तमिलनाडु में धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती लपेटक और थ्रिप्स का खतरा बढ़ा। कृषि विश्वविद्यालय ने कीट नियंत्रण और रोग प्रबंधन की सलाह दी।
तमिलनाडु में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए अक्टूबर महीने में फसल की निगरानी करना बेहद जरूरी हो गया है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के पादप सुरक्षा अध्ययन केंद्र ने अक्टूबर के लिए जारी कीट एवं रोग पूर्वानुमान में तना छेदक, पत्ती लपेटक, थ्रिप्स और राइस ब्लैक बग जैसे कीटों के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है। विश्वविद्यालय के अनुसार, राज्य के विभिन्न जिलों में इन कीटों का प्रकोप धान की फसल को प्रभावित कर सकता है।
पूर्वानुमान में तिरुवल्लुर जिले में तना छेदक और थ्रिप्स, सेलम में पत्ती लपेटक तथा तंजावुर में राइस ब्लैक बग की समस्या सामने आने की जानकारी दी गई है। इसके साथ ही धान में जीवाणु झुलसा रोग से बचाव के लिए भी किसानों को जरूरी उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।
धान में तना छेदक और पत्ती लपेटक से बचाव कैसे करें?
धान की फसल में तना छेदक का प्रकोप होने पर पौधों के तने प्रभावित होते हैं, जिससे बालियों के विकास और दानों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। वहीं, पत्ती लपेटक कीट पत्तियों को लपेटकर उनके हरे हिस्से को नुकसान पहुंचाता है। इससे पौधों की भोजन बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की ओर से जारी सलाह में तना छेदक के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित विकल्प बताए गए हैं:
- फ्लूबेंडियामाइड 20% WG की 125 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर।
- कार्टैप हाइड्रोक्लोराइड 50% SP की 1,000 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर।
पत्ती लपेटक के प्रबंधन के लिए भी इन विकल्पों के साथ क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5% SC की 125 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर अथवा क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 0.4% G की 10 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर का उल्लेख किया गया है।
किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि ये अलग-अलग विकल्प हैं, इन्हें एक साथ मिलाकर इस्तेमाल करने की सलाह नहीं समझना चाहिए। किसी भी कीटनाशक का चयन कीट की पहचान, फसल की अवस्था और वर्तमान पंजीकृत लेबल निर्देशों के आधार पर ही करें।
थ्रिप्स और गॉल मिज के नियंत्रण पर भी जोर
धान की फसल में थ्रिप्स और गॉल मिज का प्रकोप पौधों की बढ़वार को प्रभावित कर सकता है। थ्रिप्स पौधों की पत्तियों से रस चूसते हैं, जबकि गॉल मिज के कारण पौधों की सामान्य वृद्धि बाधित हो सकती है।
विश्वविद्यालय की सलाह में इन कीटों के प्रबंधन के लिए थायामेथोक्सम 25% WG की 100 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इसका उपयोग करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि संबंधित उत्पाद धान की फसल और लक्षित कीट के लिए वर्तमान में स्वीकृत हो।
किसानों को खेतों में नियमित निरीक्षण करना चाहिए, ताकि शुरुआती अवस्था में ही कीटों की पहचान करके उचित कदम उठाए जा सकें।
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राइस ब्लैक बग के लिए जैविक उपाय अपनाने की सलाह
तंजावुर जिले में राइस ब्लैक बग की समस्या को देखते हुए विश्वविद्यालय ने नीम बीज गिरी अर्क (NSKE) के उपयोग का विकल्प बताया है। इसके लिए 5 प्रतिशत NSKE तैयार करने में प्रति हेक्टेयर 25 किलोग्राम नीम की गिरी के उपयोग का उल्लेख किया गया है।
नीम आधारित उत्पादों का उचित उपयोग एकीकृत कीट प्रबंधन में सहायक हो सकता है। किसानों को स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से इसकी तैयारी, पानी की मात्रा और छिड़काव की विधि के बारे में जानकारी लेनी चाहिए।
इसके अलावा पीले चिपचिपे ट्रैप और प्रकाश ट्रैप का इस्तेमाल कीटों की निगरानी के लिए किया जा सकता है। इन उपायों से खेत में कीटों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलती है।
धान में जीवाणु झुलसा रोग से फसल बचाने के उपाय
कीटों के साथ धान की फसल में जीवाणु झुलसा रोग का खतरा भी बना रह सकता है। इस रोग में पत्तियों पर लक्षण दिखाई देते हैं और गंभीर स्थिति में पौधों की बढ़वार तथा उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
विश्वविद्यालय के पूर्वानुमान में कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77% WP की 1.25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त स्ट्रेप्टोमाइसिन और टेट्रासाइक्लिन के मिश्रण को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP के साथ उपयोग करने का विकल्प भी बताया गया है।
बुवाई से पहले बीज उपचार पर दें विशेष ध्यान
धान की फसल में शुरुआती रोगों का जोखिम कम करने के लिए बीज उपचार को महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्वविद्यालय की सलाह में बैसिलस सबटिलिस की 10 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज अथवा कार्बेन्डाजिम और ट्राइसाइक्लाजोल की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज से उपचार का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, बीज उपचार के लिए दवा का चयन संबंधित रोग, बीज की स्थिति और वर्तमान पंजीकृत उपयोग निर्देशों के अनुसार होना चाहिए। अलग-अलग उत्पादों को बिना विशेषज्ञ सलाह के मिलाना उचित नहीं है।
समय पर बीज उपचार करने, स्वस्थ बीज चुनने और खेत की स्वच्छता बनाए रखने से फसल में कुछ रोगों के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
बारिश और नमी के मौसम में खेत की निगरानी जरूरी
अक्टूबर के दौरान बदलते मौसम और बीच-बीच में होने वाली बारिश से खेतों में नमी बनी रह सकती है। कुछ कीटों और रोगों के लिए ऐसी परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैं। इसलिए किसानों को फसल की स्थिति पर नियमित नजर रखने की जरूरत है।
कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किसान इन बातों का ध्यान रखें:
- खेत में जरूरत से अधिक पानी जमा न होने दें और जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखें।
- पत्तियों, तनों और पौधों की बढ़वार का नियमित निरीक्षण करें।
- खेत की मेड़ों और आसपास उगी अनावश्यक घास-फूस को नियंत्रित रखें।
- कीटों की निगरानी के लिए उपयुक्त ट्रैप का इस्तेमाल करें।
- कीट या रोग की पुष्टि होने पर ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं।
- रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा उपकरण और लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करें।
आसपास के खेतों में भी यदि समान समस्या दिखाई दे, तो कृषि विभाग के मार्गदर्शन में समन्वित प्रबंधन अपनाना उपयोगी हो सकता है।
किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेने की अपील
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों को फसल की अवस्था और कीटों के प्रकोप के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी है। केवल अनुमान के आधार पर कीटनाशक का छिड़काव करने के बजाय पहले कीट या रोग की सही पहचान करना जरूरी है।
समय पर निगरानी, उचित जल प्रबंधन, संतुलित कृषि पद्धतियां और आवश्यकता के अनुसार कीट नियंत्रण अपनाने से फसल को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
धान उत्पादक किसान किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें। इससे फसल की सुरक्षा के साथ अनावश्यक रसायनों के उपयोग और अतिरिक्त लागत को कम करने में भी सहायता मिल सकती है।

