शहपुरा और पाटन में कृषि विभाग ने किसानों को यूरिया के संतुलित उपयोग, मिट्टी की उर्वरता और प्राकृतिक खेती अपनाने के प्रति जागरूक किया।
रासायनिक उर्वरकों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर कृषि विभाग ने किसानों को जागरूक करना शुरू किया है। इसी क्रम में किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के अधिकारियों ने शहपुरा और पाटन विकासखंड के कई गांवों का दौरा कर किसानों से बातचीत की। अधिकारियों ने किसानों को यूरिया और अन्य रासायनिक खादों का उपयोग निर्धारित मात्रा में करने तथा प्राकृतिक खेती को अपनाने की सलाह दी।
इस अभियान का उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना, फसलों के संतुलित पोषण को बढ़ावा देना और खेती में रासायनिक उर्वरकों के अनावश्यक इस्तेमाल को कम करना है।
शहपुरा और पाटन के गांवों में पहुंची कृषि विभाग की टीम
कृषि विभाग की टीम ने विकासखंड शहपुरा के सालीवाड़ा, बेलखेड़ा, बेलखेड़ी, झुराई पिपरिया और इमलिया गांवों का भ्रमण किया। इसके अलावा पाटन विकासखंड के धमनी, कटरा बेलखेड़ा और जमुनिया गांवों में भी किसानों से संपर्क किया गया।
इस दौरान उप संचालक कृषि उमेश कटहरे और परियोजना संचालक आत्मा डॉ. इंदिरा त्रिपाठी ने उन किसानों से चर्चा की, जिन्होंने निर्धारित अनुशंसा से अधिक मात्रा में उर्वरक प्राप्त किया था।
बातचीत में कुछ किसानों ने बताया कि फसल की स्थिति कमजोर होने या फसल खराब होने की आशंका के कारण उन्होंने अतिरिक्त खाद का इस्तेमाल किया था। अधिकारियों ने किसानों को समझाया कि फसल की समस्या का समाधान केवल अधिक यूरिया डालना नहीं है। खाद का उपयोग फसल की जरूरत, मिट्टी की स्थिति और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना चाहिए।
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यूरिया का अधिक इस्तेमाल मिट्टी की सेहत के लिए नुकसानदायक
उप संचालक कृषि उमेश कटहरे ने किसानों को बताया कि रासायनिक उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ पोषक तत्वों के संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि फसल की बढ़वार कमजोर होने पर बिना कारण जाने अतिरिक्त यूरिया डालने के बजाय कृषि विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लें। मिट्टी की जांच और फसल की वास्तविक जरूरत के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करना अधिक उपयोगी हो सकता है।
ज्यादा यूरिया डालने से फसल की गुणवत्ता पर पड़ सकता है असर
परियोजना संचालक आत्मा डॉ. इंदिरा त्रिपाठी ने किसानों को संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि नाइट्रोजन की जरूरत से अधिक मात्रा देने से फसल की सामान्य वृद्धि और पोषक तत्वों के संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कुछ परिस्थितियों में इससे फसल की रोग एवं कीट संबंधी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
उन्होंने किसानों से अपील की कि खाद की मात्रा तय करते समय फसल की किस्म, मिट्टी की उर्वरता और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसाओं को ध्यान में रखें। संतुलित पोषण से मिट्टी की सेहत बनाए रखने और उत्पादन संबंधी जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
प्राकृतिक खेती अपनाने पर भी दिया गया जोर
कृषि अधिकारियों ने किसानों को अपनी जमीन के कुछ हिस्से में प्राकृतिक खेती शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसका उद्देश्य खेती में रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के विकल्पों को बढ़ावा देना है।
किसानों को सलाह दी गई कि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्राकृतिक खेती की उपयुक्त विधियां अपनाएं और शुरुआत छोटे क्षेत्र से कर सकते हैं। इससे उन्हें पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को समझने और उनके परिणामों का आकलन करने का अवसर मिलेगा।
कृषि अधिकारियों को जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश
गांवों के भ्रमण के दौरान वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी शहपुरा एस.के. परतेती सहित क्षेत्रीय कृषि अधिकारियों को किसानों के बीच संतुलित उर्वरक उपयोग के बारे में जागरूकता बढ़ाने के निर्देश दिए गए।
अधिकारियों का जोर इस बात पर रहा कि किसान खाद का इस्तेमाल अनुमान के आधार पर न करें, बल्कि मिट्टी की जांच, फसल की आवश्यकता और वैज्ञानिक सलाह को प्राथमिकता दें।
किसानों के लिए जरूरी सलाह: यूरिया का उपयोग निर्धारित मात्रा में करें, मिट्टी की जांच कराएं और फसल कमजोर होने पर अतिरिक्त खाद डालने से पहले कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, खेती की लागत नियंत्रित करने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

