेशियरों के लिए केवल मौजूदा बर्फ का पिघलना ही चिंता का विषय नहीं है। तापमान बढ़ने के कारण नई बर्फ जमने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
ICIMOD के विश्लेषण के अनुसार, 2025-26 के दौरान हिमालय में बर्फ की स्थिरता ऐतिहासिक औसत से करीब 27.8 प्रतिशत कम रही। यह दो दशक से अधिक समय में दर्ज किए गए सबसे निचले स्तरों में शामिल है।
बर्फ की स्थिरता का मतलब है कि जमीन पर गिरने के बाद बर्फ कितने समय तक बिना पिघले बनी रहती है। इसमें कमी का सीधा असर ग्लेशियरों के पुनर्भरण पर पड़ सकता है।
‘पीक वाटर’ के बाद क्या होगा?
ग्लेशियरों के पिघलने से शुरुआती दौर में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। लेकिन जब ग्लेशियर लगातार छोटे होते जाते हैं, तो एक समय ऐसा आता है जब पानी का प्रवाह अपने चरम पर पहुंचकर घटने लगता है। इसी स्थिति को ‘पीक वाटर’ कहा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय के कई हिस्से इस महत्वपूर्ण बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं। इसके बाद कृषि, पेयजल, जलविद्युत और उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु पर भी असर
हिमालय से निकलने वाली गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदियां करोड़ों लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। इन नदियों के जल प्रवाह में दीर्घकालिक कमी का असर कृषि उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
ग्लेशियरों के सिकुड़ने के साथ ही मानसून में बदलाव और बढ़ते तापमान जैसी परिस्थितियां जल प्रबंधन को और चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं।
हिमालय भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम
हिमालय केवल जल संसाधन का स्रोत नहीं है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र कृषि, जलविद्युत, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा हुआ है।
रिपोर्ट में हिमालय को भारत के आर्थिक ढांचे का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। साथ ही, पर्वतीय क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील है। भूस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं का खतरा जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ सकता है।
जल सुरक्षा के लिए बढ़ानी होगी निगरानी
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों और हिमनदी झीलों की निगरानी को मजबूत करना आने वाले समय की बड़ी जरूरत है। बेहतर सैटेलाइट निगरानी, जमीनी स्तर पर डेटा संग्रह, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन की बेहतर तैयारी से जोखिम को कम किया जा सकता है।
हिमालयी ग्लेशियरों का लगातार पिघलना केवल पर्यावरणीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह एशिया की दीर्घकालिक जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। इसलिए ग्लेशियरों के संरक्षण और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर तत्काल ध्यान देना जरूरी होगा।

