लखनऊ के सहारा शहर मामले में हाईकोर्ट ने नगर निगम की कार्रवाई को सही ठहराते हुए सहारा समूह की याचिका खारिज कर दी।
लखनऊ के चर्चित सहारा शहर मामले में नगर निगम को बड़ी कानूनी राहत मिली है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने Sahara Group की ओर से दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिससे नगर निगम की कार्रवाई को वैधता मिल गई है। इस फैसले को शहरी प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण जीत माना जा रहा है।
करीब 170 एकड़ में फैले गोमतीनगर स्थित सहारा शहर को नगर निगम ने लीज शर्तों के उल्लंघन के आधार पर अपने कब्जे में लिया था। नगर निगम का आरोप था कि 1994 में हुई लीज के तहत निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया और निर्माण व उपयोग से जुड़े कई नियमों की अनदेखी की गई। इसके बाद जांच के आधार पर निगम ने सख्त कार्रवाई करते हुए परिसर के सभी छह गेट सील कर दिए और प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए सहारा समूह ने हाईकोर्ट का रुख किया था और इसे मनमाना तथा नियमों के विरुद्ध बताया था। हालांकि, नगर निगम ने अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार अपनाई गई है। निगम ने यह भी बताया कि वर्ष 2020 और 2025 में कई बार नोटिस जारी कर कंपनी को सुधार का अवसर दिया गया, लेकिन निर्धारित शर्तों का पालन नहीं होने के कारण अंतिम कार्रवाई करनी पड़ी।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और प्रस्तुत दस्तावेजों का गहन परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि नगर निगम की कार्रवाई विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत की गई है और इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं है। इसी आधार पर सहारा समूह की याचिका को खारिज कर दिया गया।
इस मामले में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि की 30 वर्ष की लीज अवधि समाप्त हो चुकी थी और तय विकास कार्य भी पूरे नहीं किए गए थे। इन कारणों से प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए सख्त कदम उठाए गए।
नगर निगम की ओर से इस केस की पैरवी मजबूत तरीके से की गई, जिसमें नगर आयुक्त गौरव कुमार के नेतृत्व में अधिकारियों और कानूनी टीम ने अहम भूमिका निभाई। सभी जरूरी दस्तावेज, नोटिस और प्रक्रियात्मक विवरण अदालत के सामने पेश किए गए, जिससे निगम का पक्ष और मजबूत हुआ।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक संपत्तियों और शहरी संसाधनों की सुरक्षा के लिए प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम न्यायिक कसौटी पर खरे उतर सकते हैं। साथ ही यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल के तौर पर भी देखा जा रहा है।

