मुरैना के किसान बनवारी लाल कुशवाह गेंदा फूल की खेती से एक बीघा में 70 से 80 हजार रुपये तक कमा रहे हैं। जानें उनकी खेती का तरीका।
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के एक किसान ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ फूलों की खेती को अपनाकर आमदनी बढ़ाने की मिसाल पेश की है। जौरा तहसील के कांसपुरा गुड आसान गांव के रहने वाले 55 वर्षीय बनवारी लाल कुशवाह ने गेहूं और बाजरे की खेती के बजाय गेंदा फूल उगाना शुरू किया। आज वह एक बीघा जमीन से करीब 70 से 80 हजार रुपये तक की आमदनी हासिल कर रहे हैं।
बनवारी लाल ने लगभग पांच साल पहले महज 10 बिस्वा जमीन पर गेंदे की खेती शुरू की थी। शुरुआती अनुभव और बेहतर कमाई मिलने के बाद उन्होंने अगले साल एक बीघा क्षेत्र में फूलों की खेती की। अब वह मौसम और बाजार की मांग के अनुसार दो से पांच बीघा तक में गेंदा उगाते हैं।
उनकी सफलता दिखाती है कि किसान पारंपरिक अनाज की खेती के साथ वैकल्पिक फसलों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने के अवसर तलाश सकते हैं।
एक बीघा में 70 से 80 हजार रुपये की कमाई
बनवारी लाल कुशवाह के अनुसार, एक बीघा जमीन में गेंदा फूल की खेती से लगभग 70 से 80 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। इसमें खेती की लागत करीब 25 हजार रुपये बताई गई है। इस हिसाब से खर्च घटाने के बाद लगभग 45 से 55 हजार रुपये तक की राशि बच सकती है।
हालांकि, वास्तविक मुनाफा फूलों की पैदावार, बाजार में मिलने वाले भाव, मजदूरी, खाद और परिवहन जैसे खर्चों पर निर्भर करता है।
पारंपरिक खेती में सीमित आमदनी की चुनौती को देखते हुए बनवारी लाल ने फूलों की खेती को एक अतिरिक्त आय के साधन के रूप में विकसित किया। उनकी सफलता से क्षेत्र के दूसरे किसान भी नकदी फसलों की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं।
जुलाई में रोपाई, अक्टूबर से मिलने लगते हैं फूल
बनवारी लाल गेंदा फूल की खेती के लिए जुलाई में पौधों की रोपाई करते हैं। इसके बाद अक्टूबर से दिसंबर तक फूलों की तुड़ाई और बिक्री का सिलसिला चलता है।
गेंदे के फूलों की खासियत यह है कि पौधों पर कई हफ्तों तक फूल आते रहते हैं। इससे किसानों को एक ही फसल से अलग-अलग समय पर तुड़ाई करके बाजार में उपज बेचने का अवसर मिलता है।
मानसून के दौरान बारिश के कारण सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है। वहीं, अक्टूबर और नवंबर में मौसम तथा मिट्टी की नमी के अनुसार लगभग 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जाती है। सही समय पर पानी और खाद उपलब्ध कराने से फसल की बढ़वार और फूलों की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है।
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ग्वालियर और आगरा की मंडियों में बिकते हैं फूल
बनवारी लाल की उपज केवल मुरैना तक सीमित नहीं है। वह ग्वालियर और आगरा की मंडियों में भी गेंदे के फूल बेचते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बाजार में फूलों का भाव करीब 60 रुपये प्रति किलो तक मिल जाता है, हालांकि कीमत मांग, गुणवत्ता और मौसम के अनुसार बदल सकती है।
नवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों में गेंदे के फूलों की मांग बढ़ जाती है। धार्मिक आयोजनों, पूजा-पाठ, घरों की सजावट और माला बनाने में इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
बनवारी लाल की फसल का समय भी प्रमुख त्योहारों के आसपास पड़ता है। इससे उन्हें बाजार की मांग का फायदा उठाने और उपज बेचने के बेहतर अवसर मिलते हैं।
एक ही खेत से गेंदा और गेहूं की खेती
बनवारी लाल की खेती का एक महत्वपूर्ण पहलू फसल चक्र का इस्तेमाल करना है। वह जुलाई में गेंदे के पौधे लगाते हैं और अक्टूबर से दिसंबर तक फूलों की तुड़ाई करते हैं। फूलों का सीजन समाप्त होने के बाद उसी खेत में गेहूं की बुवाई कर देते हैं।
इस तरीके से एक ही जमीन से अलग-अलग समय पर नकदी फसल और खाद्यान्न प्राप्त करने का अवसर मिलता है। हालांकि, यह व्यवस्था स्थानीय मौसम, फूलों की फसल हटाने के समय और गेहूं की बुवाई के अनुकूल समय पर निर्भर करती है।
इस तरह की योजना किसानों को खेत का बेहतर उपयोग करने और आय के अलग-अलग स्रोत विकसित करने में मदद कर सकती है।
उद्यानिकी विभाग से मिली प्रेरणा
बनवारी लाल ने गेंदे की खेती का क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ाया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उद्यानिकी विभाग से मिली जानकारी और प्रेरणा ने उन्हें फूलों की खेती की ओर आगे बढ़ने में मदद की।
चंबल क्षेत्र में लंबे समय से गेहूं और बाजरा प्रमुख फसलें रही हैं। ऐसे में गेंदा जैसी नकदी फसल अपनाना स्थानीय किसानों के लिए एक नया विकल्प बन सकता है।
हालांकि, फूलों की खेती शुरू करने से पहले किसानों को अपने क्षेत्र की मिट्टी, पानी की उपलब्धता, स्थानीय मंडियों की मांग और परिवहन खर्च का आकलन करना चाहिए। गेंदा जल्दी बिकने वाली उपज है, इसलिए बाजार तक समय पर पहुंचना भी महत्वपूर्ण होता है।
दूसरे किसानों के लिए बने प्रेरणास्रोत
बनवारी लाल अपने अनुभव आसपास के किसानों के साथ साझा करते हैं और उन्हें गेंदा फूल की खेती की संभावनाओं के बारे में बताते हैं। उनके अनुसार, किसान शुरुआत में अपनी जमीन के एक छोटे हिस्से में फूल उगाकर इसका अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
गेंदे की खेती में नियमित तुड़ाई, निराई-गुड़ाई और बाजार तक फूल पहुंचाने के लिए मेहनत की जरूरत होती है। इसके बावजूद, त्योहारों के दौरान मिलने वाली मांग किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का अवसर पैदा कर सकती है।
मुरैना जिले में फूलों की खेती अभी सीमित क्षेत्रों में की जा रही है, लेकिन बनवारी लाल जैसे किसानों के अनुभव इस दिशा में जागरूकता बढ़ा रहे हैं।

