श्रीदेवी की 4.77 एकड़ चेन्नई जमीन को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने और मध्यस्थता से समाधान का सुझाव दिया।
दिवंगत बॉलीवुड अभिनेत्री श्रीदेवी की पारिवारिक संपत्ति से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। चेन्नई के शोलींगनलूर इलाके में स्थित करीब 4.77 एकड़ जमीन को लेकर चल रहे विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को आपसी बातचीत के जरिए मामला सुलझाने का सुझाव दिया है।
जस्टिस के. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने मामले में संपत्ति की मौजूदा स्थिति बनाए रखने का निर्देश देते हुए मध्यस्थता की संभावना पर जोर दिया। कोर्ट ने संकेत दिया कि विवाद के समाधान के लिए हाई कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश को मध्यस्थ नियुक्त किया जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर को निर्धारित है।
1988 में खरीदी गई थी 4.77 एकड़ जमीन
विवादित जमीन चेन्नई के शोलींगनलूर क्षेत्र में ईस्ट कोस्ट रोड के पास स्थित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्रीदेवी, उनकी मां और बहन ने वर्ष 1988 में चार अलग-अलग सेल डीड के माध्यम से यह जमीन खरीदी थी।
श्रीदेवी का निधन वर्ष 2018 में हुआ था। इसके बाद 2023 में संपत्ति से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में उनके पति बोनी कपूर और बेटियों जाह्नवी कपूर तथा खुशी कपूर के नाम दर्ज किए गए। इस संपत्ति पर वर्तमान में कपूर परिवार का फार्म हाउस बताया जाता है।
जमीन के मालिकाना हक को लेकर क्या है विवाद?
राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के बाद एम.सी. शिवकामी, एम.सी. नटराजन और चंद्रभानु की ओर से चेंगलपट्टू की सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि वर्ष 1988 में हुई जमीन की बिक्री वैध नहीं थी। उनका कहना है कि वे एम.सी. संबंद मुदलियार के वंशज हैं, जिन्होंने 1943 में यह संपत्ति खरीदी थी। याचिकाकर्ताओं ने जमीन में अपने परिवार का 1/5 हिस्सा होने का दावा किया है।
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मद्रास हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
कपूर परिवार ने निचली अदालत में दायर मुकदमे को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। मई में जस्टिस टी.वी. तमिलसेल्वी की पीठ ने बोनी कपूर और उनकी बेटियों के पक्ष में फैसला देते हुए निचली अदालत में दायर सिविल मुकदमे को खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट के अनुसार 1988 में हुई संपत्ति की बिक्री को लगभग चार दशक बाद चुनौती दी गई थी। अदालत ने माना कि दावा निर्धारित लिमिटेशन अवधि के बाहर दाखिल किया गया था।
हाई कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ताओं की ओर से कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं किया गया। अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा था कि संबंधित व्यक्तियों का कानूनी वारिस होने का दावा और वारिस प्रमाण पत्र पहले ही रद्द किया जा चुका था।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
हाई कोर्ट के फैसले के बाद शिवकामी और अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से दलील दी गई कि हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों की विस्तृत जांच करते हुए ऐसा किया जो ट्रायल कोर्ट के स्तर पर होना चाहिए था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके दावे की वैधता का फैसला निचली अदालत में मुकदमे की सुनवाई के दौरान किया जाना चाहिए था। उन्होंने परिवार के उत्तराधिकार से जुड़े मुद्दों को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल विवादित संपत्ति को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। इसका अर्थ है कि अगली सुनवाई तक जमीन की मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं किया जाएगा।
साथ ही अदालत ने दोनों पक्षों को बातचीत और मध्यस्थता के जरिए विवाद खत्म करने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया है। कोर्ट की ओर से मध्यस्थ की नियुक्ति भी की जा सकती है, ताकि दोनों पक्ष अदालत के बाहर समाधान तक पहुंचने की कोशिश कर सकें।
18 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक संपत्ति की स्थिति बरकरार रहेगी और पक्षकारों के बीच मध्यस्थता की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है, इसलिए जमीन के अंतिम मालिकाना हक को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद ही माना जाएगा।

