चित्रकूट के किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर लागत घटा रहे हैं। जानें नाथूराम समेत किसानों की सफलता और 3,125 किसानों को जोड़ने के सरकारी लक्ष्य की जानकारी।
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में किसान अब खेती को ज्यादा किफायती और लाभकारी बनाने के लिए प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके किसान न केवल खेती का खर्च घटाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि बेहतर गुणवत्ता वाली उपज के जरिए बाजार में अच्छी कीमत भी हासिल कर रहे हैं। जिले के कई किसानों के अनुभव इस बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं।
बैहर गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक नाथूराम ने वर्ष 2022 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी। झांसी के चिरगांव स्थित सरकारी कृषि विद्यालय से प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने अपनी 18 बीघा जमीन पर इस पद्धति को अपनाया। आज वे फलदार पेड़ों के साथ विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं और उनके मुताबिक, इससे उन्हें सालाना करीब 4 से 5 लाख रुपये तक का मुनाफा हो रहा है।
प्राकृतिक खेती से घटा खर्च, किसानों को मिला फायदा
चित्रकूट में प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ने के पीछे खेती की लागत कम करने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने की जरूरत प्रमुख कारण हैं। रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर, गोमूत्र और स्थानीय संसाधनों से तैयार जैविक इनपुट का इस्तेमाल करके किसान बाजार से खाद खरीदने पर होने वाला खर्च कम कर सकते हैं।
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों का कहना है कि बेहतर फसल प्रबंधन और विविध फसलों की खेती से उन्हें अतिरिक्त आमदनी के अवसर मिल रहे हैं। हालांकि, उत्पादन और मुनाफे का स्तर मिट्टी, मौसम, फसल और स्थानीय बाजार की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
कोठारी सिंह पटेल ने धान, अरहर और ज्वार की खेती में अपनाया प्राकृतिक तरीका
मानिकपुर तहसील के बरहट गांव के किसान कोठारी सिंह पटेल ने वर्ष 2023 में प्राकृतिक खेती शुरू की थी। वे अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी फसलें उगाते हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उन्होंने रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च को कम करने की दिशा में काम किया है।
पटेल ने गोबर और गोमूत्र की मदद से जीवामृत जैसे कृषि इनपुट तैयार करना सीखा। इससे उन्हें खेतों में उपयोग के लिए कुछ जरूरी सामग्री अपने स्तर पर तैयार करने का अवसर मिला है। उनके अनुसार, उपज की गुणवत्ता में सुधार होने से स्थानीय बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ी है।
उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती की तकनीक समझाने का प्रयास किया है।
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योगेश जैन ने गोबर और गोमूत्र से खाद बनाकर घटाई निर्भरता
करवी तहसील के किसान योगेश जैन ने भी प्राकृतिक खेती की दिशा में बदलाव किया है। उनका कहना है कि लंबे समय तक रासायनिक खादों के इस्तेमाल के बाद उन्हें अपनी जमीन की स्थिति को लेकर चिंता होने लगी थी। इसके बाद उन्होंने पशुपालन को बढ़ावा दिया और गोबर तथा गोमूत्र से खेत के लिए खाद तैयार करना शुरू किया।
अब वे खरीफ और रबी, दोनों मौसमों में प्राकृतिक खेती के तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अपने खेत की जरूरत के अनुसार खाद तैयार करने से उन्हें बाजार से कृषि इनपुट खरीदने पर होने वाले खर्च को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है।
योगेश जैन के मुताबिक, मिट्टी की उर्वरता में सुधार के लिए लगातार सही कृषि पद्धतियां अपनाना जरूरी है। वे आसपास के किसानों को भी स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से 3,125 किसानों को जोड़ने का लक्ष्य
चित्रकूट जिले में प्राकृतिक खेती को विस्तार देने के लिए कृषि विभाग राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत काम कर रहा है। जिला कृषि उप निदेशक जीत लाल गुप्ता के अनुसार, वर्ष 2026-27 के दौरान जिले में 25 क्लस्टर विकसित करके करीब 3,125 किसानों को इस मिशन से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
इस पहल के तहत किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों, जैविक इनपुट तैयार करने और फसल प्रबंधन से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को खेती के वैकल्पिक तरीकों की जानकारी देना और स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जीवामृत, बीजामृत, देसी गाय आधारित खाद बनाने की विधियां, प्राकृतिक कीट प्रबंधन और फसल चक्र में बदलाव जैसे विषय शामिल हैं।
गांव-गांव में किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण
कृषि विभाग के माध्यम से अलग-अलग गांवों में किसानों को समूहों के जरिए प्रशिक्षण देने की योजना पर काम किया जा रहा है। इसमें किसानों को खेत की मिट्टी की स्थिति समझने, फसलों के चयन और स्थानीय संसाधनों से कृषि इनपुट तैयार करने की जानकारी दी जाती है।
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को यह समझना भी जरूरी है कि शुरुआती चरण में फसल उत्पादन में उतार-चढ़ाव हो सकता है। इसलिए खेत की स्थिति के अनुसार धीरे-धीरे बदलाव करना, फसल की नियमित निगरानी करना और कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेना उपयोगी रहता है।
विभाग का मानना है कि किसानों को लगातार प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन मिलने से प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने में मदद मिल सकती है।
फलदार पेड़ों के साथ सहफसली खेती से मिल रही अतिरिक्त उपज
नाथूराम अपने खेत में फलदार पेड़ों के साथ सब्जियों और अनाज की सहफसली खेती भी करते हैं। इस पद्धति से उन्हें अलग-अलग समय पर उपज प्राप्त करने का अवसर मिलता है। साथ ही, एक ही फसल पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
उनके खेत को देखने के लिए आसपास के किसान पहुंचते हैं और प्राकृतिक खेती के तरीके समझते हैं। नाथूराम का अनुभव बताता है कि उपलब्ध जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने और फसलों में विविधता लाने से किसानों को आय के कई संभावित स्रोत मिल सकते हैं।
प्राकृतिक खेती से किसानों की आय बढ़ाने की उम्मीद
चित्रकूट के किसानों के अनुभवों से पता चलता है कि प्राकृतिक खेती, पशुपालन और सहफसली खेती को एक साथ अपनाकर कृषि लागत को नियंत्रित करने के अवसर विकसित किए जा सकते हैं। गोबर और गोमूत्र जैसे स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल बाजार से खरीदे जाने वाले कुछ कृषि इनपुट पर निर्भरता घटा सकता है।
हालांकि, प्राकृतिक खेती से बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा हासिल करने के लिए सही तकनीक, फसल का उपयुक्त चयन, मौसम के अनुसार प्रबंधन और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण हैं।

