Braj Holi 2025: फगवा, यानी होली, पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन ब्रज में रंगोत्सव अलग है। लठ्ठमार, लड्डू की होली और रंगों से होली इस स्थान पर खेली जाती है।
Braj Holi 2025: ब्रज की होली पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। रंगोत्सव एक या दो दिन नहीं बल्कि चालीस दिन तक चलता है। यहां बसंत पंचमी से होली शुरू होती है। ब्रज पर रंगों के अलावा फूल, लड्डू, लठ्ठमार होली भी खेली जाती है।
बसंत-पंचमी के दिन ब्रज में होली होती है। ब्रज का अर्थ है मथुरा, वृंदावन, बरसाना और गोकुल, जहां श्रीकृष्ण और राधा रानी ने अपना जीवन बिताया था। यहां लोग राधा रानी और बांके बिहारी की पूजा करते हैं और होली खेलते हैं।
ब्रज रंगोत्सव का शेड्यूल 2025
- 3 फरवरी 2025 बसंत पंचमी पर बरसाना के लाडलीजी मंदिर में होली का डांढा गाड़ा गया.
- 28 फरवरी 2025 बरसाना के श्रीराधारानी मंदिर में रंगोत्सव होगा.
- 7 मार्च 2025 राधारानी मंदिर में लड्डूमार होली होगी. नंदगांव में फाग आमंत्रण उत्सव होगा. होली खेलने के लिए सखियों को न्योता दिया जाता है
- 8 मार्च 2025 बरसाना में लठ्ठमार होली होगी.
- 10 मार्च 2025 रंगभरी एकादशी पर बांके बिहारी मंदिर और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर होली होगी.
- 10 मार्च 2025 बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली और छड़ीमार होली खेली जाएगी.
- 11 मार्च 2025 द्वारकाधीश मंदिर, गोकुल के रमणरेती मंदिर में होली होगी.
- 13 मार्च 2025 होलिका दहन.
- 14 मार्च 2025 पूरे ब्रज में रंगों की होली होगी.
- 15 मार्च 2025 बलदेवमें दाऊजी का हुरंगा.
- 16 मार्च 2025 नंदगांव के हुरंगा.
- 21 मार्च 2025 रंगपंचमी.
- 22 मार्च 2025 वृंदावन के रंगनाथ जी मंदिर में हुरंगा होगा.
लठमार होली: बरसाने की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां की महिलाएं रंगों की होली खेलने से पहले लठमार होली खेलती थीं. दवापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा और उनकी सखियों के साथ यह परंपरा शुरू की थी, जो आज तक जारी है।
लड्डूमार होली खेलने का कारण क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, राधा रानी के पिता वृषभानु ने द्वापर में श्रीकृष्ण के पिता को नंदगांव में होली खेलने का निमंत्रण दिया था। बरसाने की गोपियां नंदगांव में होली का आमंत्रण पत्र लेकर जाती हैं। कान्हा के पिता नंदबाबा ने इसे सहहर्ष स्वीकार किया। एक पुरोहित बरसाना को न्योता स्वीकृति पत्र देता है। बरसाने में पुरोहित की आदत का सम्मान किया गया है।
लड्डु से पुरोहित का मुंह मिठा कराया करते हैं। उस समय कुछ गोपियां उन्हें गुलाल लगाती हैं। पुरोहित जी के पास गुलाल नहीं था, इसलिए वह जवाब में गोपियों पर लड्डू बरसाने लगे। द्वापर युग की यह घटना आजकल लड्डू होली के नाम से जानी जाती है। आज भी यह परंपरा जारी है।
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