Mahashivratri 2025: फाल्गुन कृष्णपक्ष की पंचमी से शिवनवरात्रि महोत्सव का शुभारंभ होता है। इस दिन से महाशिवरात्रि तक महाकाल के विभिन्न रूपों का पूजन किया जाएगा।
Mahashivratri 2025: तीन ज्योतिर्लिंग, आकाशे तारकं लिंगम् पाताले हाटकेश्वरम्, सृष्टि का पूरा सत्य परब्रह्म महाकाल ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं, जहां उनके अलग-अलग रूपों की पूजा अलग-अलग तरह से की जाती है।मृत्युलोके महाकालं लिंगत्रयनमः तीन ज्योतिर्लिंगों, पहला तारक ज्योतिर्लिंग आकाश में, दूसरा हाटकेश्वर ज्योतिर्लिंग पाताल में और तीसरा श्रीमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर हैं. ये स्वयंभू रूप में पूजित होकर अपने भक्तों के दैहिक, दैविक और भौतिक तापों को दूर करते हैं।
श्रीमहाकाल, सभी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक के रूप में विराजते हैं, इसलिए यहां तांत्रिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी आते हैं। उन्हें देखने से प्राणी न सिर्फ यमदण्ड के भय से बच जाता है, बल्कि नवग्रहों के दोष से भी बच जाता है। शनि की शाढ़ेसाती, ढैया, मारकेश दशा और अशुभ गोचर-ग्रहों के दुष्प्रभाव से भी छुटकारा मिलता है। नौ दिन पहले से ही श्री महाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है, जो शिवनवरात्रि महोत्सव का शुभारम्भ है। उज्जैन, महाकाल की नगरी, इस महामहोत्सव को देखने के लिए विश्व भर से शिवभक्तों का सैलाब आता है।
शिवरात्रिका नौ दिनों की पूजा
फाल्गुन कृष्णपक्ष की पंचमी से शिवनवरात्रि महोत्सव का शुभारंभ होता है। इस दिन से महाशिवरात्रि तक महाकाल के विभिन्न रूपों का पूजन किया जाएगा। महोत्सव के पहले दिन, कोटितीर्थ कुण्ड में शिवपंचमी का पूजन-अभिषेक किया जाता है। यहां की परम्परा के अनुसार वैदिक ब्राह्मणों-पुजारियों को एक-एक सोला और वरूणी दी जाती है। श्रीकोटेश्वर महादेव की आरती के बाद श्रीमहाकालेश्वर जी का पूजन-अभिषेक और वैदिक विद्वानों द्वारा नमक-चमक से रूद्राभिषेक किया जाता है, फिर भोग आरती और अन्य कार्य किए जाते हैं।
पंचमी तिथि को ‘श्रीमहाकाल’ का चन्दन, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्ड माल, छत्र आदि से श्रृंगार किया जाता है। षष्टी तिथि पर श्रीमहाकाल को शेषनाग, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सुंदर श्रृंगार करते हैं, जबकि सप्तमी तिथि पर घटाटोप, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सुंदर श्रृंगार करते हैं। अष्टमी तिथि को ‘छबीना’ श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सजावट की जाती है, जबकि नवमी तिथि को ‘श्रीहोल्कर’ श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सजावट की जाती है।
दशमी तिथि पर श्री ‘मनमहेश’ श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि लगाया जाता है। एकादशी को श्री महाकाल को ‘उमामहेश’ श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सजाया जाएगा, जबकि द्वादशी को श्री महाकाल को ‘शिवतांडव’ श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से सजाया जाएगा। महाशिवरात्रि पर पूजन और निरंतर जलधारा होगी। चतुर्दशी तिथि को श्री परब्रह्म परमेश्वर महाकाल का स्तवन करने के लिए सप्तमधान (सेहरा दर्शन), कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से श्रृंगार किया जाएगा। भक्तगण जय महाकाल, जय महाकाल कहकर अपने जीवन को धन्य करते हैं।
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