यशवंत सिन्हा ने BRICS समिट की सफलता और मोदी सरकार की विदेश नीति की तारीफ की। चीन और शी जिनपिंग को लेकर उन्होंने भरोसे के साथ सतर्कता बरतने की बात कही।
पूर्व विदेश और वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की विदेश नीति और BRICS सम्मेलन में भारत की भूमिका की सराहना की है। लंबे समय से मोदी सरकार की नीतियों के आलोचक रहे सिन्हा ने भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन को सफल बताया।
झारखंड के हजारीबाग में एक न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान यशवंत सिन्हा ने सम्मेलन की उपलब्धियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बैठक में शामिल होने के लिए जिन राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था, वे सभी पहुंचे और सम्मेलन के अंत में साझा घोषणापत्र भी जारी किया गया।
BRICS समिट को सफल क्यों मानते हैं यशवंत सिन्हा?
यशवंत सिन्हा के मुताबिक, BRICS सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में सभी आमंत्रित देशों के शीर्ष नेताओं की भागीदारी और संयुक्त घोषणा पर सहमति बनना शामिल है।
उन्होंने बताया कि इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान मतभेदों के चलते साझा घोषणापत्र जारी नहीं हो पाया था। लेकिन इस बार भारतीय अधिकारियों की मेहनत के कारण सदस्य देशों के बीच सहमति बनी और संयुक्त दस्तावेज जारी किया जा सका।
सिन्हा ने सम्मेलन के दौरान भारत की ओर से की गई विभिन्न द्विपक्षीय बैठकों को भी महत्वपूर्ण बताया।
चीन और शी जिनपिंग को लेकर क्या बोले यशवंत सिन्हा?
भारत-चीन संबंधों पर बात करते हुए यशवंत सिन्हा ने सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि चीन के साथ संवाद जारी रखना जरूरी है, लेकिन उस पर पूरी तरह भरोसा करना आसान नहीं है।
सिन्हा ने चीन के पिछले रवैये का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए चीन के साथ संबंध आगे बढ़ाने चाहिए।
उन्होंने BRICS सम्मेलन के नतीजों को समझाने के लिए कहा कि स्थिति को केवल आधा खाली या आधा भरा गिलास देखने के बजाय पूरी तस्वीर के तौर पर देखना चाहिए। उनके अनुसार भारत ने सम्मेलन की अध्यक्षता की जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से निभाई और कई मुद्दों पर ऐसी भाषा तैयार की, जिस पर सभी सदस्य देशों ने सहमति जताई।
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ईरान और फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी रखी राय
यशवंत सिन्हा ने BRICS सम्मेलन के दौरान ईरान और पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच भारत का रुख कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोबारा स्पष्ट होता दिखाई दिया।
उन्होंने फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत के पारंपरिक रुख की ओर लौटने को सकारात्मक संकेत बताया। साथ ही ईरान से संबंधित घटनाक्रम और उससे जुड़ी कूटनीतिक परिस्थितियों का भी जिक्र किया।
कभी मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं सिन्हा
यशवंत सिन्हा का नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों की आलोचना करने का लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है। बीजेपी में रहते हुए भी उन्होंने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर कई बार सवाल उठाए थे।
2017 के बाद उन्होंने सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ ज्यादा मुखर रुख अपनाया। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी छोड़ दी और विपक्षी राजनीति में सक्रिय हो गए।
इसके बाद वह राफेल सौदे को लेकर भी सरकार के खिलाफ अभियान का हिस्सा रहे। उन्होंने अरुण शौरी और प्रशांत भूषण के साथ मिलकर इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की कोशिश की।
बाद में यशवंत सिन्हा तृणमूल कांग्रेस से भी जुड़े और 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार बने। हालांकि, राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
BRICS पर सिन्हा के बयान से बदला राजनीतिक रुख?
लंबे समय तक मोदी सरकार के आलोचक रहे यशवंत सिन्हा का BRICS सम्मेलन को लेकर सकारात्मक रुख चर्चा में है। उन्होंने सम्मेलन की उपलब्धियों के साथ-साथ भारत की कूटनीतिक भूमिका की भी सराहना की।
हालांकि, चीन को लेकर उन्होंने अपने पुराने संदेह को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि बीजिंग के साथ बातचीत जरूरी है, लेकिन भारत को सतर्क रहकर आगे बढ़ना चाहिए।

