झाबुआ में रबी फसल नियोजन 2026-27 पर कार्यशाला आयोजित। किसानों को कम पानी वाली फसलों, उन्नत बीज, जल संरक्षण और जीरो टिलेज की जानकारी दी गई।
जिले में अल्प वर्षा की स्थिति को देखते हुए रबी सीजन 2026-27 की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। किसानों को मौसम के अनुकूल फसलें चुनने, सिंचाई जल का बेहतर उपयोग करने और खेती की लागत नियंत्रित रखने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र, झाबुआ में जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई। मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2026 को कृषक कल्याण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इसी क्रम में जिला प्रशासन के निर्देशानुसार आयोजित इस कार्यशाला में रबी फसलों की आकस्मिक कार्ययोजना, बीज की किस्मों के चयन और कृषि संसाधनों के प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा की गई। कृषि विभाग के मैदानी अधिकारियों और कर्मचारियों को भी आवश्यक तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया।
अल्प वर्षा को देखते हुए कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता
कार्यशाला में जिले में हुई वर्षा और उपलब्ध सिंचाई जल की स्थिति को ध्यान में रखते हुए किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया। अधिकारियों ने बताया कि रबी मौसम में फसल का चयन करते समय मिट्टी में उपलब्ध नमी, सिंचाई के साधन और मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
किसानों को जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने, खेतों में नमी बनाए रखने, संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने और आधुनिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई। इन उपायों से कम वर्षा की स्थिति में भी उपलब्ध संसाधनों के अनुसार खेती की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
12 से 16 अक्टूबर तक गांवों में लगेंगी जल चौपाल
रबी सीजन के दौरान किसानों को समय पर कृषि संबंधी सलाह देने और जल संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए जिले में 12 से 16 अक्टूबर 2026 तक जल चौपाल आयोजित करने की योजना बनाई गई। इस दौरान कृषि विभाग का मैदानी अमला गांवों का दौरा कर किसानों को फसल नियोजन, बीज चयन और बेहतर कृषि प्रबंधन की जानकारी देगा।
जल चौपाल में किसानों को निम्नलिखित विषयों पर मार्गदर्शन दिया जाएगा:
- खेतों में उपलब्ध नमी को सुरक्षित रखने के लिए उचित जुताई और भूमि समतलीकरण।
- फसल अवशेषों का सही प्रबंधन और नरवाई जलाने से बचाव।
- बुवाई से पहले बीज उपचार और अनुशंसित मात्रा में बीज का उपयोग।
- जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई को अपनाना।
- उर्वरकों का सीमित और संतुलित इस्तेमाल।
- उपलब्ध सिंचाई जल का जरूरत के अनुसार उपयोग।
- कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों और किस्मों का चयन।
इन प्रयासों का उद्देश्य किसानों को अल्प वर्षा की परिस्थितियों में खेती के बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
also read: धार के कुक्षी में विश्व कपास दिवस पर कृषक प्रशिक्षण आयोजित, 200 से अधि…
चना, मसूर और सरसों की खेती पर विशेष जोर
जिले में कम वर्षा की स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को चना, मसूर और सरसों जैसी अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को प्राथमिकता देने की सलाह देने की योजना बनाई है। इसके साथ ही ऐसी किस्मों के चयन पर जोर दिया गया, जो स्थानीय मौसम और उपलब्ध संसाधनों के अनुकूल हों।
कार्यशाला में चने की कम पानी की आवश्यकता वाली और सूखा सहनशील बताई गई किस्मों में पूसा मानव, आरवीजी-202, आरवीजी-204 और पूसा जेजी-16 के बारे में जानकारी देने पर चर्चा की गई।
इसी तरह गेहूं की कम अवधि में तैयार होने वाली तथा कम पानी की आवश्यकता वाली किस्मों में एचआई-1605 (पूसा उजाला), एचआई-1665 (पूसा शरबती), एचआई-1544 और एचआई-1650 (पूसा ओजस्वी) का उल्लेख किया गया।
किसानों को सलाह दी जाएगी कि वे अपने क्षेत्र की जल उपलब्धता, मिट्टी की स्थिति और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार ही फसल और बीज की किस्म का चयन करें।
कृषि वैज्ञानिकों ने दिए खेती की बेहतर योजना बनाने के सुझाव
कार्यशाला में उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास एस.एस. चौहान ने जिले की वर्षा और सिंचाई की परिस्थितियों के अनुसार फसल नियोजन करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने किसानों को कम पानी वाली फसलों और मौसम के अनुकूल किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ जैविक खाद के उपयोग तथा उपलब्ध संसाधनों के उचित प्रबंधन पर जोर दिया।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. जगदीश मौर्य ने फसल की जरूरत के अनुसार किस्मों के चयन और उर्वरकों के संतुलित उपयोग का महत्व समझाया। मौसम वैज्ञानिक डॉ. आर.के. त्रिपाठी ने मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उचित समय पर बुवाई करने की सलाह दी।
सहायक संचालक कृषि बी.एस. बघेल ने बिना पलेवा बुवाई और नरवाई प्रबंधन से संबंधित जानकारी दी। परियोजना संचालक आत्मा जी.एस. त्रिवेदी ने ग्राम स्तर पर जल चौपाल आयोजित करने तथा किसानों तक समयानुकूल कृषि सलाह पहुंचाने के संबंध में मार्गदर्शन दिया।
सहायक संचालक कृषि एस.एस. रावत ने फसल बीमा और भावांतर भुगतान योजना की जानकारी दी। उप परियोजना संचालक आत्मा एम.एस. धार्वे ने प्राकृतिक खेती में बीजामृत और जीवामृत के उपयोग के बारे में बताया। वहीं, सहायक संचालक उद्यानिकी ने सूक्ष्म सिंचाई उपकरणों के माध्यम से पानी का प्रभावी उपयोग करने के तरीके समझाए। कार्यक्रम के दौरान विजय मोरे, मोहन डामोर और ज्वाला सिंगार ने भी अपने अनुभव साझा किए।
नरवाई प्रबंधन, जीरो टिलेज और जल संरक्षण पर रहेगा फोकस
कार्यशाला में रबी फसलों की तैयारी के साथ फसल अवशेष प्रबंधन और मिट्टी में नमी बनाए रखने की तकनीकों को भी महत्वपूर्ण बताया गया। किसानों को नरवाई जलाने के बजाय उसका उपयोग करने और उपलब्ध परिस्थितियों के अनुसार बिना जुताई की बुवाई जैसी तकनीकों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त सूक्ष्म सिंचाई, संतुलित पोषण प्रबंधन और प्राकृतिक खेती से जुड़े उपायों की जानकारी भी गांव स्तर तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। जल चौपाल के माध्यम से किसानों को उनकी स्थानीय जरूरतों के अनुसार तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की योजना है।
कार्यशाला में कृषि विभाग के अधिकारी और वैज्ञानिक रहे मौजूद
जिला स्तरीय कार्यशाला में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. वी.के. सिंह, उप संचालक कृषि एस.एस. चौहान, परियोजना संचालक आत्मा जी.एस. त्रिवेदी, पदोन्नत उप संचालक कृषि एच.एस. चौहान, सहायक संचालक उद्यानिकी एम.एस. मुझाल्दा और सहकारिता विभाग के श्री भट्ट उपस्थित रहे।
इसके अलावा अनुविभागीय कृषि अधिकारी थांदला एवं झाबुआ एन.एस. मंडलोई, सहायक संचालक कृषि बी.एस. बघेल और एस.एस. रावत, उप परियोजना संचालक आत्मा एम.एस. धार्वे सहित जिले के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी और विभागीय मैदानी अमले ने भाग लिया।
कार्यशाला के माध्यम से रबी सीजन 2026-27 के लिए फसल नियोजन, उपयुक्त किस्मों के चयन, जल संरक्षण और कृषि संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को लेकर विभागीय स्तर पर तैयारियां की गईं। आगामी जल चौपालों के जरिए इन जानकारियों को किसानों तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

