उत्तराखंड के बागेश्वर में चंद्रशेखर पांडेय 22 साल बाद मुंबई से गांव लौटे। अब 150 नाली जमीन पर रंगीन गोभी, काला धान और काला गेहूं उगा रहे हैं।
महानगरों में नौकरी करने के बजाय अपने गांव में रहकर खेती को नया रूप देना आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बन रहा है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के चौरसों गांव के चंद्रशेखर पांडेय भी ऐसी ही मिसाल पेश कर रहे हैं। मुंबई में करीब 22 साल तक नौकरी करने के बाद उन्होंने गांव लौटकर पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। अब वह रंगीन गोभी, काला धान, काला गेहूं और कई तरह की सब्जियों की खेती करके पहाड़ी कृषि को नई दिशा देने में जुटे हैं।
चंद्रशेखर ने लंबे समय से खाली पड़ी अपनी पुश्तैनी जमीन को खेती के लिए तैयार किया। आज वह करीब 150 नाली भूमि पर फल, सब्जियां, दालें और औषधीय पौधों सहित कई प्रकार की फसलें उगा रहे हैं। उनका उद्देश्य पहाड़ में उपलब्ध जमीन और प्राकृतिक परिस्थितियों का बेहतर इस्तेमाल करके खेती को अधिक उपयोगी बनाना है।
गुलाबी गोभी की खेती से मिला नया अनुभव
चंद्रशेखर पांडेय ने पिछले साल प्रयोग के तौर पर गुलाबी गोभी की खेती की थी। इस प्रयोग से उन्हें अच्छा अनुभव मिला और रंगीन सब्जियों की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने इस साल पीली गोभी उगाने की भी शुरुआत की।
उनके मुताबिक, सामान्य गोभी की कीमत कई बार बाजार में काफी कम हो जाती है। इसके मुकाबले रंगीन गोभी को अलग पहचान मिलने से इसकी बिक्री के बेहतर अवसर बन सकते हैं। पहाड़ का ठंडा मौसम और उपयुक्त मिट्टी इन सब्जियों की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध करा सकते हैं।
रंगीन गोभी जैसी अलग किस्मों को अपनाकर चंद्रशेखर पारंपरिक खेती से आगे बढ़ने और बाजार की मांग के अनुसार फसलें तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं।
150 नाली जमीन पर कर रहे विविध खेती
चंद्रशेखर की खेती की खासियत यह है कि वह किसी एक फसल पर निर्भर नहीं हैं। करीब 150 नाली जमीन पर वह अलग-अलग श्रेणियों की फसलें उगा रहे हैं। इनमें फल, सब्जियां, दालें, औषधीय पौधे, काला धान और काला गेहूं शामिल हैं।
विविध खेती का एक प्रमुख फायदा यह है कि किसान अपनी जरूरत और मौसम के हिसाब से अलग-अलग फसलें तैयार कर सकते हैं। यदि किसी एक फसल का बाजार भाव कम हो जाए या उत्पादन प्रभावित हो, तो दूसरी फसलें आय के वैकल्पिक साधन बन सकती हैं।
हालांकि, हर फसल से होने वाली कमाई उसकी पैदावार, उत्पादन लागत, बाजार की मांग और बिक्री के भाव पर निर्भर करती है।
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काला धान और काला गेहूं से नई संभावनाएं
रंगीन गोभी के अलावा चंद्रशेखर पांडेय ने काले धान और काले गेहूं की खेती को भी अपने प्रयोगों में शामिल किया है। इन विशेष किस्मों को सामान्य अनाज से अलग पहचान मिलती है और कुछ बाजारों में इनके लिए खास उपभोक्ता वर्ग मौजूद है।
फिलहाल उनके खेत में इन फसलों की खेती शुरुआती चरण में है। इसलिए इनसे होने वाली कुल उपज, बिक्री और मुनाफे के निश्चित आंकड़े सामने नहीं आए हैं। आगामी फसल चक्र में ही इनके व्यावसायिक परिणामों का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।
इन नई किस्मों को अपनाने के पीछे उद्देश्य खेती में विविधता लाना और बाजार में उपलब्ध नए अवसरों को समझना है।
उद्यान विभाग से मिली बीज की मदद
नई फसलों के साथ प्रयोग करने में चंद्रशेखर को स्थानीय उद्यान विभाग से उन्नत बीज प्राप्त करने में सहायता मिली। इससे उन्हें रंगीन गोभी जैसी नई किस्मों की खेती करने का प्रोत्साहन मिला।
उनका मानना है कि सही जानकारी, उपयुक्त बीज और बाजार की जरूरतों को समझकर पहाड़ी क्षेत्रों में भी खेती को बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता है।
पहाड़ी इलाकों में खेती के दौरान जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े, सिंचाई की सीमित सुविधा और परिवहन जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। ऐसे में फसल विविधीकरण किसानों को उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करने का विकल्प दे सकता है।
पलायन के बीच गांव में खेती की नई राह
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। चंद्रशेखर पांडेय की कहानी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने मुंबई में लंबे समय तक नौकरी करने के बाद अपने गांव लौटकर कृषि को अपनाया।
उनका प्रयोग यह दिखाता है कि पहाड़ की खेती में पारंपरिक फसलों के साथ नई किस्मों को शामिल करके भी संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं। हालांकि, खेती को स्थायी रूप से लाभकारी बनाने के लिए उत्पादन के साथ-साथ बाजार तक पहुंच, उचित मूल्य और लागत का प्रबंधन भी जरूरी है।
बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों में बड़े और समतल खेत कम होने के कारण खेती के लिए अलग रणनीति अपनानी पड़ती है। विविध फसलों का चयन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती की योजना बनाना ऐसे क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकता है।
दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बने चंद्रशेखर
चंद्रशेखर पांडेय का प्रयास पहाड़ी कृषि में नए प्रयोगों की संभावनाओं को सामने लाता है। रंगीन गोभी से लेकर काले धान और काले गेहूं तक, वह अलग-अलग फसलों के जरिए अपनी पुश्तैनी जमीन का उपयोग कर रहे हैं।
उनकी पहल उन लोगों के लिए प्रेरक है, जो गांव लौटकर खेती या कृषि आधारित व्यवसाय शुरू करने के बारे में सोच रहे हैं। हालांकि, किसी नई फसल को बड़े क्षेत्र में लगाने से पहले उसकी स्थानीय उपयुक्तता, बीज की उपलब्धता, उत्पादन लागत और बाजार की मांग का आकलन करना जरूरी है।

