सुप्रीम कोर्ट ज्यूडिशियल सर्विस रूल: 2027 तक लॉ ग्रेजुएट्स को 3 साल की प्रैक्टिस से राहत मिली है। जानें सिविल जज भर्ती की नई पात्रता, ट्रेनिंग और क्लर्कशिप के नियम।
सुप्रीम कोर्ट ज्यूडिशियल सर्विस रूल: सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती की तैयारी कर रहे लॉ ग्रेजुएट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने तीन साल की अनिवार्य वकालत प्रैक्टिस के नियम में बदलाव करते हुए संक्रमणकालीन व्यवस्था लागू की है। इसके तहत 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में उम्मीदवारों को परीक्षा में शामिल होने के लिए पहले से तीन साल की प्रैक्टिस पूरी करना जरूरी नहीं होगा।
हालांकि, यह राहत स्थायी रूप से तीन साल की प्रैक्टिस की आवश्यकता खत्म करने के तौर पर नहीं देखी जानी चाहिए। 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए पात्रता का नया ढांचा लागू होगा, जिसमें परीक्षा से पहले एक साल की वास्तविक प्रैक्टिस आवश्यक होगी।
लॉ ग्रेजुएट्स को 2027 तक क्या राहत मिली?
सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों का सबसे बड़ा फायदा उन नए लॉ ग्रेजुएट्स को मिलेगा, जो बिना लंबी प्रैक्टिस अवधि के न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
संक्रमणकालीन अवधि में जारी होने वाली सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती के लिए उम्मीदवार बिना तीन साल की बार प्रैक्टिस पूरी किए आवेदन कर सकेंगे। रिपोर्टों के मुताबिक, इस अवधि में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के लिए एक साल की प्रैक्टिस को निर्धारित व्यवस्था के तहत माना जाएगा और उन्हें उस अवधि के लिए अलग से प्रैक्टिस सर्टिफिकेट पेश करने की जरूरत नहीं होगी।
यह बदलाव मई 2025 में तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य किए जाने के बाद पैदा हुई स्थिति को देखते हुए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उस समय कई लॉ ग्रेजुएट्स पहले से लागू व्यवस्था के आधार पर न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।
1 अप्रैल 2027 के बाद क्या बदलेगा?
सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने से पहले कम से कम एक साल की वास्तविक बार प्रैक्टिस पूरी करनी होगी।
यानी तीन साल की पुरानी अनिवार्यता को घटाकर एक साल की प्रैक्टिस की व्यवस्था की गई है। इसके बाद चयनित उम्मीदवारों को संस्थागत ट्रेनिंग और क्लर्कशिप के जरिए व्यावहारिक न्यायिक अनुभव दिया जाएगा।
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चयन के बाद दो साल की ट्रेनिंग और क्लर्कशिप
नई व्यवस्था में सिर्फ परीक्षा पास करना ही पर्याप्त नहीं होगा। चयनित उम्मीदवारों को पहले ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर के तौर पर प्रशिक्षण से गुजरना होगा।
इसके तहत:
- एक साल की ट्रेनिंग: चयनित उम्मीदवार संबंधित राज्य की Judicial Academy में गहन प्रशिक्षण लेंगे।
- छह महीने की क्लर्कशिप: यह अवधि Principal District Judge, District & Sessions Judge या Higher Judicial Service के किसी सदस्य के अधीन होगी।
- अगले छह महीने की क्लर्कशिप: उम्मीदवार संबंधित हाईकोर्ट के मौजूदा जज के साथ काम करेंगे।
इस तरह चयन के बाद कुल दो साल का संरचित प्रशिक्षण और क्लर्कशिप चरण होगा। इसका उद्देश्य नए न्यायिक अधिकारियों को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली और न्यायिक जिम्मेदारियों का व्यावहारिक अनुभव देना है।
तीन साल की प्रैक्टिस की जगह नया मॉडल क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के लिए तीन साल की बार प्रैक्टिस को अनिवार्य किया था। उस फैसले में यह भी कहा गया था कि नियुक्ति के बाद न्यायिक अधिकारियों को कम से कम एक साल का प्रशिक्षण लेना चाहिए।
बाद में इस नियम के खिलाफ समीक्षा याचिकाएं दाखिल हुईं। सुनवाई के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि अनिवार्य तीन साल का इंतजार युवा लॉ ग्रेजुएट्स, महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश को कठिन बना सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2026 में इन समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा था।
अब अदालत ने तीन साल की पूर्व-प्रैक्टिस की शर्त को नरम करते हुए व्यावहारिक अनुभव हासिल करने के लिए एक साल की प्रैक्टिस + दो साल की संस्थागत ट्रेनिंग/क्लर्कशिप वाला मॉडल अपनाया है।
लॉ ग्रेजुएट्स के लिए इसका क्या मतलब है?
इस फैसले से न्यायिक सेवा की तैयारी करने वाले नए कानून स्नातकों के लिए प्रवेश का रास्ता अपेक्षाकृत आसान होगा। खासतौर पर वे उम्मीदवार जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक परीक्षा देना चाहते हैं, उन्हें तीन साल तक सिर्फ पात्रता पूरी करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
साथ ही, अदालत ने व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। नई व्यवस्था में प्रैक्टिस के साथ-साथ Judicial Academy की ट्रेनिंग और कोर्ट-केंद्रित क्लर्कशिप को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
मई 2025 के फैसले के बाद क्यों जरूरी हुई थी राहत?
तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त मई 2025 में अचानक लागू होने के बाद उन उम्मीदवारों के लिए चुनौती बन गई थी, जिन्होंने पहले की पात्रता व्यवस्था के आधार पर अपनी पढ़ाई और करियर की योजना बनाई थी। समीक्षा याचिकाओं में इसी तरह की कठिनाइयों का मुद्दा उठाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की नई संक्रमणकालीन व्यवस्था का उद्देश्य इसी बदलाव से प्रभावित उम्मीदवारों को तत्काल राहत देना है, जबकि भविष्य में न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए व्यावहारिक अनुभव और संस्थागत प्रशिक्षण दोनों को बनाए रखना है।

