Lenskart विवाद पर पीयूष बंसल बोले—वायरल स्टाइल गाइड पुराना ट्रेनिंग नोट, मौजूदा नीति में किसी धार्मिक प्रतीक पर प्रतिबंध नहीं।
देश की प्रमुख आईवियर कंपनी Lenskart हाल ही में अपने ड्रेस कोड को लेकर विवादों में घिर गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक कथित स्टाइल गाइड दस्तावेज को लेकर लोगों ने कंपनी पर धार्मिक पक्षपात के आरोप लगाए। इस पूरे मामले में अब कंपनी के संस्थापक पीयूष बंसल ने सामने आकर स्थिति स्पष्ट की है।
पीयूष बंसल ने साफ तौर पर कहा कि जो दस्तावेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, वह कंपनी की मौजूदा नीति नहीं है, बल्कि एक पुराना ट्रेनिंग नोट है। उन्होंने बताया कि यह दस्तावेज पहले कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया गया था, लेकिन बाद में कंपनी ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए इन बिंदुओं को हटा दिया था। उनके अनुसार, वर्तमान में Lenskart की पॉलिसी पूरी तरह अपडेटेड है और इसमें किसी भी धर्म के प्रतीकों पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब फिल्म निर्माता और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पंडित ने इस दस्तावेज को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी हिजाब और पगड़ी की अनुमति देती है, लेकिन हिंदू धार्मिक प्रतीकों जैसे बिंदी, तिलक और कलावा पर रोक लगाती है। इस आरोप के बाद सोशल मीडिया पर #BoycottLenskart जैसे ट्रेंड भी देखने को मिले।
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वायरल दस्तावेज में दावा किया गया था कि कर्मचारियों को बिंदी और तिलक लगाने की अनुमति नहीं है, धार्मिक धागों को हटाने की सलाह दी गई थी और सिंदूर सीमित मात्रा में लगाने की बात कही गई थी। वहीं, हिजाब और पगड़ी की अनुमति थी, लेकिन उनके रंग और स्टाइल को लेकर कुछ शर्तें बताई गई थीं। इन निर्देशों ने लोगों के बीच असंतोष पैदा किया और कंपनी पर भेदभाव के आरोप लगे।
हालांकि, कंपनी ने अब स्पष्ट कर दिया है कि ये सभी निर्देश पुराने हैं और वर्तमान एचआर नीति का हिस्सा नहीं हैं। Lenskart के अनुसार, अब ड्रेस कोड में किसी भी कर्मचारी की धार्मिक पहचान को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है और सभी को अपनी आस्था के अनुसार प्रतीक पहनने की पूरी स्वतंत्रता है।
गौरतलब है कि Lenskart भारत की सबसे बड़ी आईवियर कंपनियों में से एक है और 2019 में यह यूनिकॉर्न स्टेटस हासिल कर चुकी है। ऐसे में इस विवाद का असर कंपनी की छवि पर भी पड़ा और उसे सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी।
फिलहाल कंपनी की सफाई के बाद विवाद कुछ हद तक शांत होता नजर आ रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर बहस अभी भी जारी है। यह मामला एक बार फिर कॉर्पोरेट नीतियों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।

