‘केनेडी’ में अनुराग कश्यप ने नॉयर थ्रिलर के जरिए फॉर्म में वापसी की है, वहीं राहुल भट्ट ने करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय देकर फिल्म को नई ऊंचाई दी है।
अनुराग कश्यप की फिल्मोग्राफी को लेकर पिछले कुछ सालों से दर्शकों और फिल्म प्रेमियों के बीच एक बहस चलती रही है—क्या वह गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद अपने ही बनाए मानकों का पीछा करते-करते कहीं खो गए? कई लोगों का मानना रहा कि उनकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षी लेकिन असफल फिल्म बॉम्बे वेलवेट के बाद कश्यप का आत्मविश्वास और फिल्ममेकिंग का तेवर कहीं न कहीं बदल गया। अब केनेडी के साथ वह न सिर्फ उस दौर की याद दिलाते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि उनके अंदर का नॉयर और डार्क स्टोरीटेलर अब भी पूरी तरह जिंदा है।
केनेडी एक डार्क नॉयर थ्रिलर है, जिसकी कहानी मुंबई की अंडरबेली में सांस लेती है। फिल्म का नायक केनेडी (राहुल भट्ट) एक ऐसा किरदार है जो कभी पुलिसवाला था, अब एक ड्राइवर बन चुका है और सबकी नजरों में मरा हुआ माना जाता है। असल में वह एक करप्ट पुलिस कमिश्नर के लिए ‘क्लीन-अप मैन’ का काम करता है। उसकी जिंदगी का एक ही मकसद है—अपने अतीत से जुड़े गैंगस्टर सलीम को ढूंढना। लेकिन कहानी तब नया मोड़ लेती है जब उसकी मुलाकात चार्ली (सनी लियोन) से होती है और वह अपने ही बॉस के खिलाफ जंग छेड़ देता है।
भारतीय सिनेमा में नॉयर जॉनर कभी बहुत लोकप्रिय हुआ करता था। 40 और 50 के दशक में किस्मत, महल, देव आनंद और गुरु दत्त की फिल्मों ने इस शैली को नई पहचान दी थी। लेकिन रंगीन सिनेमा के दौर में यह जॉनर धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। हॉलीवुड ने इसे एलए कॉन्फिडेंशियल, ड्राइव और ब्लेड रनर 2049 जैसी फिल्मों के जरिए जिंदा रखा, लेकिन बॉलीवुड में इसकी कमी हमेशा खली। केनेडी उस खालीपन को भरने की एक गंभीर और प्रभावशाली कोशिश है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका माहौल और टोन है। यह एक स्लो-बर्न थ्रिलर है, जो दर्शक को धीरे-धीरे अपनी दुनिया में खींच लेती है। यहां कहानी जितनी अहम है, उतनी ही अहम है उसकी बिल्ड-अप और बेचैनी। सिनेमैटोग्राफी, डायलॉग्स और बैकग्राउंड स्कोर मिलकर एक ऐसा अंधेरा और बेचैन माहौल रचते हैं, जो लंबे समय तक दिमाग में बना रहता है। हालांकि फिल्म की रफ्तार कुछ जगहों पर थोड़ी धीमी लग सकती है, लेकिन इसकी दुनिया और किरदार आपको उस सफर में बांधे रखते हैं।
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अनुराग कश्यप की पहचान रहे शार्प वन-लाइनर्स, समाज पर तंज कसते डायलॉग और पॉप-कल्चर रेफरेंस यहां भी मौजूद हैं। यही वो चीजें हैं जो बताती हैं कि कश्यप एक बार फिर अपनी फिल्ममेकिंग के साथ एंजॉय कर रहे हैं—कुछ वैसा ही एहसास जैसे नो स्मोकिंग या देव डी के दौर में हुआ करता था।
अभिनय की बात करें तो फिल्म पूरी तरह राहुल भट्ट के कंधों पर टिकी है और वह इसे शानदार तरीके से संभालते हैं। अग्ली के बाद एक बार फिर उन्हें ऐसा किरदार मिला है, जिसमें वह अपने अभिनय की पूरी रेंज दिखा पाते हैं। केनेडी के अंदर की टूटी हुई, गुस्से और खुद से नफरत करने वाली आत्मा को उन्होंने बेहद सटीक ढंग से पर्दे पर उतारा है। मोहित टकलकर करप्ट पुलिस कमिश्नर के रोल में चौंकाते हैं और अपने किरदार से नफरत भी दिलाते हैं और तारीफ भी। सनी लियोन चार्ली के रोल में अलग रंग में नजर आती हैं और कई इमोशनल सीन में मजबूत छाप छोड़ती हैं।
क्या केनेडी अनुराग कश्यप की सबसे बेहतरीन फिल्म है? शायद नहीं। लेकिन यह जरूर साबित करती है कि वह अब भी अपने क्राफ्ट में धार रखते हैं और जब चाहें, तो दर्शकों को एक अलग, डार्क और असरदार सिनेमैटिक अनुभव दे सकते हैं। यह फिल्म उस कश्यप की याद दिलाती है, जो रिस्क लेने से नहीं डरता और सिनेमा को एक अलग नजरिए से देखने की कोशिश करता है।
कुल मिलाकर, केनेडी एक स्टाइलिश, डार्क और इंटेंस नॉयर थ्रिलर है, जो राहुल भट्ट के करियर-बेस्ट परफॉर्मेंस और अनुराग कश्यप की रचनात्मक वापसी की वजह से जरूर देखी जानी चाहिए।

