Toxic Movie Review: यश की फिल्म में शानदार एक्शन, दमदार विजुअल्स और ग्लैमर है, लेकिन कमजोर कहानी और स्क्रीनप्ले दर्शकों को निराश करते हैं।
Toxic Movie Review: साउथ सिनेमा के सुपरस्टार यश ने लंबे इंतजार के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर ली है। ‘KGF: Chapter 2’ के बाद उनकी नई फिल्म ‘Toxic’ को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता थी। फिल्म का ट्रेलर देखकर लगा था कि यश इस बार भी एक दमदार और बड़े पैमाने की एक्शन फिल्म लेकर आ रहे हैं। हालांकि, फिल्म देखने के बाद इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले नजर आती है।
गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी यह फिल्म विजुअल्स, भव्य सेट, एक्शन सीक्वेंस और यश के स्टारडम पर काफी निर्भर करती है। लेकिन तीन घंटे से ज्यादा की लंबाई के बावजूद कहानी दर्शकों को मजबूती से बांध नहीं पाती।
Toxic की कहानी क्या है?
‘Toxic’ की कहानी पुराने दौर के गोवा की पृष्ठभूमि में बुनी गई है, जहां अपराध, तस्करी और ताकत की दुनिया के बीच राया नाम का किरदार अपनी अलग पहचान बनाता है। फिल्म में उसके निजी रिश्तों और पारिवारिक जिंदगी को भी कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया है।
राया के परिवार में उसके माता-पिता और बहन गंगा का किरदार महत्वपूर्ण है। इसके अलावा उसकी जिंदगी में नादिया की एंट्री होती है। कहानी में एलिजाबेथ, टोनी, रेबेका और मेलिसा जैसे कई दूसरे किरदार भी दिखाई देते हैं।
फिल्म में परिवार, प्यार, विश्वासघात, अपराध और सत्ता जैसे कई विषयों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। समस्या यह है कि इतने सारे ट्रैक होने के बावजूद किसी भी पहलू को पर्याप्त गहराई नहीं मिल पाती।
यश की एक्टिंग कैसी है?
यश फिल्म के सबसे बड़े आकर्षण हैं और इसमें कोई शक नहीं कि उनका स्क्रीन प्रेजेंस जबरदस्त है। उनका लुक, अंदाज, एक्शन और स्वैग फैंस को पसंद आ सकता है।
फिल्म में यश राया और उसके बेटे रूमी की भूमिका निभाते नजर आते हैं। अभिनेता ने दोनों किरदारों को अलग अंदाज देने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण किरदारों की भावनाएं पूरी तरह उभरकर सामने नहीं आ पातीं।
कई जगह यश का स्टारडम उनके किरदार पर हावी होता दिखाई देता है। जहां कहानी को भावनात्मक ठहराव की जरूरत होती है, वहां फिल्म दोबारा एक्शन या स्टाइल की तरफ मुड़ जाती है।
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नयनतारा और बाकी कलाकारों का क्या रहा हाल?
नयनतारा जैसी अनुभवी अभिनेत्री को फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका मिली है, लेकिन उनके किरदार को वह विस्तार नहीं दिया गया जिसकी उम्मीद की जा सकती थी। उनका किरदार कहानी में भावनात्मक मजबूती ला सकता था, मगर स्क्रीनप्ले इसका पूरा फायदा नहीं उठा पाता।
कियारा आडवाणी की मौजूदगी फिल्म में ग्लैमर बढ़ाती है। उनके किरदार के हिस्से में कई आकर्षक सीक्वेंस हैं, लेकिन चरित्र के स्तर पर उन्हें ज्यादा गहराई नहीं मिलती।
हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, अक्षय ओबेरॉय, संजीदा शेख और रुक्मिणी वसंत जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं। इतनी बड़ी स्टारकास्ट होने के बावजूद अधिकांश किरदारों का प्रभाव सीमित ही रह जाता है।
निर्देशन: विजुअल शानदार, लेकिन कहानी कमजोर
गीतू मोहनदास ने ‘Toxic’ को बड़े कैनवास पर पेश करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। फिल्म के सेट, लोकेशन, कैमरा वर्क और एक्शन सीक्वेंस इसकी सबसे मजबूत खूबियों में शामिल हैं।
फिल्म के कई फ्रेम बेहद स्टाइलिश हैं। सर्कस का माहौल, गोवा की दुनिया और यश के एक्शन शॉट्स बड़े पर्दे पर प्रभाव पैदा करते हैं। लेकिन सिर्फ फिल्म को खूबसूरत दिखाना पर्याप्त नहीं होता। कहानी को सही गति और भावनात्मक आधार देना भी जरूरी है। यही वह क्षेत्र है जहां ‘Toxic’ लड़खड़ाती हुई नजर आती है।
कई दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि फिल्म कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय अगले बड़े विजुअल या एक्शन सीन तक पहुंचने में ज्यादा दिलचस्पी रखती है।
लेखन और स्क्रीनप्ले सबसे बड़ी कमजोरी
‘Toxic’ की सबसे बड़ी समस्या इसकी लेखन शैली है। फिल्म के पास कई दिलचस्प आइडिया हैं, लेकिन उन्हें प्रभावी तरीके से जोड़ने में स्क्रीनप्ले कामयाब नहीं हो पाता।
पिता और बेटे का रिश्ता, भाई-बहन का कनेक्शन, रोमांस, अपराध और सत्ता – इन सभी विषयों में संभावनाएं थीं। अगर इन रिश्तों को ज्यादा गहराई से विकसित किया जाता, तो कहानी दर्शकों पर मजबूत असर डाल सकती थी।
फिल्म की लंबाई भी इस समस्या को और बढ़ाती है। तीन घंटे से अधिक का रनटाइम होने के बावजूद कई किरदारों और घटनाओं को समझने के लिए पर्याप्त भावनात्मक स्पेस नहीं मिलता।
एक्शन: स्टाइल बहुत, लॉजिक कम
एक्शन फिल्म की बड़ी ताकत बनने की कोशिश करता है। यश को केंद्र में रखकर कई बड़े एक्शन सीक्वेंस तैयार किए गए हैं।
हालांकि, कुछ जगह एक्शन इतना फिल्मी और अवास्तविक हो जाता है कि दर्शक कहानी से बाहर निकलकर सिर्फ सीन को देखने लगता है। हीरो की जबरदस्त ताकत दिखाने के चक्कर में कई एक्शन मोमेंट्स का लॉजिक कमजोर पड़ जाता है।
फैंस के लिए यश का एक्शन और स्टाइल मनोरंजन दे सकता है, लेकिन कहानी की दृष्टि से इन दृश्यों का प्रभाव उतना मजबूत नहीं बनता।
म्यूजिक: कई जगह जरूरत से ज्यादा तेज
रवि बसरूर का संगीत फिल्म के माहौल को आक्रामक बनाने में मदद करता है। बैकग्राउंड स्कोर एक्शन दृश्यों को ऊर्जा देता है, लेकिन कुछ हिस्सों में म्यूजिक जरूरत से ज्यादा हावी महसूस होता है। कई मौकों पर ऐसा लगता है कि बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को उभारने के बजाय उन्हें दबा देता है।
तकनीकी पक्ष फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
जहां कहानी और स्क्रीनप्ले निराश करते हैं, वहीं तकनीकी पक्ष फिल्म को संभालने की कोशिश करता है। राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। फिल्म के फ्रेम, लाइटिंग और कैमरा मूवमेंट इसे विजुअली आकर्षक बनाते हैं। बड़े सेट और प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म को भव्य रूप देते हैं।
सर्कस वाले सीक्वेंस, गोवा की दुनिया, एक्शन ब्लॉक्स और यश के क्लोज-अप खास तौर पर बड़े पर्दे पर प्रभावशाली नजर आते हैं। VFX भी फिल्म के विशाल स्केल को सपोर्ट करता है।
आखिर कहां ‘Toxic’ हुई फिल्म?
‘Toxic’ में एक बड़ी फिल्म बनने के लिए जरूरी लगभग हर चीज मौजूद है—बड़ा स्टार, शानदार विजुअल्स, एक्शन, ग्लैमर, मजबूत सपोर्टिंग कास्ट और बड़ा प्रोडक्शन स्केल।
लेकिन इन सबके बीच कहानी पीछे छूट जाती है।
फिल्म को देखकर सबसे ज्यादा यही महसूस होता है कि मेकर्स ने दर्शकों को प्रभावित करने के लिए विजुअल भव्यता और स्टाइल पर ज्यादा भरोसा किया, जबकि कहानी और किरदारों को उतना मजबूत आधार नहीं मिल पाया।
अगर आप यश के जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस, एक्शन और शानदार विजुअल्स के फैन हैं, तो ‘Toxic’ आपको कुछ हद तक एंटरटेन कर सकती है। लेकिन अगर आप एक मजबूत कहानी, दमदार स्क्रीनप्ले और गहरे किरदारों वाली फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म निराश कर सकती है।

