कृषक सारथी स्टार्टअप 6 राज्यों में 15 हजार से अधिक किसानों को गोबर से वर्मीकम्पोस्ट बनाने और बेचने से जोड़ रहा है। जानें इस मॉडल की खास बातें।
गोबर से वर्मीकम्पोस्ट बनाकर किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है। स्टार्टअप इंडिया के मार्गदर्शन और सहयोग से कृषि क्षेत्र में नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी कड़ी में ‘कृषक सारथी’ किसानों को वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन और उसकी बिक्री से जोड़कर कमाई का नया जरिया विकसित कर रहा है। यह पहल अब देश के 6 राज्यों में 15 हजार से अधिक किसानों तक पहुंच चुकी है।
कृषि अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. सुमित गौड़ के नेतृत्व में कृषक सारथी ने डेटा, शोध और जमीनी अनुभव के आधार पर वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन एवं विपणन का मॉडल तैयार किया है। इसका उद्देश्य किसानों के पास उपलब्ध गोबर का बेहतर उपयोग करना और उसे अतिरिक्त आमदनी के स्रोत में बदलना है।
कच्चे गोबर से जैविक खाद बनाने पर जोर
डॉ. सुमित गौड़ के अनुसार, किसानों के सामने कच्चे गोबर के उचित प्रबंधन की चुनौती बनी रहती है। खेतों में बिना प्रसंस्करण के गोबर डालने से खरपतवार, कीट और रोग संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी बनी रहती है।
कृषक सारथी इस समस्या के समाधान के लिए गोबर को वर्मीकम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद में बदलने पर काम कर रहा है। इस मॉडल के तहत गोबर की उपलब्धता वाले किसानों और गौशालाओं में खाद उत्पादन की इकाइयां स्थापित की जाती हैं। इससे गोबर का उपयोगी प्रसंस्करण होता है और किसानों के लिए कमाई का अतिरिक्त अवसर तैयार होता है।
6 राज्यों में 15 हजार से अधिक किसानों से जुड़ा नेटवर्क
कृषक सारथी के मुताबिक, उसका नेटवर्क देशभर के 6 राज्यों के 15 से 16 जिलों में फैला हुआ है। इस पहल से अब तक 15 हजार से अधिक किसान जुड़ चुके हैं।
जिन किसानों और गौशालाओं के पास पर्याप्त मात्रा में गोबर उपलब्ध है, वहां उत्पादन क्षमता के अनुसार वर्मीकम्पोस्ट इकाइयां स्थापित की जाती हैं। इन इकाइयों की उत्पादन क्षमता न्यूनतम 250 क्विंटल से लेकर 2,000 क्विंटल तक बताई गई है।
कंपनी का कहना है कि वह उत्पादन की 100 प्रतिशत गारंटी के साथ तैयार खाद की बिक्री के लिए संबंधित क्षेत्रों में विपणन व्यवस्था भी उपलब्ध कराती है। इससे उत्पादकों को बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है।
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बाजार मूल्य से करीब 40 प्रतिशत सस्ती खाद
कृषक सारथी के इस मॉडल का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों को किफायती दरों पर गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद उपलब्ध कराना भी है। कंपनी के अनुसार, संबंधित क्षेत्रों के किसानों को वर्मीकम्पोस्ट बाजार में मिलने वाली कीमत से लगभग 40 प्रतिशत कम दर पर उपलब्ध कराया जाता है।
इस व्यवस्था से स्थानीय स्तर पर खाद की आपूर्ति और विपणन को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा, उत्पादक समूहों के माध्यम से बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) आधार पर निर्यात की मांग को पूरा करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
तकनीकी और आर्थिक प्रबंधन के आधार पर वर्मीकम्पोस्ट की उत्पादन लागत लगभग 1.50 रुपये प्रति किलोग्राम तक रखे जाने का दावा किया गया है। कम लागत पर खाद तैयार करने का यह तरीका किसानों और संबंधित उद्यमों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
4 कंपनियां और 50 से अधिक MSME भी जुड़े
कृषक सारथी के अनुसार, इस पहल के तहत फिलहाल 4 प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां और देशभर में 50 से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) काम कर रहे हैं। इसके अलावा, 150 से अधिक कृषि विद्यार्थी और विशेषज्ञ भी इस मॉडल से जुड़े हुए हैं।
स्टार्टअप इंडिया के सेमिनारों और मार्गदर्शन के जरिए इस पहल को देश के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे कृषि क्षेत्र में नए व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देने और युवाओं को उद्यमिता से जोड़ने की संभावनाएं बन रही हैं।
कृषि क्षेत्र में नवाचार से बढ़ सकती है किसानों की आय
डॉ. सुमित गौड़ का कहना है कि स्टार्टअप इंडिया ने युवाओं को नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से नए व्यवसाय शुरू करने के अवसर दिए हैं। उचित मार्गदर्शन और सरकारी सहयोग से कृषि क्षेत्र में नए मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।
कृषक सारथी की पहल गोबर के बेहतर प्रबंधन, वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन और उसके विपणन को एक साथ जोड़ती है। इस तरह के मॉडल किसानों के लिए अतिरिक्त आय के विकल्प विकसित करने, जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ाने और कृषि आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकते हैं।

