कुरुक्षेत्र में बैसाखी महोत्सव 2026 की शुरुआत, किसानों की मेहनत और खालसा पंथ स्थापना का जश्न।
धर्म, संस्कृति और परंपरा की पावन भूमि कुरुक्षेत्र में दो दिवसीय ‘बैसाखी महोत्सव 2026’ का भव्य शुभारंभ हर्षोल्लास के साथ किया गया। इस आयोजन ने जहां एक ओर किसानों की मेहनत और समर्पण को सम्मानित किया, वहीं दूसरी ओर सिख इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय—खालसा पंथ की स्थापना—को भी श्रद्धा के साथ स्मरण किया गया।
बैसाखी का पर्व भारतीय कृषि संस्कृति में विशेष महत्व रखता है। यह दिन रबी की फसल की कटाई के साथ किसानों की मेहनत और उनके परिश्रम का उत्सव है। हरियाणा और पंजाब सहित पूरे उत्तर भारत में इस अवसर पर उत्साह और उमंग का माहौल देखने को मिलता है। कुरुक्षेत्र की पवित्र धरती, जिसे धर्मक्षेत्र के रूप में जाना जाता है, इस आयोजन के लिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह भूमि धर्म, कर्म और संस्कृति का प्रतीक मानी जाती है।
इतिहास के पन्नों में झांकें तो यही दिन सिख धर्म के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिसने सिख समुदाय को नई पहचान और दिशा प्रदान की। इस अवसर पर गुरु साहिबान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके आदर्शों—साहस, सेवा और समर्पण—को याद किया गया।
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महोत्सव के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों, धार्मिक आयोजनों और लोक कला प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों को भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत से रूबरू कराया गया। श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भारी भीड़ इस आयोजन में शामिल होकर बैसाखी के महत्व को महसूस कर रही है।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि बैसाखी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह भारतीय समाज की एकता, परिश्रम और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। किसानों की मेहनत का सम्मान करना और गुरु परंपरा के आदर्शों को अपनाना ही इस पर्व का मूल संदेश है।
इस भव्य आयोजन के माध्यम से न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का प्रयास किया गया है, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपने इतिहास और परंपराओं से जोड़ने का संदेश दिया गया है। बैसाखी महोत्सव 2026 का यह आयोजन श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत संगम बनकर उभरा है।

