AI vs Oil Crisis: IMF प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने AI निवेश और तेल संकट के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव, महंगाई और आर्थिक जोखिमों को लेकर चेताया है।
AI vs Oil Crisis: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अहम टिप्पणी की है। उनका कहना है कि इस समय दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दो विपरीत ताकतों का असर दिखाई दे रहा है। एक तरफ पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट और तेल आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल रही हैं, वहीं दूसरी ओर Artificial Intelligence (AI) में बढ़ता निवेश वैश्विक विकास को गति देने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हो रहा है।
जॉर्जीवा के मुताबिक, AI में निवेश की रफ्तार खासकर अमेरिका में मजबूत बनी हुई है। इसके साथ ही कई अन्य देश भी डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर तेजी से खर्च कर रहे हैं। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को मांग और निवेश के स्तर पर समर्थन मिल रहा है।
AI और तेल संकट के बीच फंसी ग्लोबल इकोनॉमी
IMF प्रमुख ने मौजूदा स्थिति को एक तरह की आर्थिक रस्साकशी के तौर पर बताया है। एक ओर पश्चिम एशिया से आने वाला नकारात्मक सप्लाई शॉक है, जबकि दूसरी ओर AI से पैदा हो रहा सकारात्मक डिमांड शॉक वैश्विक अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहा है।
इन दोनों प्रभावों का असर हर देश पर समान नहीं है। किसी अर्थव्यवस्था पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह उसकी ऊर्जा निर्भरता, आर्थिक स्थिति और AI से जुड़ी वैश्विक सप्लाई चेन में भूमिका पर निर्भर करेगा।
उम्मीद से बेहतर रहा ऊर्जा संकट का असर
जॉर्जीवा के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से पैदा हुए ऊर्जा संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर शुरुआती आशंकाओं की तुलना में कम रहा है।
इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं। इनमें तेल और गैस के भंडार का इस्तेमाल तथा खाड़ी क्षेत्र के बाहर से ऊर्जा आपूर्ति में बढ़ोतरी जैसे कारक शामिल हैं। इन वजहों से वैश्विक बाजार को कुछ राहत मिली है। हालांकि, IMF प्रमुख ने स्पष्ट किया कि ऊर्जा संकट को पूरी तरह खत्म मानना जल्दबाजी होगी।
अमेरिका में AI निवेश बना ग्रोथ इंजन
AI में होने वाला भारी निवेश फिलहाल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। जॉर्जीवा के मुताबिक, जो तकनीकी बदलाव शुरुआत में मुख्य रूप से अमेरिका तक सीमित दिखाई देता था, वह अब दूसरे देशों में भी फैल रहा है।
कई देश AI से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और अन्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं। अमेरिका में कॉरपोरेट आय और उपभोक्ता मांग मजबूत रहने से भी आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है।
क्या फिर बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें?
IMF प्रमुख ने ऊर्जा बाजार को लेकर चिंता भी जताई है। तेल और गैस के भंडार घट रहे हैं और उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों का मौसम नजदीक आ रहा है। ऐसे में अगर ऊर्जा आपूर्ति पर दोबारा दबाव बनता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर महंगाई पर पड़ सकता है। यदि महंगाई दोबारा बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में ढील देना मुश्किल हो सकता है। लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों का असर कर्ज की लागत और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
बॉन्ड यील्ड और महंगाई भी बनी चिंता
जॉर्जीवा ने बढ़ती बॉन्ड यील्ड को भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बताया। उनके अनुसार, वित्तीय दबाव बढ़ना और महंगाई को कम करने की प्रक्रिया का धीमा पड़ना बाजारों तथा नीति निर्माताओं के लिए चुनौती बन रहा है। इस वजह से आने वाले समय में मौद्रिक नीति को लेकर केंद्रीय बैंकों के सामने मुश्किल फैसले हो सकते हैं।
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AI से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
AI भले ही इस समय आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा हो, लेकिन इसके भविष्य को लेकर कई सवाल भी बने हुए हैं। IMF प्रमुख ने संकेत दिया कि AI में तेज निवेश के साथ वित्तीय स्थिरता से जुड़े जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।
अगर AI से जुड़ा निवेश और बाजार की उम्मीदें अचानक कमजोर होती हैं, तो इसका असर अलग-अलग देशों पर असमान रूप से पड़ सकता है।
गरीब देशों पर ज्यादा दबाव का खतरा
कम आय वाले देशों के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। खासकर वे देश जो ईंधन आयात पर ज्यादा निर्भर हैं, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से सीधे प्रभावित हो सकते हैं।
तेल और गैस के अलावा उर्वरक जैसी जरूरी वस्तुओं की सप्लाई बाधित होने पर कृषि लागत और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। चरम मौसम की घटनाएं इस समस्या को और गंभीर बना सकती हैं।
दूसरी तरफ, विकासशील देशों के AI की दौड़ में पीछे रहने का खतरा भी बढ़ रहा है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी निवेश की कमी इन देशों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक अंतर को और बढ़ा सकती है।
IMF ने 2026 की ग्रोथ को लेकर क्या कहा?
IMF ने जुलाई में 2026 के वैश्विक आर्थिक विकास अनुमान को 3 प्रतिशत तक कम कर दिया था। संस्था ने पश्चिम एशिया में संघर्ष, व्यापारिक विखंडन और AI से जुड़े जोखिमों को वैश्विक विकास के लिए प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया था।
हालांकि, जॉर्जीवा के ताजा आकलन के मुताबिक, पिछले स्प्रिंग मीटिंग्स की तुलना में आर्थिक दृष्टिकोण से जुड़े जोखिम अब कुछ ज्यादा संतुलित नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद जोखिमों का झुकाव अभी भी नकारात्मक दिशा में बना हुआ है और अनिश्चितता का स्तर ऊंचा है।
आगे क्या होगा?
IMF अपने वैश्विक आर्थिक अनुमान की अगली समीक्षा अक्टूबर 2026 में होने वाली IMF और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के दौरान कर सकता है। उस समय तक तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया की स्थिति, AI निवेश और वैश्विक महंगाई की दिशा से यह तय करने में मदद मिलेगी कि दुनिया की अर्थव्यवस्था किस ओर बढ़ रही है।

