खंडवा के किसान रामकृष्ण शर्मा प्राकृतिक खेती से अरहर, सोयाबीन, गेहूं और सब्जियां उगा रहे हैं। जानें जीवामृत, बीजामृत और प्राकृतिक खेती से लागत घटाने के तरीके।
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए कम लागत में खेती करने और बेहतर आमदनी प्राप्त करने का एक विकल्प बन रही है। किल्लौद विकासखंड के गंभीर उबारी गांव के किसान रामकृष्ण सीताराम शर्मा राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्राकृतिक तरीकों से विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं। उनका अनुभव बताता है कि स्थानीय संसाधनों से तैयार जैविक इनपुट का इस्तेमाल करके खेती की लागत कम करने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।
6 एकड़ जमीन पर कर रहे हैं विभिन्न फसलों की खेती
किसान रामकृष्ण शर्मा के पास कुल 6 एकड़ कृषि भूमि है। वे अपनी जमीन पर अरहर, सोयाबीन, गेहूं, चना, मिर्च और टमाटर जैसी फसलें उगा रहे हैं। इनमें से लगभग 2 हेक्टेयर क्षेत्र में वे राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
फसलों में विविधता अपनाने के साथ वे रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के लिए प्राकृतिक विकल्पों का उपयोग कर रहे हैं। इससे खेती की लागत को नियंत्रित करने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने पर ध्यान दिया जा रहा है।
जीवामृत और बीजामृत से खेती की लागत घटाने का प्रयास
रामकृष्ण शर्मा को प्राकृतिक खेती के लिए कृषि विभाग की योजनाओं के माध्यम से तकनीकी मार्गदर्शन और आवश्यक संसाधनों की सहायता मिली है। जिले में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 20 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC) संचालित किए जा रहे हैं। इनमें बलड़ी क्षेत्र में दो केंद्र शामिल हैं, जिनमें से एक केंद्र उन्हें उपलब्ध कराया गया।
इस व्यवस्था के अंतर्गत जीवामृत तैयार करने के लिए आवश्यक इकाई और ह्यूमिक एसिड निर्माण के लिए बायो-डाइजेस्टर बैग भी उपलब्ध कराया गया। इन संसाधनों की मदद से वे खेती में इस्तेमाल होने वाले इनपुट तैयार कर रहे हैं।
किसान ने बताया कि आत्मा योजना के अंतर्गत ब्लॉक टेक्नोलॉजी मैनेजर (BTM) और असिस्टेंट टेक्नोलॉजी मैनेजर (ATM) के मार्गदर्शन में उन्होंने जीवामृत, बीजामृत और जैविक कीटनाशक तैयार करके फसलों में इस्तेमाल किए। उनके अनुसार, इन उपायों से खेती पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिली है और उपज की गुणवत्ता के कारण बाजार में बेहतर कीमत मिलने का लाभ भी हुआ है।
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प्राकृतिक खेती से मिट्टी और पर्यावरण को मिल सकता है लाभ
प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और जैविक विकल्पों का उपयोग करके रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाने का प्रयास किया जाता है। इससे मिट्टी के स्वास्थ्य, लाभकारी सूक्ष्मजीवों और पर्यावरण के संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।
रामकृष्ण शर्मा का मानना है कि किसान प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाकर अपनी उत्पादन लागत कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने दूसरे किसानों से भी इस पद्धति की जानकारी लेने और कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में इसे अपनाने की अपील की।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से किसानों को प्रोत्साहन
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन और आत्मा योजना के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती से जुड़ी तकनीकों, प्रशिक्षण और संसाधनों की जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। खंडवा के किसान रामकृष्ण शर्मा का अनुभव इस बात को रेखांकित करता है कि उचित मार्गदर्शन और स्थानीय संसाधनों के उपयोग से खेती को अधिक किफायती बनाने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
प्राकृतिक खेती अपनाने से पहले किसानों को अपनी मिट्टी, फसल, स्थानीय जलवायु और कीट-रोग की स्थिति के अनुसार कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। सही प्रबंधन और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर खेती करने से किसान अपनी आय बढ़ाने के अवसर तलाश सकते हैं।

