वरलक्ष्मी व्रत 2026: सास-बहू दोनों व्रत रखें तो एक कलश या दो? जानें वरलक्ष्मी पूजा की सही विधि, कलश स्थापना और पूजा के जरूरी नियम।
वरलक्ष्मी व्रत 2026: वरलक्ष्मी व्रत इस वर्ष 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। देवी लक्ष्मी के वरलक्ष्मी स्वरूप की पूजा को सुख-समृद्धि, सौभाग्य और परिवार की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। दक्षिण भारत में इस व्रत का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान कलश स्थापना की परंपरा होती है, जिसे देवी के स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
ऐसे में कई घरों में सवाल उठता है कि अगर एक ही परिवार में सास और बहू दोनों वरलक्ष्मी व्रत रख रही हों, तो क्या दोनों के लिए अलग-अलग कलश स्थापित करना जरूरी है या एक ही कलश से पूजा की जा सकती है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी सामान्य पूजा परंपरा।
सास और बहू दोनों व्रत रखें तो कितने कलश रखें?
अगर घर में सास और बहू दोनों वरलक्ष्मी व्रत कर रही हैं, तो एक ही कलश स्थापित करके दोनों महिलाएं पूजा कर सकती हैं। अलग-अलग कलश रखना कोई अनिवार्य नियम नहीं माना जाता। हालांकि, अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजा की विधि तथा परंपराएं अलग हो सकती हैं।
कलश स्थापना का मुख्य उद्देश्य पूजा स्थल पर देवी वरलक्ष्मी का आवाहन करना है। धार्मिक मान्यताओं में कलश को शुभता, समृद्धि और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
एक कलश से पूजा करने की विधि
वरलक्ष्मी व्रत के दिन सबसे पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद पूजा स्थान पर रंगोली बनाकर चावल की ढेरी तैयार करें और उसके ऊपर कलश स्थापित करें।
कलश में जल के साथ अक्षत, हल्दी आदि पूजा सामग्री रखी जाती है। इसके बाद कलश के ऊपर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है। कई घरों में नारियल पर वरलक्ष्मी देवी का मुख लगाकर उनका श्रृंगार करने की भी परंपरा है।
इसके बाद भगवान गणेश का पूजन करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। सास और बहू दोनों अपनी-अपनी मनोकामना के अनुसार अलग संकल्प ले सकती हैं, भले ही पूजा एक ही कलश की हो।
वरलक्ष्मी पूजा में दोरक का महत्व
पूजा के दौरान वरलक्ष्मी देवी का आवाहन करने के बाद षोडशोपचार पूजन, लक्ष्मी मंत्र और व्रत कथा का पाठ किया जाता है। पूजा में दोरक यानी 16 गांठ वाला पीला धागा भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
दोरक को पूजा के समय देवी के चरणों में रखकर विधि-विधान से पूजित किया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद महिलाएं इसे अपने दाहिने हाथ में बांधती हैं। यह धागा व्रत और पूजा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
सुहागिनों को दें सुहाग सामग्री
पूजा संपन्न होने के बाद परिवार की परंपरा के अनुसार सुहागिन महिलाओं को भोजन या सुहाग सामग्री भेंट करने की परंपरा भी है। कई जगहों पर 7, 11 या 21 सुहागिनों को आमंत्रित कर उन्हें हल्दी, कुमकुम, फल और अन्य सुहाग सामग्री दी जाती है।
वरलक्ष्मी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार वरलक्ष्मी व्रत देवी लक्ष्मी के वर प्रदान करने वाले स्वरूप को समर्पित है। भक्त इस दिन परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और सौभाग्य की कामना से पूजा करते हैं।
मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से वरलक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, व्रत से जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या सास और बहू एक ही कलश से पूजा कर सकती हैं?
हां, सास और बहू एक ही वरलक्ष्मी कलश की स्थापना करके साथ में पूजा कर सकती हैं। दोनों अपनी-अपनी मनोकामना के लिए अलग संकल्प भी ले सकती हैं।
वरलक्ष्मी कलश किस दिशा में रखें?
कलश को साफ और पवित्र पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। कलश की दिशा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग मान्यताएं हैं। इसलिए अपने परिवार की पारंपरिक पूजा विधि को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
क्या वरलक्ष्मी व्रत सिर्फ विवाहित महिलाएं रखती हैं?
कई परंपराओं में यह व्रत विवाहित महिलाएं पति, परिवार और सौभाग्य की कामना से रखती हैं। हालांकि, पूजा की परंपरा क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकती है।
वरलक्ष्मी व्रत में क्या भोग लगाएं?
देवी को फल, मिठाई, पंचामृत, पायसम और घर में बनाए गए सात्विक पकवानों का भोग लगाया जा सकता है। दक्षिण भारतीय परिवारों में इस अवसर पर विशेष नैवेद्य तैयार करने की परंपरा भी है।

