National Teacher Award 2026 के लिए बिहार की खुशबू कुमारी का चयन हुआ है। जानें कैसे उन्होंने नवाचार से बांका के स्कूल की तस्वीर बदली और बच्चों की उपस्थिति बढ़ाई।
बिहार के लिए National Teacher Award 2026 में गर्व का मौका है। राज्य की दो शिक्षिकाओं का चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए किया गया है। इनमें बांका जिले की खुशबू कुमारी का नाम भी शामिल है। वह बिदायडीह स्थित उर्दू प्राथमिक विद्यालय में प्रधान शिक्षिका के तौर पर बच्चों की शिक्षा और स्कूल व्यवस्था में उल्लेखनीय बदलाव लाने के लिए जानी जाती हैं।
खुशबू कुमारी को उनके समर्पण, शिक्षण के नए तरीकों और स्कूल में किए गए सकारात्मक बदलावों के लिए यह सम्मान मिलने जा रहा है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 5 सितंबर को नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाएगा।
13 साल से शिक्षा के क्षेत्र में दे रहीं योगदान
खुशबू कुमारी ने अपने शिक्षकीय करियर में एक दशक से ज्यादा समय बच्चों को बेहतर शिक्षा देने में लगाया है। उन्होंने केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए अलग-अलग प्रयोग किए।
बांका के बिदायडीह स्थित उर्दू प्राथमिक विद्यालय में प्रधान शिक्षिका की जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने स्कूल के शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। उनके प्रयासों का असर बच्चों की उपस्थिति और स्कूल की गतिविधियों में भी दिखाई दिया।
50 प्रतिशत से बढ़कर 90 फीसदी से ज्यादा हुई उपस्थिति
जब खुशबू कुमारी ने स्कूल की जिम्मेदारी संभाली, तब विद्यार्थियों की उपस्थिति करीब 50 प्रतिशत के आसपास थी। स्कूल में संसाधनों की कमी और अनुशासन से जुड़ी चुनौतियां भी थीं।
उन्होंने इन समस्याओं से निपटने के लिए शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति और अभिभावकों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश की। इसके लिए नियमित माता-पिता शिक्षक बैठक (PTM) शुरू की गई।
अभिभावकों के साथ लगातार संवाद का असर धीरे-धीरे नजर आया और स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति 90 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गई।
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बच्चों में स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर भी बढ़ी जागरूकता
स्कूल में बदलाव केवल उपस्थिति तक सीमित नहीं रहा। बच्चों के बीच अनुशासन और स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर भी जागरूकता बढ़ी। बताया जाता है कि पहले जूते, टाई और बेल्ट पहनकर स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बेहद कम थी। खुशबू कुमारी की पहल के बाद अब स्कूल में इन चीजों का पालन करने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा 100 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
गाना और अभिनय बन गया पढ़ाई का हिस्सा
खुशबू कुमारी की शिक्षण शैली को खास बनाने वाली सबसे बड़ी बात उनका नवाचार आधारित तरीका है। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को उन्होंने पारंपरिक तरीके से पढ़ाने के बजाय गाने, अभिनय और मनोरंजक गतिविधियों के जरिए सीखने का अवसर दिया।
ककहरा सिखाने के लिए भी उन्होंने गीत और अभिनय का सहारा लिया। इससे छोटे बच्चों के लिए पढ़ाई ज्यादा रोचक और आसान बनी। उनके क्लासरूम में पढ़ाने के वीडियो सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहे हैं। शिक्षण के इन तरीकों को लोगों ने काफी पसंद किया और उनकी सराहना की।
चुनौतीपूर्ण इलाके में बदली स्कूल की तस्वीर
बिदायडीह का यह विद्यालय सामाजिक और शैक्षणिक चुनौतियों वाले इलाके में स्थित है। ऐसे माहौल में स्कूल के विकास और बच्चों को नियमित शिक्षा से जोड़ना आसान नहीं था।
खुशबू कुमारी ने स्कूल प्रबंधन, शिक्षक समुदाय और अभिभावकों को साथ लेकर काम किया। उनकी कोशिशों से स्कूल में पढ़ाई के प्रति बच्चों और अभिभावकों का भरोसा मजबूत हुआ।
पहले भी 11 साल तक शिक्षक के रूप में दी सेवा
खुशबू कुमारी का अनुभव केवल वर्तमान विद्यालय तक सीमित नहीं है। उन्होंने इससे पहले कटोरिया प्रखंड के मध्य विद्यालय कठौन में करीब 11 वर्षों तक टीईटी शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
लंबे शिक्षकीय अनुभव और बच्चों के प्रति समर्पण ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई। अब राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए उनका चयन उनकी इसी यात्रा की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
खुशबू कुमारी ने सम्मान को बताया बच्चों और बांका की उपलब्धि
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित होने के बाद खुशबू कुमारी ने इसे व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय अपने स्कूल और बच्चों की सफलता बताया। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य बच्चों के लिए पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि खुशी और सीखने का माध्यम बनाना रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाला यह सम्मान न सिर्फ खुशबू कुमारी के लिए बल्कि बांका जिले और बिहार के शिक्षा क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

