Jyeshtha Purnima 2025 Vrat Katha: ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 पर वट पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व है। जानिए इस दिन की व्रत कथा, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएं। व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा पढ़ें और जानें कैसे सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमानी और भक्ति से यमराज से अपने पति के प्राण वापस लिए।
Jyeshtha Purnima 2025 Vrat Katha: हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2025 में ज्येष्ठ पूर्णिमा का शुभ पर्व 11 जून, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन व्रत, स्नान, दान और सत्यनारायण भगवान की पूजा का विशेष महत्व होता है। साथ ही सुहागिन महिलाएं वट पूर्णिमा का व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करके पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 की तिथि और महत्व
इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि बुधवार, 11 जून 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन विशेष रूप से वट पूर्णिमा व्रत रखा जाता है, जो पतिव्रता महिलाओं के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लिए थे। इसलिए इस दिन व्रत, स्नान, दान और सत्यनारायण कथा का विशेष महत्व होता है।
वत पूर्णिमा व्रत का महत्व
वट पूर्णिमा व्रत, वट सावित्री व्रत के 15 दिन बाद आता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। पूजा में सावित्री, सत्यवान, नारद मुनि, यमराज और ब्रह्मा जी की विधिवत आराधना की जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत कथा हिंदी में
पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री राजा अश्वपति की पुत्री थी और एक धर्मपरायण, साहसी राजकुमारी थी। उसने तपस्वी सत्यवान को पति के रूप में चुना। नारद मुनि ने उसे चेताया कि सत्यवान अल्पायु है, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही।
विवाह के बाद, एक दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ियां काट रहे थे, तभी वे मूर्छित होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज वहां आए और सत्यवान की आत्मा लेकर चल पड़े। सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। यमराज ने उसे कई बार रोका, लेकिन वह नहीं मानी।
सावित्री की बुद्धिमानी और यमराज से वरदान
सावित्री ने धर्म और भक्ति से यमराज को प्रसन्न कर तीन वरदान मांगे:
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ससुराल का खोया हुआ राज्य
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सास-ससुर की आंखों की रोशनी
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सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान
यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन जब सावित्री ने तीसरे वरदान का तर्क दिया कि सत्यवान के बिना यह संभव नहीं, तो यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। सावित्री की तपस्या और बुद्धिमानी से सत्यवान जीवित हो उठे।
व्रत का महत्व आज भी क्यों है प्रासंगिक?
इस कथा से यह संदेश मिलता है कि सच्चा प्रेम, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलकर असंभव को भी संभव किया जा सकता है। यही कारण है कि आज भी विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
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