झारखंड सजा पुनरीक्षण बोर्ड ने 26 दोषियों को समयपूर्व रिहा किया। हाई कोर्ट बोर्ड की बैठकों और अगली कार्रवाई की निगरानी कर रहा है।
झारखंड सजा पुनरीक्षण बोर्ड की बैठक में 26 सजायाफ्ता कैदियों को समय से पहले जेल से रिहा करने का फैसला लिया गया है। मामले में झारखंड हाई कोर्ट लगातार निगरानी कर रहा है। अदालत ने राज्य सरकार को बोर्ड की अगली बैठक में लिए जाने वाले फैसलों की जानकारी देने और स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने मंगलवार को आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की समयपूर्व रिहाई से संबंधित स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई की।
30 जुलाई की बैठक में 26 दोषियों को मिली रिहाई
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत में एक शपथ पत्र पेश किया गया। इसमें राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड की 30 जुलाई को हुई बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी दी गई।
सरकार ने कोर्ट को बताया कि बैठक में कुल 26 सजायाफ्ता कैदियों को समयपूर्व रिहा करने का निर्णय लिया गया। सरकार के अनुसार बोर्ड की बैठक अब निर्धारित समय के अनुसार आयोजित की जा रही है।
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हर तीन महीने में होगी बोर्ड की बैठक
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सजा पुनरीक्षण बोर्ड की बैठक तय अंतराल के अनुसार यानी हर तीन महीने में आयोजित की जा रही है। अगली बैठक भी तीन महीने के बाद प्रस्तावित है।
हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि अगली बैठक में लिए गए निर्णयों से अदालत को अवगत कराया जाए। इसके साथ ही राज्य सरकार को मामले में एक नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हाई कोर्ट की निगरानी
राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड की बैठकों को नियमित रूप से आयोजित करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट पहले ही राज्यों को दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। इन निर्देशों के तहत ऐसे मामलों की समीक्षा के लिए बोर्ड की बैठक हर तीन महीने में आयोजित की जानी है।
इसी व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने के लिए झारखंड हाई कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका के माध्यम से निगरानी शुरू की है।
समयपूर्व रिहाई के मामलों पर नजर
हाई कोर्ट की निगरानी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे पात्र कैदियों के मामलों की समय पर समीक्षा हो और सजा पुनरीक्षण बोर्ड अपनी बैठकों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर आयोजित करे।
अब अदालत की नजर बोर्ड की अगली बैठक और उसमें लिए जाने वाले फैसलों पर रहेगी। सरकार को अगली सुनवाई से पहले संबंधित स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी।

