टी20 वर्ल्ड कप 2026 जीत के बाद भारतीय ऑलराउंडर शिवम दुबे ने अपना मेडल पिता राजेश दुबे को समर्पित करते हुए उन्हें अपनी सफलता का असली हीरो बताया।
टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद टीम इंडिया के ऑलराउंडर शिवम दुबे ने एक भावुक फैसला लेकर सभी का दिल जीत लिया। दुबे ने अपनी इस बड़ी उपलब्धि का मेडल अपने पिता राजेश दुबे को समर्पित कर दिया और उन्हें अपनी जिंदगी का असली हीरो बताया।
शिवम दुबे ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए अपने पिता को मेडल पहनाया। उन्होंने लिखा कि उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनके पिता का है, जिन्होंने हर मुश्किल दौर में उनका साथ दिया।
पिता ने निभाई सबसे बड़ी भूमिका
शिवम दुबे के पिता राजेश दुबे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले हैं और काम की तलाश में मुंबई आए थे। पहले वह डेयरी फार्म का काम करते थे और बाद में जींस वॉशिंग की फैक्ट्री शुरू की, लेकिन बेटे के क्रिकेट करियर के लिए उन्होंने अपना बिजनेस भी दांव पर लगा दिया।
जब शिवम सिर्फ 6 साल के थे, तभी उनके पिता ने उनके क्रिकेट टैलेंट को पहचान लिया। इसके बाद उन्होंने घर के पीछे टर्फ पिच बनवाई और रोजाना घंटों अभ्यास कराया।
रोजाना 500 गेंदों की प्रैक्टिस
राजेश दुबे अपने बेटे को रोज करीब 500 गेंदें फेंककर अभ्यास कराते थे। यह सिलसिला लगभग 10 साल तक चलता रहा। अभ्यास के बाद थकान दूर करने के लिए वह शिवम की रोज सरसों के तेल से मालिश भी करते थे, ताकि उनका शरीर ट्रेनिंग के लिए तैयार रहे।
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मुश्किल दौर भी आया
जब शिवम दुबे 14 साल के थे, तब उनके पिता का बिजनेस ठप हो गया और परिवार पर भारी कर्ज आ गया। आर्थिक संकट के कारण शिवम को लगभग पांच साल तक क्रिकेट से दूर रहना पड़ा।
इस दौरान उनका वजन बढ़कर 110 किलो तक पहुंच गया और वह मानसिक तनाव से भी गुजरने लगे। लेकिन उनके पिता ने हार नहीं मानी और उन्हें फिर से फिट बनाने के लिए मेहनत शुरू की।
फिर से शुरू हुआ सफर
राजेश दुबे ने बेटे का वजन घटाकर लगभग 75 किलो कराया और घर पर रोज 8 घंटे की प्रैक्टिस कराई। इसी मेहनत का परिणाम है कि आज शिवम दुबे भारतीय टीम के अहम खिलाड़ी बन चुके हैं।
टी20 वर्ल्ड कप 2026 में उन्होंने बतौर फिनिशर शानदार प्रदर्शन किया और टीम इंडिया को लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने में अहम भूमिका निभाई।
शिवम दुबे की इस भावुक कहानी ने यह साबित कर दिया कि किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार का त्याग और समर्थन कितना महत्वपूर्ण होता है।

