Gandhari Review: तापसी पन्नू की दमदार एक्टिंग के बावजूद कमजोर कहानी और जल्दबाजी ने थ्रिलर का रोमांच फीका किया। जानें फिल्म का पूरा रिव्यू।
Gandhari Review: तापसी पन्नू की नई फिल्म ‘गांधारी’ एक ऐसी मां की कहानी पेश करती है, जो अपनी लापता बेटी को खोजने के लिए हर मुश्किल से लड़ने को तैयार है। फिल्म का आधार बेहद गंभीर है और इसमें मां-बेटी के रिश्ते के साथ मानव तस्करी जैसे संवेदनशील मुद्दे को जोड़ा गया है। इसके बावजूद कमजोर स्क्रीनप्ले और घटनाओं को जरूरत से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश फिल्म के प्रभाव को कम कर देती है।
फिल्म में तापसी पन्नू के अलावा इश्वक सिंह, मीता वशिष्ठ, स्वास्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन और चंदन रॉय जैसे कलाकार नजर आते हैं। मजबूत कलाकारों और गंभीर विषय के कारण फिल्म से काफी उम्मीदें बनती हैं, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ ये उम्मीदें कमजोर पड़ने लगती हैं।
क्या है ‘गांधारी’ की कहानी?
फिल्म की कहानी बानी नाम की एक मां के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार तापसी पन्नू ने निभाया है। बानी की छोटी बेटी मिष्टी ट्रेन में सफर के दौरान अचानक लापता हो जाती है। परिवार पुलिस से मदद मांगता है, लेकिन उन्हें वहां से अपेक्षित सहायता नहीं मिलती।
इसके बाद बानी खुद अपनी बेटी की तलाश शुरू करने का फैसला करती है। बेटी को खोजने की इस मुहिम के दौरान उसे पता चलता है कि इलाके में मानव तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय है और कई लड़कियां इसके जाल में फंसी हुई हैं।
कहानी में एक और बड़ा मोड़ तब आता है, जब बानी की आंखों की रोशनी प्रभावित होने लगती है। अपनी शारीरिक कमजोरी के बावजूद वह बेटी की तलाश नहीं छोड़ती और अपराधियों के खिलाफ अकेले संघर्ष शुरू कर देती है।
शुरुआत मजबूत, लेकिन बाद में बिखरती है कहानी
‘गांधारी’ का शुरुआती हिस्सा दर्शकों के भीतर उत्सुकता पैदा करता है। बेटी के गायब होने और उसे तलाशने के लिए मां के संघर्ष को अच्छी तरह स्थापित किया जाता है। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, मानव तस्करी का एंगल कहानी को और गंभीर बनाता है।
समस्या यह है कि फिल्म कई महत्वपूर्ण घटनाओं को पर्याप्त समय दिए बिना आगे बढ़ा देती है। एक घटना के बाद दूसरी घटना इतनी तेजी से सामने आती है कि दर्शकों को किरदारों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने का मौका कम मिलता है।
बानी की जिंदगी में होने वाले बड़े बदलावों को भी जल्दबाजी में दिखाया गया है। उदाहरण के तौर पर, उसकी आंखों की रोशनी लगातार कम होने के बावजूद वह कुछ ही समय में नए लोगों से जुड़ती है और अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने लगती है। इन घटनाओं के बीच जरूरी कड़ियां कमजोर नजर आती हैं।
थ्रिल पैदा करने की कोशिश में बढ़ गई रफ्तार
एक अच्छी थ्रिलर फिल्म के लिए तेज गति जरूरी होती है, लेकिन ‘गांधारी’ में यही तेजी कई जगह समस्या बन जाती है। कहानी को जल्दी-जल्दी आगे ले जाने के चक्कर में कई सीन अपना भावनात्मक प्रभाव खो देते हैं।
फिल्म में रहस्य और डर पैदा करने के लिए कुछ अलग तरह के किरदार और घटनाएं भी जोड़ी गई हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल कहानी को मजबूत करने के बजाय सीमित प्रभाव तक ही रह जाता है। कई बार ऐसा महसूस होता है कि फिल्म दर्शक को घटनाओं का कारण समझाने के बजाय सीधे अगले मोड़ पर पहुंचना चाहती है।
तापसी पन्नू ने संभाली फिल्म की कमान
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष तापसी पन्नू का अभिनय है। बानी के किरदार में वह मां की बेचैनी, गुस्से और बेबसी को प्रभावी ढंग से सामने लाने की कोशिश करती हैं।
खासकर भावनात्मक दृश्यों में उनका प्रदर्शन असर छोड़ता है। बेटी के लिए उनकी तड़प और पति के सामने अपनी मजबूरी व्यक्त करने वाले सीन फिल्म के बेहतर हिस्सों में शामिल हैं।
एक्शन सीक्वेंस में भी तापसी ने पूरी ऊर्जा दिखाई है। हालांकि कमजोर लेखन उनके प्रदर्शन की संभावनाओं को पूरी तरह सामने नहीं आने देता।
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इश्वक सिंह का अभिनय भी प्रभावी
बानी के पति गोकुल की भूमिका में इश्वक सिंह स्वाभाविक नजर आते हैं। उनका किरदार फिल्म में सीमित है, लेकिन अभिनेता ने उपलब्ध स्क्रीन टाइम का अच्छा इस्तेमाल किया है।
गोकुल के रूप में उनका प्रदर्शन कहानी को भावनात्मक आधार देने की कोशिश करता है। हालांकि उनके किरदार को ज्यादा गहराई मिलती तो इसका असर और बेहतर हो सकता था।
सपोर्टिंग कास्ट का नहीं हो पाया पूरा इस्तेमाल
‘गांधारी’ में कई अनुभवी कलाकार मौजूद हैं। मीता वशिष्ठ, स्वास्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन और चंदन रॉय जैसे कलाकार फिल्म का हिस्सा हैं।
इतनी मजबूत कास्ट के बावजूद ज्यादातर सहायक किरदारों को पर्याप्त स्पेस नहीं दिया गया। कई किरदार कहानी में आते हैं, कुछ समय दिखाई देते हैं और फिर उनका महत्व कम हो जाता है।
विशेष रूप से प्रशांत नारायणन से ज्यादा उम्मीद की जा सकती थी। उन्हें नकारात्मक भूमिका में देखने की संभावना रोमांच पैदा करती है, लेकिन उनका किरदार उस स्तर का खतरा पैदा नहीं कर पाता जिसकी उम्मीद की जाती है।
निर्देशन और लेखन में रह गई कमी
फिल्म की कहानी और पटकथा कनिका ढिल्लों से जुड़ी है, जबकि निर्देशन देवाशीष मखीजा ने किया है। कागज पर फिल्म का कॉन्सेप्ट काफी मजबूत दिखाई देता है। एक मां की बेटी की तलाश, मानव तस्करी का नेटवर्क, पुलिस व्यवस्था से निराशा और अपनी कमजोरी से लड़ती महिला—इन सभी तत्वों को मिलाकर एक प्रभावशाली थ्रिलर तैयार की जा सकती थी।
लेकिन स्क्रीनप्ले में घटनाओं के बीच कनेक्शन कई जगह कमजोर पड़ता है। कहानी में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जिनके लिए पर्याप्त पृष्ठभूमि तैयार नहीं की गई। इससे कई घटनाएं स्वाभाविक होने के बजाय कहानी को आगे बढ़ाने का माध्यम लगती हैं।
निर्देशक ने फिल्म का डार्क माहौल बनाए रखने और एक्शन को प्रभावी बनाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन कमजोर पटकथा के कारण ये प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाते।
फिल्म में क्या अच्छा है?
‘गांधारी’ का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसका मूल विचार है। अपनी बेटी को बचाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाली मां की कहानी अपने आप में भावनात्मक है।
इसके अलावा मानव तस्करी जैसे गंभीर विषय को कहानी के केंद्र में रखना भी फिल्म को महत्वपूर्ण बनाता है। तापसी पन्नू के इमोशनल और एक्शन सीक्वेंस फिल्म के मजबूत हिस्सों में आते हैं।
फिल्म का शुरुआती माहौल भी दर्शकों में उत्सुकता पैदा करता है और कुछ दृश्यों में सस्पेंस का प्रभाव देखने को मिलता है।
कहां कमजोर पड़ती है ‘गांधारी’?
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका कमजोर स्क्रीनप्ले है। घटनाएं तेजी से आगे बढ़ती हैं, लेकिन उनके पीछे की परिस्थितियों को पर्याप्त विस्तार नहीं मिलता।
किरदारों की बैकस्टोरी और उनके फैसलों को बेहतर तरीके से विकसित किया जाता तो कहानी ज्यादा विश्वसनीय बन सकती थी।
मानव तस्करी जैसा गंभीर मुद्दा भी फिल्म में और ज्यादा गहराई की मांग करता था। कई जगह यह विषय कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के बजाय केवल थ्रिल बढ़ाने के साधन जैसा महसूस होता है।
Gandhari Review: अंतिम फैसला
‘गांधारी’ एक अच्छे आइडिया और शानदार कलाकारों के साथ शुरू होती है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। तापसी पन्नू ने बानी के किरदार को पूरी ताकत से निभाया है और उनके इमोशनल सीन्स फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं।
फिल्म में मां-बेटी का भावनात्मक रिश्ता, मानव तस्करी और एक्शन जैसे कई मजबूत तत्व मौजूद हैं, लेकिन कहानी को बहुत जल्दी आगे बढ़ाने की कोशिश ने इन सभी पहलुओं के प्रभाव को कम कर दिया।
अगर आप तापसी पन्नू के अभिनय और डार्क थ्रिलर जॉनर के प्रशंसक हैं, तो फिल्म में आपको कुछ अच्छे पल मिल सकते हैं। लेकिन एक मजबूत और पूरी तरह संतोषजनक थ्रिलर की उम्मीद लेकर देखने पर ‘गांधारी’ निराश कर सकती है।

