लखनऊ के किसान ब्रजेश वर्मा ने एक बी-बॉक्स से मधुमक्खी पालन शुरू किया। आज उनका सालाना कारोबार करीब 3 करोड़ रुपये है। जानें उनकी सफलता की कहानी।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के मदारपुर केवली गांव के किसान ब्रजेश कुमार वर्मा ने साबित कर दिया है कि सीमित जमीन और छोटे निवेश से भी बड़ा व्यवसाय खड़ा किया जा सकता है। वर्ष 1990 में उद्यान विभाग से मिले एक मुफ्त बी-बॉक्स से मधुमक्खी पालन शुरू करने वाले ब्रजेश आज सालाना करीब 3 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुंच चुके हैं। उनकी सफलता उन छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रेरणा है, जो पारंपरिक खेती के साथ आमदनी का नया स्रोत तलाश रहे हैं।
ब्रजेश के पास महज 0.4 हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन थी। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन उन्होंने मधुमक्खी पालन को आय बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा। शुरुआत में एक बॉक्स से प्राप्त शहद बेचकर उन्होंने पैसे जुटाए और लगभग दो साल के भीतर 10 नए बी-बॉक्स खरीद लिए। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने व्यवसाय का विस्तार किया और दूसरे किसानों को भी इस काम से जोड़ना शुरू कर दिया।
गांव से शुरू हुआ सफर, अब सालाना 3 करोड़ रुपये का कारोबार
ब्रजेश कुमार वर्मा ने मधुमक्खी पालन को केवल व्यक्तिगत व्यवसाय तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ग्रामीण रोजगार और सामूहिक उद्यम का माध्यम बनाया। उन्होंने मधुमक्खी पालकों को संगठित करने के लिए अभिषेक ग्रामोद्योग संस्थान नाम से एक समूह तैयार किया, जो उत्तर प्रदेश सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के यहां पंजीकृत है।
समूह के काम को आगे बढ़ाने के लिए गोसाईंगंज में राज्य ग्राम विकास विभाग की मदद से शहद प्रसंस्करण इकाई स्थापित की गई। यहां शहद की सफाई, प्रसंस्करण और पैकेजिंग का काम किया जाता है, जिससे उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में मदद मिलती है।
वर्ष 2011 से समूह ने शहद के साथ पराग और प्रोपोलिस जैसे अन्य मधुमक्खी उत्पादों का संग्रह और उत्पादन भी शुरू किया। इससे कारोबार का दायरा बढ़ा और किसानों के लिए कमाई के नए अवसर तैयार हुए।
हर साल 350 टन शहद का उत्पादन
ब्रजेश के नेतृत्व में संचालित समूह वर्तमान में सालाना लगभग 350 टन शहद का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा करीब 150 किलोग्राम पराग और 100 किलोग्राम प्रोपोलिस भी तैयार किया जाता है।
समूह के उत्पाद एफएसएसएआई प्रमाणित किरण एंटरप्राइजेज के माध्यम से बाजार में बेचे जाते हैं। शहद और दूसरे उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था ने इस कारोबार को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ब्रजेश के पास वर्तमान में करीब 600 बी-बॉक्स हैं। मधुमक्खियों को पर्याप्त फूल और रस उपलब्ध कराने के लिए वे मौसम के अनुसार इन बॉक्स को उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में ले जाते हैं। इस तरीके से अलग-अलग फूलों के मौसम का लाभ उठाकर शहद उत्पादन जारी रखने में मदद मिलती है।
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6,000 किसानों को दिया मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण
ब्रजेश की सफलता का असर अब दूसरे किसानों पर भी दिखाई दे रहा है। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, लखनऊ के मार्गदर्शन में जिले के करीब 6,000 किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया है। इसके साथ ही लगभग 1,120 मधुमक्खी पालकों को एक नेटवर्क से जोड़ने में भी योगदान दिया है।
इस पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन के प्रति जागरूकता बढ़ी है और किसानों को पारंपरिक फसलों के अलावा वैकल्पिक आजीविका अपनाने का अवसर मिला है।
ब्रजेश ने मधुमक्खी पालन से जुड़ी जरूरतों को समझते हुए बी-बॉक्स, फ्रेम और अन्य उपकरण बनाने का काम भी शुरू किया है। इससे दूसरे मधुमक्खी पालकों को जरूरी सामान उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। वे केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन बोर्ड के आजीवन सदस्य भी हैं।
छोटे किसानों के लिए मधुमक्खी पालन क्यों है फायदेमंद?
मधुमक्खी पालन की एक खासियत यह है कि इसके लिए खेती की तरह बड़े भूभाग की जरूरत नहीं होती। उचित प्रशिक्षण, सही उपकरण और बाजार तक पहुंच के साथ छोटे किसान भी इसे अपनी आजीविका का हिस्सा बना सकते हैं।
इस व्यवसाय से शहद के अलावा पराग और प्रोपोलिस जैसे उत्पादों के जरिए भी आय अर्जित करने की संभावना रहती है। हालांकि, कमाई का स्तर मधुमक्खियों की प्रजाति, मौसम, फूलों की उपलब्धता, प्रबंधन और बाजार भाव पर निर्भर करता है।
मधुमक्खी पालन का लाभ केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है। मधुमक्खियां सरसों, सूरजमुखी और कई फलदार पौधों में परागण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं। इससे कुछ फसलों में फल और बीज बनने की प्रक्रिया को लाभ मिल सकता है।
कृषि विज्ञान केंद्र के मार्गदर्शन से मिली नई दिशा
ब्रजेश कुमार वर्मा की इस उपलब्धि में भाकृअनुप-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, लखनऊ के मार्गदर्शन की भी भूमिका रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीकी प्रशिक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और बाजार से जुड़ाव मिलने पर किसान खेती के साथ दूसरे कृषि आधारित व्यवसायों को भी विकसित कर सकते हैं।
ब्रजेश की कहानी दिखाती है कि सीमित जमीन किसी किसान की तरक्की में हमेशा बाधा नहीं होती। सही जानकारी, मेहनत और व्यवसाय को लगातार आगे बढ़ाने की सोच के सहारे छोटे स्तर से शुरुआत करके भी बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है।

