गणेश चतुर्थी 2026: जानें भगवान गणेश कैसे बने प्रथम पूज्य, गणेश चतुर्थी का महत्व, जन्म कथा, गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और विसर्जन की तारीख।
गणेश चतुर्थी 2026: हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणपति को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने पर कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर देशभर में घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति की प्रतिमा स्थापित की जाती है। आइए जानते हैं भगवान गणेश के प्रथम पूज्य बनने की कथा, गणेश चतुर्थी का महत्व और वर्ष 2026 में गणपति स्थापना का शुभ समय।
कैसे बने भगवान गणेश प्रथम पूज्य?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की थी। उन्होंने उस बालक को अपने द्वार की रक्षा करने का आदेश दिया और स्नान करने चली गईं।
इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। बालक ने माता पार्वती के आदेश का पालन करते हुए शिवजी को अंदर जाने से रोक दिया। इस बात को लेकर शिव और बालक के बीच संघर्ष हुआ। कथा के अनुसार, युद्ध के दौरान भगवान शिव ने बालक का सिर अलग कर दिया।
जब माता पार्वती को इस घटना की जानकारी हुई तो वह अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गईं। उन्होंने अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की मांग की। देवताओं के अनुरोध के बाद भगवान शिव ने हाथी का मस्तक बालक के शरीर पर स्थापित किया और उन्हें नया जीवन प्रदान किया।
इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को देवताओं में प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। साथ ही उन्हें सभी गणों का अधिपति माना गया। इसी कारण किसी भी शुभ धार्मिक कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है।
गणपति को क्यों कहा जाता है विघ्नहर्ता?
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और शुभ कार्यों में सफलता का आशीर्वाद मिलता है।
गणेश जी को रिद्धि-सिद्धि का स्वामी भी माना जाता है। इसी वजह से उनकी पूजा को धन, समृद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। भगवान गणेश को विशेष रूप से दूर्वा और मोदक प्रिय माने जाते हैं।
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14 सितंबर को होगी गणेश चतुर्थी 2026
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार, चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह समाप्त होगी। मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी होने के कारण 14 सितंबर को गणपति स्थापना की परंपरा बताई गई है।
इसी दिन से कई स्थानों पर गणेशोत्सव का शुभारंभ होगा और भक्त घरों तथा पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करेंगे।
गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त
2026 में गणेश प्रतिमा स्थापित करने के लिए बताया गया शुभ मुहूर्त: सुबह 10:50 बजे से दोपहर 1:18 बजे तक
इस अवधि में श्रद्धालु विधि-विधान से गणपति की स्थापना और पूजा कर सकते हैं। क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।
अनंत चतुर्दशी पर होगा गणपति विसर्जन
गणेशोत्सव के समापन पर भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। वर्ष 2026 में अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को बताई गई है। कई स्थानों पर इसी दिन गणपति विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होगा।
हालांकि, कुछ परिवारों में अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन या अन्य निर्धारित अवधि के बाद भी विसर्जन किया जाता है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का क्या है महत्व?
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश के प्राकट्य से जोड़ा जाता है। इसी दिन से कई क्षेत्रों में गणेशोत्सव की शुरुआत होती है। भक्त भगवान गणेश की पूजा कर सुख, शांति, समृद्धि और कार्यों में सफलता की कामना करते हैं।
धार्मिक परंपराओं में चतुर्थी व्रत का भी विशेष महत्व बताया गया है। हालांकि, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यानी गणेश चतुर्थी को विशेष पर्व के रूप में मनाया जाता है।
गणेश जी को क्यों कहा जाता है लंबोदर?
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में भगवान गणेश के कई नाम बताए गए हैं, जिनमें ‘लंबोदर’ भी प्रमुख है। मान्यता के अनुसार, उनके उदर में समस्त लोकों का समावेश माना जाता है। इसी प्रतीकात्मक अर्थ के कारण उन्हें लंबोदर कहा जाता है। गणेश जी का स्वरूप ज्ञान, विवेक, धैर्य और परिस्थितियों को संभालने की क्षमता का भी प्रतीक माना जाता है।
गणेशोत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का पर्व भी माना जाता है। गणपति स्थापना से लेकर विसर्जन तक घरों और सार्वजनिक पंडालों में पूजा, भजन, आरती और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इस दौरान भक्त भगवान गणेश को मोदक, दूर्वा और अन्य नैवेद्य अर्पित करते हैं। गणेशोत्सव लोगों को एक साथ जोड़ने और अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।

