दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2025-31 के तहत तुअर, उड़द और मसूर की खेती को बढ़ावा मिलेगा। जानें बजट, 100% खरीद गारंटी और किसानों को मिलने वाले लाभ।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन: भारत में दालें आम लोगों के भोजन का अहम हिस्सा हैं और बड़ी आबादी के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत भी हैं। देश में दलहन की बढ़ती जरूरत को पूरा करने और विदेशों से होने वाले आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन शुरू किया है।
यह छह साल की योजना वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक लागू रहेगी। इसके लिए सरकार ने 11,440 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। मिशन के तहत खासतौर पर तुअर, उड़द और मसूर की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
सरकार का लक्ष्य केवल दलहन का उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि बेहतर बीज, आधुनिक कृषि तकनीक, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी, प्रसंस्करण और किसानों को उनकी उपज का बेहतर बाजार उपलब्ध कराकर पूरी दलहन मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन का क्या है उद्देश्य?
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के माध्यम से सरकार देश में दलहन उत्पादन को नई गति देना चाहती है। इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:
- तुअर, उड़द और मसूर समेत प्रमुख दलहनों का उत्पादन बढ़ाना।
- दलहन की खेती के तहत आने वाले क्षेत्रफल में विस्तार करना।
- अधिक उपज देने वाली और मौसम के अनुकूल किस्मों को बढ़ावा देना।
- किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना।
- फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना।
- आधुनिक भंडारण, सफाई, ग्रेडिंग और प्रसंस्करण को बढ़ावा देना।
- किसानों को उनकी उपज के लिए बेहतर और स्थिर बाजार उपलब्ध कराना।
- दलहन किसानों की आय बढ़ाने के साथ देश की पोषण और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना।
तुअर, उड़द और मसूर की 100% खरीद का प्रावधान
मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक तुअर, उड़द और मसूर की सुनिश्चित खरीद है। सरकार ने किसानों को बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा देने के लिए खरीद व्यवस्था को मजबूत करने की योजना बनाई है।
इसके तहत पंजीकृत किसानों से इन तीनों दलहनों की 100 प्रतिशत तक सुनिश्चित खरीद का प्रावधान है। इसके लिए नैफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) जैसी केंद्रीय एजेंसियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर अपनी फसल बेचने से बचाना और उन्हें स्थिर तथा लाभकारी बाजार उपलब्ध कराना है। हालांकि, इस सुविधा का लाभ लेने के लिए किसानों को संबंधित खरीद एजेंसियों के साथ पंजीकरण और आवश्यक समझौता करना होगा।
किसानों के लिए बाजार का जोखिम होगा कम
दलहन की खेती में अक्सर किसानों को बाजार भाव में अचानक गिरावट का सामना करना पड़ता है। सुनिश्चित खरीद व्यवस्था इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।
सरकार की योजना के अनुसार, पंजीकृत किसान अपनी तुअर, उड़द और मसूर की उपज को निर्धारित व्यवस्था के तहत बेच सकेंगे। इससे किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक भरोसा मिलेगा।
अन्य दलहन फसलों की खरीद पहले की तरह पीएम-आशा की मूल्य समर्थन योजना (PSS) के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार जारी रहेगी।
गुणवत्तापूर्ण बीज पर विशेष जोर
दलहन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अच्छे बीजों की उपलब्धता को मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। इसके तहत ऐसी नई किस्मों के बीज उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाएगा जो अधिक उपज देने के साथ-साथ बदलती जलवायु, कीट और रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध क्षमता रखती हों।
प्रजनक बीजों को आगे बढ़ाकर आधारभूत और प्रमाणित बीजों की उपलब्धता बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। इस काम में राज्य बीज निगम, बीज केंद्र, किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी समितियां और पंजीकृत बीज उत्पादक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
बीजों की गुणवत्ता और पहचान पर डिजिटल निगरानी
सरकार बीजों की गुणवत्ता और उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल व्यवस्था का इस्तेमाल करेगी। बीज उत्पादकों के लिए साथी पोर्टल पर पंजीकरण की व्यवस्था को महत्वपूर्ण बनाया गया है।
इसके अलावा बीजों का गुणवत्ता प्रमाणीकरण, आनुवंशिक जांच और निर्धारित मानकों का पालन किया जाएगा। इसका उद्देश्य किसानों तक सही और प्रमाणित बीज पहुंचाना है।
आईसीएआर संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों में बीज उत्पादन, प्रसंस्करण तथा भंडारण की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में भी काम किया जाएगा।
किसानों को रियायती दर पर मिलेंगे प्रमाणित बीज
मिशन के तहत किसानों को उन्नत दलहन किस्मों के प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान है। इससे किसानों को बेहतर बीज समय पर उपलब्ध कराने और नई किस्मों को अपनाने में मदद मिलेगी। साथ ही बीज उत्पादन, भंडारण, प्रमाणीकरण और गुणवत्ता प्रबंधन से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए किसानों तथा बीज उत्पादकों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।
प्रदर्शन के जरिए किसानों को सिखाई जाएंगी नई तकनीक
- किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों को पहुंचाने के लिए मिशन के तहत विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन कार्यक्रम चलाए जाएंगे।
- इनमें फ्रंट लाइन प्रदर्शन (FLD), क्लस्टर फ्रंट लाइन प्रदर्शन (CFLD) और ब्लॉक स्तर के प्रदर्शन शामिल हैं।
- इन प्रदर्शन कार्यक्रमों में किसानों को करीब 0.4 से 1 हेक्टेयर तक की भूमि पर नई तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा।
- किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज के साथ एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) से संबंधित तकनीकी सहायता और पैकेज उपलब्ध कराया जाएगा।
धान की परती भूमि में दलहन की खेती को बढ़ावा
दलहन का रकबा बढ़ाने के लिए धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली जमीन और अन्य उपयुक्त क्षेत्रों का उपयोग करने पर जोर दिया जाएगा।
इन क्षेत्रों में किसानों को दलहन की खेती के लिए बीज किट उपलब्ध कराने की योजना है। इसका उद्देश्य फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना और उपलब्ध कृषि भूमि का बेहतर इस्तेमाल करना है। कृषि मानचित्र, डिजिटल फसल सर्वेक्षण और साथी पोर्टल जैसे डिजिटल माध्यमों से इन गतिविधियों की निगरानी की जाएगी।
फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की तैयारी
दलहन की खेती में केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। फसल की कटाई के बाद भंडारण, सफाई, ग्रेडिंग और प्रसंस्करण के दौरान होने वाला नुकसान भी किसानों की आय को प्रभावित करता है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए मिशन में आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाएगा। ऐसी इकाइयों के लिए परियोजना लागत का 33 प्रतिशत या अधिकतम 25 लाख रुपये प्रति इकाई तक सहायता का प्रावधान किया गया है।
आधुनिक प्रसंस्करण और पैकेजिंग को मिलेगा बढ़ावा
दलहन की सफाई, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और पैकेजिंग के लिए आधुनिक सुविधाएं विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।
किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी समितियों को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि किसान अपनी उपज का सामूहिक भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन कर सकें। इससे बाजार में किसानों की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।
थ्रेशर, क्लीनर, ग्रेडर और अन्य मशीनों के इस्तेमाल से फसल कटाई के बाद होने वाले कार्यों को अधिक कुशल बनाने और श्रम लागत घटाने का लक्ष्य है।
ब्रांडिंग और सीधे बाजार से जुड़ाव पर जोर
मिशन के तहत किसानों के उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और बेहतर पैकेजिंग को भी बढ़ावा दिया जाएगा।
किसानों और एफपीओ को सीधे बाजार से जोड़ने की कोशिश की जाएगी, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सके। इसके साथ ही कटाई, सुखाने, भंडारण, प्रसंस्करण और गुणवत्ता बनाए रखने से संबंधित प्रशिक्षण किसानों को दिया जाएगा।
छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन को अधिक समावेशी बनाने के लिए लघु एवं सीमांत किसानों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के किसानों के लिए भी विशेष प्रावधान रखे गए हैं। महिला किसानों के लिए कम से कम 20 प्रतिशत आवंटन सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इससे मिशन के लाभ को समाज के अधिक व्यापक वर्ग तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल तकनीक से होगी निगरानी
मिशन के कार्यान्वयन में डिजिटल तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। साथी पोर्टल, डिजिटल फसल सर्वेक्षण और कृषि मानचित्रण जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाएगा।
इन डिजिटल माध्यमों से लाभार्थियों की पहचान, योजनाओं की प्रगति, फसल क्षेत्र और विभिन्न गतिविधियों की निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी के माध्यम से सहायता राशि के वितरण को भी अधिक जवाबदेह बनाने का लक्ष्य है।
तीन स्तरों पर होगी योजना की निगरानी
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन को लागू करने के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था तैयार की गई है। प्रत्येक स्तर पर समितियां योजना की तैयारी, कार्यान्वयन और निगरानी से जुड़े कार्यों को देखेंगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मिशन के निर्धारित लक्ष्य समय पर पूरे किए जा सकें।
2030-31 तक दलहन उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य
सरकार ने वर्ष 2030-31 तक देश में दलहन उत्पादन को बढ़ाकर 350 लाख मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान आधार के रूप में करीब 242 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का उल्लेख किया गया है।
इसी अवधि में दलहन की खेती का क्षेत्रफल 275 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर करने और औसत उत्पादकता को 881 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने का लक्ष्य है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन से किसानों को क्या फायदा होगा?
इस मिशन से किसानों को एक साथ कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है। बेहतर बीज और आधुनिक तकनीकों से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। फसल कटाई के बाद नुकसान घटने से किसानों की वास्तविक आय में सुधार हो सकता है।
वहीं तुअर, उड़द और मसूर की सुनिश्चित खरीद किसानों को बाजार संबंधी जोखिम से राहत दे सकती है। प्रसंस्करण, पैकेजिंग और सीधे बाजार से जुड़ाव के माध्यम से भी किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।

