खरगोन में कम लागत वाली खेती को बढ़ावा देने के लिए कलेक्टर प्रसाद ने किसान महेंद्र सिंह मंडलोई के खेत का निरीक्षण किया। जानें जैविक खेती की तकनीकें।
मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर कम लागत वाली खेती करने की पहल को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी क्रम में कलेक्टर श्री प्रसाद ने छोटी कसरावद के प्रगतिशील किसान महेंद्र सिंह मंडलोई के खेत का दौरा किया। यहां उन्होंने किसान द्वारा अपनाई जा रही जैविक खेती की तकनीकों और कम लागत में कृषि उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों की जानकारी ली।
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने खेत में तैयार किए जा रहे जैविक उत्पादों, खाद निर्माण की विधियों और फसल संरक्षण के वैकल्पिक उपायों को देखा। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि ऐसी उपयोगी तकनीकों के बारे में अन्य किसानों को भी जानकारी दी जाए, ताकि खेती में बाहरी आदानों पर निर्भरता कम करने और उत्पादन लागत घटाने के प्रयासों को बढ़ावा मिल सके।
जैविक तरीकों से खेती की लागत घटाने का प्रयास
किसान महेंद्र सिंह मंडलोई अपने खेत में कई तरह की कम लागत वाली कृषि पद्धतियों का उपयोग कर रहे हैं। इनमें एडवांस जीवामृत, जैविक कीटनाशक, डीकंपोजर, बायोडायनामिक खेती, वर्मीकम्पोस्ट, कम्पोस्ट खाद और बायोचार जैसी तकनीकें शामिल हैं।
इन विधियों में गोबर, गोमूत्र, छाछ, गुड़, बेसन, एलोवेरा, सरसों की खली और विभिन्न वनस्पतियों व पत्तियों जैसी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य खेती के लिए उपयोगी जैविक उत्पाद तैयार करना और कृषि लागत को कम करने की संभावनाएं तलाशना है।
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प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जा रहे जैविक कीटनाशक
फसल को कीटों से बचाने के लिए किसान विभिन्न पौधों और घरेलू स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करके जैविक कीटनाशक तैयार कर रहे हैं। इनमें नीम, आक, कनेर, बेल, अरंडी, नीलगिरी, अनार, आम, गेंदा और धतूरा की पत्तियों के साथ प्याज के छिलके, लहसुन, हरी मिर्च, नीम का तेल और हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा गुड़ और पानी की मदद से डीकंपोजर तैयार करने की प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है। इन तरीकों के माध्यम से स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए फसल प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
कृषि अपशिष्ट से बायोचार बनाने पर भी जोर
खेत में बायोचार तैयार करने के लिए कपास की काठी, मक्का के कट्टों और खेती से निकलने वाले अन्य अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। कृषि अवशेषों का इस तरह उपयोग करने से उन्हें उपयोगी संसाधन में बदलने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
वर्मीकम्पोस्ट और कम्पोस्ट जैसी खाद तैयार करने की विधियां भी किसान की खेती का हिस्सा हैं। इन तकनीकों के माध्यम से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
अन्य किसानों को भी प्रोत्साहित करने के निर्देश
कलेक्टर श्री प्रसाद ने किसान की पहल की जानकारी लेने के बाद कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे जिले के दूसरे किसानों को भी जैविक और कम लागत वाली खेती के प्रति जागरूक करें।
उन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से तैयार जैविक उत्पादों के उपयोग और खेती में लागत कम करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। ऐसी पद्धतियों की जानकारी किसानों तक पहुंचाने से उन्हें अपने खेतों की परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त विकल्प चुनने में मदद मिल सकती है।
निरीक्षण के दौरान एसडीएम श्री अनिल जैन, तहसीलदार श्री मुकेश मचार, उप संचालक कृषि श्री शिव सिंह राजपूत सहित संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।

