नेपाल की बाढ़ के बाद भारत के हिमालयी हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं। जानें GLOF खतरे, निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत।
नेपाल में हालिया बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी घटना ने हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मौसम और बढ़ते ग्लेशियर जोखिमों के बीच सिर्फ संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए रियल-टाइम निगरानी, मजबूत चेतावनी तंत्र और समय रहते लोगों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था जरूरी है।
नेपाल में आई अचानक बाढ़ से कई हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हुईं। रिपोर्टों के मुताबिक, बाढ़ और मलबे के तेजी से घाटियों की ओर आने के दौरान करीब 12 जलविद्युत परियोजनाओं में 900 से ज्यादा कर्मचारी और मजदूर फंस गए थे।
नेपाल की घटना से भारत के लिए क्या सबक?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) से जुड़े पूर्व आईपीएस अधिकारी सफी अहसन रिजवी के अनुसार, नेपाल की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारियों से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल सामने रखे हैं।
भारत के पास ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के संभावित खतरे वाली करीब 195 झीलों की निगरानी के लिए कार्यक्रम मौजूद है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी झील को जोखिम वाली श्रेणी में रखना शुरुआती कदम भर है। वास्तविक चुनौती यह पता लगाना है कि अचानक झील टूटने या पहाड़ी ढलान खिसकने की स्थिति में पानी और मलबा किस दिशा में जाएगा और उसका असर कितनी दूर तक पहुंच सकता है।
हिमालय में तेजी से बढ़ रहा हाइड्रोपावर नेटवर्क
भारत में हिमालयी राज्यों में जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार लगातार हो रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में करीब 98 हाइड्रोपावर परियोजनाओं की योजना है, जिनकी प्रस्तावित क्षमता लगभग 58,196 मेगावाट है। इनमें करीब 36 परियोजनाओं पर काम जारी है और उनकी कुल क्षमता लगभग 12,663 मेगावाट बताई गई है।
इनमें बड़ी संख्या में परियोजनाएं अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं।
विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ऊंचाई वाले इलाकों में अचानक ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन या बाढ़ जैसी घटना होती है, तो क्या नीचे स्थित बांधों, सुरंगों, पावर स्टेशनों और स्थानीय आबादी को पर्याप्त समय पहले अलर्ट मिल पाएगा?
एनएचपीसी भी बढ़ा रहा है हाइड्रोपावर क्षमता
नेशनल हाइड्रो पावर कॉरपोरेशन यानी NHPC भी अपनी जलविद्युत क्षमता में बड़ा विस्तार करने की योजना पर काम कर रहा है। कंपनी अपनी क्षमता को लगभग 8.2 गीगावाट से बढ़ाकर 2027 तक करीब 13 गीगावाट करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
इस विस्तार में अरुणाचल प्रदेश की करीब 2,000 मेगावाट क्षमता वाली सुबनसिरी लोअर परियोजना और जम्मू-कश्मीर की चिनाब घाटी में स्थित कई बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं।
पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की बात करें तो चीन, भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान में 550 से अधिक हाइड्रोपावर परियोजनाएं संचालित, प्रस्तावित या निर्माणाधीन बताई जाती हैं।
बिजली जरूरतों के बीच हाइड्रोपावर पर जोर
भारत के लिए जलविद्युत ऊर्जा का महत्व इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि देश की बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। हाइड्रोपावर को ऐसे ऊर्जा स्रोत के तौर पर देखा जाता है जो सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन कम होने पर बिजली ग्रिड को संतुलित करने में मदद कर सकता है।
देश की बड़ी जलविद्युत क्षमता हिमालय और पूर्वोत्तर भारत में मौजूद है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार की योजनाओं में इन क्षेत्रों की भूमिका अहम बनी हुई है।
लेकिन पर्यावरण और आपदा विशेषज्ञों का सवाल है कि बिजली उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को लेकर सुरक्षा व्यवस्था भी उसी अनुपात में मजबूत की जा रही है या नहीं।
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जम्मू के संगठनों ने भी उठाए सवाल
3 सितंबर को जम्मू के कुछ युवा और पर्यावरण संगठनों ने हिमालयी क्षेत्र में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई। क्लाइमेट फ्रंट जम्मू, यूथ फॉर हिमालया और गुज्जर-बकरवाल स्टूडेंट अलायंस समेत संगठनों ने हिमालय में बड़े प्रोजेक्ट्स की बढ़ती संख्या को लेकर अधिक व्यापक जोखिम आकलन की मांग की।
संगठनों ने चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी हिस्से में यारलुंग त्सांगपो नदी पर प्रस्तावित बड़े बांध का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि हिमालय को बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के बीच प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बनाने के बजाय साझा पर्यावरणीय जोखिमों पर देशों के बीच सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए।
चिनाब घाटी में कई प्रोजेक्ट्स पर भी चिंता
पर्यावरण संगठनों ने यह सवाल भी उठाया कि चिनाब घाटी के एक ही क्षेत्र में मौजूद कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं के संयुक्त प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया गया है या नहीं। पाकल दुल, किरू, क्वार और डंगडूरू जैसी परियोजनाओं को लेकर उन्होंने स्वतंत्र जोखिम मूल्यांकन की मांग की है।
इसके अलावा संगठनों ने ग्लेशियर झीलों की रियल-टाइम निगरानी, बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम और स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन योजना में शामिल करने की जरूरत बताई है। खासतौर पर गुज्जर-बकरवाल जैसे पर्वतीय समुदायों को स्थानीय स्तर पर चेतावनी और निकासी व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है।
तेजी से गर्म हो रहा हिमालय
काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक आजम के मुताबिक, हिमालय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों और पहाड़ी ढलानों पर दबाव बढ़ रहा है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ कई इलाकों में चट्टानी और बंजर सतह बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे जमीन ज्यादा गर्मी सोख सकती है और कुछ ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
ऐसे हालात में ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। इन घटनाओं का सीधा असर पहाड़ों के नीचे बने बांधों, सुरंगों और बिजली संयंत्रों पर पड़ सकता है।
कश्मीर हिमालय की ग्लेशियर झीलों पर भी बढ़ा खतरा
जनवरी 2026 में जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में कश्मीर हिमालय की 155 ग्लेशियर झीलों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने 1992 से 2024 तक के उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया।
अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल करीब 26 प्रतिशत बढ़ा। पांच झीलों – ब्रम्हसर, नुंदकोल, भागसर, चिरसर और गंगाबल को GLOF के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया गया। इन झीलों से संभावित बाढ़ के प्रभाव वाले क्षेत्र में करीब 2,700 इमारतें, 15 पुल और एक हाइड्रोपावर परियोजना शामिल हैं।
केंद्रीय जल आयोग की GLOF संबंधी गाइडलाइंस में भी हिमालयी क्षेत्रों के 100 से ज्यादा बांधों को ग्लेशियल झील से अचानक आने वाली बाढ़ के संभावित जोखिम के संदर्भ में चिन्हित किया गया है।
सिर्फ झीलों की निगरानी पर्याप्त नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ग्लेशियर झील को खतरनाक घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। निगरानी व्यवस्था को पहाड़ की ऊपरी ढलानों से लेकर नदी घाटी, बांध, पावर प्रोजेक्ट और आबादी तक पूरे क्षेत्र को कवर करना चाहिए।
सफी अहसन रिजवी ने हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में हाइड्रोपावर परियोजनाओं के लिए एक व्यापक सेंसर, अलार्म और इवैक्युएशन नेटवर्क की जरूरत बताई है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए और मानसून से पहले इसका परीक्षण किया जाना चाहिए।
उन्होंने डैम सेफ्टी एक्ट, 2021 की उन व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया, जिनमें निर्धारित बांधों के लिए हाइड्रो-मौसम विज्ञान नेटवर्क, पानी के संभावित प्रवाह का अनुमान और निचले इलाकों के लिए आपात बाढ़ चेतावनी प्रणाली जैसी व्यवस्थाओं का प्रावधान है।
सीमा पार अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत
नेपाल की घटना ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने रखा है – सीमा पार आपदा चेतावनी प्रणाली। हिमालय से निकलने वाली कई नदियां अलग-अलग देशों से होकर गुजरती हैं। ऐसे में किसी ऊंचाई वाले क्षेत्र में अचानक ग्लेशियर टूटने या बाढ़ आने की स्थिति में नीचे के देशों और समुदायों को समय रहते जानकारी देना बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं। इसलिए भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान जैसे हिमालयी देशों के बीच ग्लेशियर, मौसम और नदी के प्रवाह से जुड़े आंकड़ों को साझा करने की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
भविष्य की चुनौती: खतरे का रास्ता पहले से समझना
विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ पर्वतीय आपदाएं धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जिससे वैज्ञानिकों को चेतावनी के संकेत पहचानने का समय मिल सकता है। वहीं कुछ घटनाएं बेहद कम समय में घटित होती हैं और तत्काल नुकसान पहुंचा सकती हैं।
ऐसे में भारत के लिए चुनौती केवल ज्ञात ग्लेशियर झीलों की निगरानी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जरूरी है कि संभावित रूप से अस्थिर ढलानों की पहचान हो, बाढ़ के संभावित रास्तों की मैपिंग की जाए और यह जानकारी भी स्पष्ट हो कि इन क्षेत्रों में कौन-कौन से गांव, प्रोजेक्ट और संवेदनशील आबादी मौजूद है।
हिमालय में हाइड्रोपावर का विस्तार भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन नेपाल की हालिया आपदा ने यह स्पष्ट किया है कि ऊर्जा विकास के साथ आपदा सुरक्षा, पर्यावरणीय निगरानी और समय पर चेतावनी की व्यवस्था को भी प्राथमिकता देनी होगी।

