NSE IPO का साइज घटकर 22,500-23,500 करोड़ रुपये हुआ। जानें IPO की कम वैल्यूएशन, OFS स्ट्रक्चर, अनलिस्टेड मार्केट और निवेशकों के लिए इसके मायने।
NSE IPO: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE के बहुप्रतीक्षित IPO को लेकर तस्वीर अब काफी हद तक साफ हो गई है। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज ने प्रस्तावित इश्यू का आकार शुरुआती अनुमान से कम कर दिया है। अब IPO का साइज करीब 22,500-23,500 करोड़ रुपये रहने की संभावना है, जबकि पहले करीब 30,000 करोड़ रुपये के इश्यू की चर्चा थी।
इसके साथ ही NSE ने अपनी वैल्यूएशन भी बाजार में चल रहे शुरुआती अनुमानों की तुलना में लगभग 15 फीसदी कम रखी है। IPO के जरिए NSE में कोई नया पैसा नहीं आएगा, क्योंकि यह इश्यू पूरी तरह Offer for Sale (OFS) पर आधारित है।
NSE IPO में अब कितने शेयर बिकेंगे?
NSE के अपडेटेड ड्राफ्ट के अनुसार, IPO में करीब 12.64 करोड़ शेयर ऑफर किए जाएंगे। इससे पहले अधिकतम 14.89 करोड़ शेयर बेचने का प्रस्ताव था।
यानी शेयरों की संख्या में भी कटौती की गई है। मौजूदा योजना के तहत बेचे जाने वाले शेयर NSE की कुल पेड-अप कैपिटल का करीब 5.25 फीसदी हिस्सा होंगे। पहले यह अनुपात लगभग 6 फीसदी रहने का अनुमान था।
NSE के MD और CEO आशीष चौहान के मुताबिक, DRHP दाखिल करने से पहले मौजूदा शेयरधारकों से यह पूछा गया था कि वे कितने शेयर ऑफर करना चाहते हैं। इसके बाद निवेश बैंकरों की सलाह और शेयरधारकों की भागीदारी के आधार पर इश्यू का आकार तय किया गया।
NSE को IPO से नहीं मिलेगा पैसा
NSE IPO की सबसे अहम बात यह है कि इसमें फ्रेश इश्यू नहीं है। यानी कंपनी नए शेयर जारी करके पूंजी नहीं जुटा रही है।
यह पूरी तरह OFS है, जिसमें NSE के मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचेंगे। इसलिए IPO से मिलने वाली रकम NSE के कारोबार या विस्तार के लिए कंपनी के पास नहीं जाएगी।
इसी वजह से इश्यू का अंतिम आकार भी इस बात पर निर्भर करता है कि मौजूदा निवेशक अपनी कितनी हिस्सेदारी बेचने के लिए तैयार हैं।
अनलिस्टेड मार्केट से कम वैल्यूएशन क्यों?
NSE के शेयर लंबे समय से अनलिस्टेड मार्केट में निवेशकों की नजर में रहे हैं। पिछले एक साल के दौरान अनलिस्टेड बाजार में NSE के शेयर करीब 1,900 से 2,050 रुपये के स्तर पर कारोबार करते रहे हैं।
इसके मुकाबले IPO के लिए तय की जा रही वैल्यूएशन अपेक्षाकृत कम है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति IPO को निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाने में मदद कर सकती है।
आशिका कैपिटल के सीनियर एसोसिएट ईशान तन्ना के मुताबिक, लगभग 43 गुना FY26 अर्निंग्स की वैल्यूएशन पर भी NSE कई बड़े वैश्विक एक्सचेंजों की तुलना में प्रीमियम पर रहेगा। हालांकि, BSE और MCX जैसी घरेलू लिस्टेड कंपनियों के मुकाबले यह वैल्यूएशन ज्यादा संतुलित दिखाई देती है।
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कम कीमत रखने के पीछे क्या रणनीति है?
बड़े IPO के लिए वैल्यूएशन तय करना काफी महत्वपूर्ण होता है। यदि कंपनी बहुत ऊंची कीमत पर बाजार में उतरती है, तो संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी प्रभावित हो सकती है। साथ ही लिस्टिंग के बाद शेयर पर बिकवाली का दबाव भी बन सकता है।
NSE ने इसके बजाय अपेक्षाकृत आकर्षक वैल्यूएशन का विकल्प चुना है। इससे नए निवेशकों को लिस्टिंग के बाद संभावित तेजी का अवसर मिल सकता है।
इसके अलावा, बड़े इश्यू में संस्थागत निवेशकों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए ऐसी कीमत तय करना जरूरी है जिसे बड़े निवेशक भी उचित मानें।
NSE की कमाई में डेरिवेटिव्स की बड़ी भूमिका
NSE की बाजार में मजबूत पकड़ है, लेकिन कंपनी के कारोबार से जुड़ा एक प्रमुख जोखिम डेरिवेटिव्स सेगमेंट है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, NSE के करीब 60 फीसदी ऑपरेटिंग रेवेन्यू डेरिवेटिव्स कारोबार से आता है। ऐसे में डेरिवेटिव्स मार्केट से जुड़े किसी भी नियामकीय बदलाव का NSE की कमाई पर सीधा असर पड़ सकता है।
SEBI रिटेल ट्रेडिंग, ऑप्शंस में बढ़ती भागीदारी, एक्सपायरी डे पर वोलैटिलिटी और अत्यधिक सट्टेबाजी जैसे मुद्दों पर लगातार नजर रखता है। भविष्य में नियमों में बदलाव होने पर ट्रेडिंग वॉल्यूम प्रभावित हो सकता है।
निवेशकों के लिए ग्रोथ कितना बड़ा फैक्टर?
NSE में निवेश का मुख्य आकर्षण केवल मौजूदा डेरिवेटिव्स कारोबार तक सीमित नहीं है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में तेजी से बढ़ती वित्तीय भागीदारी से NSE को आने वाले वर्षों में फायदा मिल सकता है।
इक्विटी ट्रेडिंग के अलावा इंडेक्स, मार्केट डेटा और अन्य वित्तीय सेवाओं में NSE की मजबूत स्थिति कंपनी के लिए सकारात्मक पहलू है। हालांकि, निवेशकों के लिए यह देखना भी जरूरी होगा कि NSE डेरिवेटिव्स पर निर्भरता घटाकर दूसरे कारोबार से अपनी आय कितनी तेजी से बढ़ाता है।
17 सितंबर से शुरू होगा NSE IPO
मौजूदा जानकारी के अनुसार, NSE IPO 17 सितंबर से खुलने वाला है, जबकि एंकर निवेशकों के लिए प्रक्रिया 16 सितंबर से शुरू होगी। शेयरों की लिस्टिंग सितंबर के चौथे सप्ताह में होने की संभावना जताई जा रही है।
कुल मिलाकर, IPO का छोटा आकार और अपेक्षाकृत कम वैल्यूएशन NSE की रणनीति का अहम हिस्सा दिखाई देता है। कंपनी ने आक्रामक कीमत के बजाय ऐसी वैल्यूएशन चुनी है, जिससे संस्थागत और खुदरा निवेशकों के लिए इश्यू आकर्षक बना रहे।
अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि निवेशक NSE की मौजूदा कमाई, डेरिवेटिव्स पर निर्भरता और भारत के बढ़ते वित्तीय बाजार को देखते हुए इस वैल्यूएशन को कितना उचित मानते हैं।

