RBI VRRR Auction में 7 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले सिर्फ 2.59 लाख करोड़ की बोलियां मिलीं। जानें बैंकों की कम भागीदारी और सिस्टम में बढ़ी नकदी की वजह।
RBI VRRR Auction: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए की गई 7 लाख करोड़ रुपये की 30-दिवसीय वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी को बैंकों से उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं मिली। बड़ी मात्रा में अतिरिक्त तरलता उपलब्ध होने के बावजूद बैंकों ने नीलामी में अपेक्षाकृत कम रकम की बोली लगाई।
आरबीआई को 7 लाख करोड़ रुपये की निर्धारित राशि के मुकाबले सिर्फ 2,59,276 करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुईं। इन बोलियों को 5.24 फीसदी की कट-ऑफ दर और भारित औसत दर पर स्वीकार किया गया। बैंकों की सीमित भागीदारी ने अतिरिक्त नकदी को लेकर केंद्रीय बैंक की रणनीति पर बाजार का ध्यान खींचा है।
VRRR क्या है और RBI इसे क्यों करता है?
वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) आरबीआई का एक महत्वपूर्ण लिक्विडिटी मैनेजमेंट टूल है। इसके जरिए केंद्रीय बैंक कुछ अवधि के लिए बैंकों से अतिरिक्त पैसा अपने पास लेता है।
इस प्रक्रिया से बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी कम होती है और बाजार में तरलता को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। खासकर तब, जब सिस्टम में जरूरत से ज्यादा पैसा मौजूद हो, आरबीआई ऐसे ऑपरेशंस के जरिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट करता है।
7 लाख करोड़ की नीलामी में सिर्फ इतनी बोलियां क्यों आईं?
30 दिनों के लिए आयोजित VRRR ऑक्शन में आरबीआई ने 7 लाख करोड़ रुपये की राशि तय की थी। हालांकि, बैंकों की तरफ से कुल बोली महज 2.59 लाख करोड़ रुपये के आसपास रही।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंकिंग सिस्टम में इस समय करीब 10.73 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता होने का अनुमान है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी अधिक नकदी उपलब्ध होने के बावजूद बैंक लंबी अवधि के VRRR में पैसा लगाने से क्यों बच रहे हैं।
इसका एक कारण बैंकों की अपनी फंडिंग और लिक्विडिटी जरूरतों को लेकर सतर्कता हो सकता है। लंबी अवधि के लिए पैसा आरबीआई के पास रखने के बजाय कुछ बैंक अपनी नकदी को बाजार में अन्य जरूरतों के लिए उपलब्ध रखना पसंद कर सकते हैं।
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बैंकिंग सिस्टम में इतनी ज्यादा नकदी आई कहां से?
मौजूदा अतिरिक्त तरलता के पीछे विशेष FCNR(B) जमा योजना से आया बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह प्रमुख कारणों में से एक है।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 31 अगस्त तक विशेष विदेशी मुद्रा उपायों के जरिए कुल 136.38 अरब डॉलर जुटाए गए थे। इसमें:
- FCNR(B) जमा: 127.23 अरब डॉलर
- OFCBs: 5.26 अरब डॉलर
- ECB: 3.89 अरब डॉलर
इन विदेशी मुद्रा प्रवाह के बाद आरबीआई के साथ किए गए स्वैप के माध्यम से बैंकिंग सिस्टम में रुपये की तरलता बढ़ी।
FCNR(B) योजना का क्या रहा असर?
बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद देने वाली FCNR(B) विंडो को मिली मजबूत प्रतिक्रिया के कारण इसे तय समय से करीब एक महीने पहले ही 31 अगस्त को बंद कर दिया गया।
हालांकि, ECB और OFCBS से जुड़ी सुविधा 31 दिसंबर तक जारी रहने वाली है। ऐसे में आगे भी कुछ मात्रा में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बने रहने की संभावना है।
विदेशी मुद्रा के इस प्रवाह और उसके बाद हुए स्वैप ने बैंकिंग सिस्टम में रुपये की उपलब्धता बढ़ाई। यही अतिरिक्त नकदी फिलहाल आरबीआई के लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
RBI ने 5 लाख करोड़ की Overnight VRRR भी की घोषित
लंबी अवधि की VRRR नीलामी में कम भागीदारी के बाद आरबीआई ने अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए 5 लाख करोड़ रुपये की Overnight VRRR Auction भी आयोजित की।
यह नीलामी सोमवार को सुबह 11 बजे से 11:30 बजे के बीच हुई। Overnight ऑपरेशन के जरिए आरबीआई बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त फंड को अपेक्षाकृत कम अवधि के लिए सोखने की कोशिश करता है।
अब तक 32 VRRR ऑक्शन कर चुका है RBI
बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई ने अगस्त और सितंबर में अब तक 32 VRRR नीलामियां आयोजित की हैं।
इन ऑपरेशंस की अवधि एक दिन से लेकर 14 दिन तक रही है। इससे साफ है कि केंद्रीय बैंक सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को चरणबद्ध तरीके से मैनेज करने पर जोर दे रहा है।
RBI के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करना?
बैंकिंग सिस्टम में बहुत अधिक तरलता रहने से बाजार की ब्याज दरों और मौद्रिक नीति के असर पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए आरबीआई के लिए जरूरी है कि सिस्टम में नकदी का स्तर आर्थिक गतिविधियों की जरूरत के अनुरूप बना रहे।
VRRR जैसे उपायों के जरिए केंद्रीय बैंक अतिरिक्त तरलता को अस्थायी रूप से सोख सकता है। इससे मौद्रिक नीति के प्रभाव, महंगाई नियंत्रण और वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल 7 लाख करोड़ रुपये की VRRR नीलामी में अपेक्षाकृत कम भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि बैंक लंबी अवधि के लिए अपनी अतिरिक्त नकदी आरबीआई के पास रखने को लेकर पूरी तरह सहज नहीं हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में केंद्रीय बैंक छोटे अवधि वाले लिक्विडिटी ऑपरेशंस पर भी जोर दे सकता है।

