राजस्थान के भीलवाड़ा में मांडलगढ़ क्षेत्र के किसान करीब 300 हेक्टेयर में संतरे की खेती कर रहे हैं। जानें मिनी नागपुर की पहचान, बाजार और सरकारी सहायता के बारे में।
राजस्थान का भीलवाड़ा जिला अब सिर्फ टेक्सटाइल उद्योग के लिए ही नहीं, बल्कि संतरे की खेती के लिए भी अपनी अलग पहचान बना रहा है। जिले के मांडलगढ़ और ऊपरमाल क्षेत्र में किसान बड़े पैमाने पर नागपुरी संतरे की खेती कर रहे हैं। संतरे के उत्पादन के कारण भीलवाड़ा को ‘मिनी नागपुर’ के नाम से भी जाना जाता है। यहां उगाए जाने वाले संतरे की मांग राजस्थान के बाहर भी है और इसकी आपूर्ति दिल्ली सहित देश के अन्य बाजारों में की जाती है।
भीलवाड़ा की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, अब बागवानी और फल उत्पादन भी जिले के किसानों के लिए आय के नए अवसर तैयार कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर संतरे की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग भी किसानों को तकनीकी जानकारी और सरकारी योजनाओं के माध्यम से सहायता उपलब्ध करा रहा है।
भीलवाड़ा के मांडलगढ़ में संतरे की खेती क्यों है खास?
भीलवाड़ा जिले का मांडलगढ़ क्षेत्र संतरा उत्पादन के प्रमुख इलाकों में गिना जाता है। यहां की कृषि परिस्थितियां संतरे की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। क्षेत्र की काली और उपजाऊ मिट्टी तथा पानी की अच्छी गुणवत्ता बागवानी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाकर किसान संतरे के बगीचे विकसित कर रहे हैं। जिले में खास तौर पर नागपुरी किस्म के संतरे की खेती की जाती है, जिसकी बाजार में मांग बनी रहती है।
उद्यान विभाग के कृषि अधिकारी डॉ. शंकर सिंह राठौड़ के अनुसार, मांडलगढ़ क्षेत्र संतरा उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भीलवाड़ा की संतरे की खेती को राजस्थान की ‘पंच गौरव’ पहल में भी शामिल किया गया है, जिससे इस क्षेत्र की कृषि पहचान को बढ़ावा मिल रहा है।
करीब 300 हेक्टेयर क्षेत्र में हो रही संतरे की खेती
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भीलवाड़ा जिले में लगभग 300 हेक्टेयर भूमि पर संतरे की खेती की जाती है। किसान इस बागवानी गतिविधि के जरिए स्थानीय कृषि क्षेत्र को नई दिशा दे रहे हैं।
संतरे की खेती में किसानों को बाजार की मांग के अनुसार उपज बेचने का अवसर मिलता है। हालांकि, वास्तविक कमाई उत्पादन, फल की गुणवत्ता, खेती की लागत और बाजार में मिलने वाली कीमत पर निर्भर करती है।
भीलवाड़ा में उत्पादित संतरे की आपूर्ति दिल्ली सहित अन्य बाजारों तक होने से स्थानीय किसानों को जिले के बाहर भी अपनी उपज बेचने का अवसर मिलता है।
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भीलवाड़ा के संतरे की दिल्ली तक मांग
भीलवाड़ा में संतरा उत्पादन बढ़ने के साथ इसकी बिक्री का दायरा भी स्थानीय बाजारों से आगे बढ़ा है। यहां के संतरे दूसरे शहरों तक पहुंचाए जाते हैं, जिनमें देश की राजधानी दिल्ली भी शामिल है।
बाहरी बाजारों तक पहुंच किसानों के लिए संभावित व्यावसायिक अवसर पैदा करती है। यदि किसानों को उचित कीमत, बेहतर परिवहन और फल की गुणवत्ता बनाए रखने की सुविधाएं मिलें, तो बागवानी से होने वाली आमदनी को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
संतरे की खेती के जरिए भीलवाड़ा की पहचान अब कपड़ा उद्योग के साथ कृषि और बागवानी से भी जुड़ रही है।
राजस्थान की ‘पंच गौरव’ पहल में शामिल है संतरे की खेती
राजस्थान में स्थानीय स्तर पर विशिष्ट पहचान रखने वाले उत्पादों और गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ‘पंच गौरव’ पहल संचालित की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भीलवाड़ा की संतरा खेती को भी इसमें स्थान दिया गया है।
इससे क्षेत्र के प्रमुख कृषि उत्पाद को पहचान दिलाने और बागवानी के प्रति किसानों की रुचि बढ़ाने में मदद मिल सकती है। संतरे की खेती को बढ़ावा मिलने से कृषि आधारित व्यवसायों और स्थानीय बाजारों के विकास की संभावनाएं भी बनती हैं।
संतरे की खेती शुरू करना चाहते हैं किसान? कृषि विभाग से मिलेगी मदद
भीलवाड़ा या आसपास के क्षेत्रों के जो किसान संतरे की खेती शुरू करना चाहते हैं, वे कृषि विभाग के उद्यान अधिकारियों से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राज्य सरकार की लागू योजनाओं के अंतर्गत पात्र किसानों को निर्धारित नियमों के अनुसार सहायता उपलब्ध हो सकती है। कृषि विभाग के माध्यम से बाग लगाने की योजना, पौधों के चयन, खेती की तकनीक और उत्पादन प्रबंधन से जुड़ी जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है।
संतरे की खेती शुरू करने से पहले किसानों को कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- मिट्टी की जांच: खेत की मिट्टी और जल निकासी की स्थिति की जांच कराएं।
- पानी की उपलब्धता: बगीचे के लिए पर्याप्त और उपयुक्त गुणवत्ता वाले पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
- पौधों का चयन: कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उपयुक्त किस्म और स्वस्थ पौधों का चुनाव करें।
- खेती की योजना: बाग लगाने, पौधों की देखभाल और फसल प्रबंधन की योजना पहले तैयार करें।
- बाजार की जानकारी: खेती में निवेश करने से पहले स्थानीय मंडियों और संभावित खरीदारों की जानकारी जुटाएं।
- सरकारी सहायता: संबंधित विभाग से मौजूदा योजनाओं, पात्रता और अनुदान की शर्तों की पुष्टि करें।
इन उपायों से किसानों को संतरे की खेती की शुरुआत सोच-समझकर करने और संभावित जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।
टेक्सटाइल सिटी के साथ कृषि क्षेत्र में भी बढ़ रही भीलवाड़ा की पहचान
भीलवाड़ा लंबे समय से अपने कपड़ा उद्योग के कारण देशभर में जाना जाता है। अब संतरे की खेती भी जिले की एक महत्वपूर्ण पहचान बन रही है। मांडलगढ़ और ऊपरमाल क्षेत्र के किसान बागवानी के जरिए कृषि क्षेत्र में नए अवसर तलाश रहे हैं।
स्थानीय उत्पादन को दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचाने और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देने से इस क्षेत्र में आगे विकास की संभावनाएं बन सकती हैं।

