छिंदवाड़ा में कम बारिश के चलते कृषि विभाग ने रबी सीजन में चना, सरसों, मसूर और अलसी की खेती को प्राथमिकता देने तथा पानी बचाने की सलाह दी।
जिले में इस वर्ष सामान्य से कम बारिश होने के कारण आगामी रबी सीजन में सिंचाई के पानी की उपलब्धता सीमित रहने की आशंका है। इसे देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को उपलब्ध मिट्टी की नमी और सिंचाई संसाधनों के आधार पर फसलों का चयन करने की सलाह दी है। इसी संबंध में उप संचालक कृषि कार्यालय छिंदवाड़ा में खाद-बीज व्यापारी संघ, कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों की बैठक आयोजित की गई।
उप संचालक कृषि मोरिस नाथ की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में रबी फसलों की तैयारी, बीजों की उपलब्धता और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों की किस्मों पर चर्चा की गई। बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र चंदनगांव और आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
छिंदवाड़ा में सामान्य से कम हुई बारिश, सिंचाई जल की उपलब्धता पर चिंता
कृषि विभाग के अनुसार, जिले में अब तक 832 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई है, जबकि सामान्य औसत वर्षा 1,059 मिलीमीटर है। बारिश में कमी के कारण आगामी रबी सीजन में किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए बैठक में ऐसी फसलों और किस्मों के चयन पर जोर दिया गया, जिन्हें कम पानी में उगाया जा सके और जो कम समय में तैयार हो जाएं। साथ ही, कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में चना, सरसों, मसूर और अलसी की खेती को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई।
चना, सरसों और मसूर की खेती पर रहेगा जोर
बैठक में कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन सीमित हैं, वहां कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें किसानों के लिए बेहतर विकल्प हो सकती हैं। इन फसलों की उपयुक्त किस्मों का चयन करते समय उनकी अवधि, उपलब्ध नमी और संभावित उत्पादन को ध्यान में रखना जरूरी है।
खाद-बीज व्यापारी संघ और संबंधित अधिकारियों के साथ चना, सरसों एवं मसूर के बीजों की किस्मवार उपलब्धता की भी समीक्षा की गई, ताकि किसानों को बुवाई के समय आवश्यक बीज मिल सकें।
आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र, चंदनगांव की कृषि वैज्ञानिक डॉ. शिखा शर्मा ने कहा कि जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है, उन्हें भी पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। जलस्तर में गिरावट की आशंका को देखते हुए कम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों को प्राथमिकता देना उपयोगी हो सकता है। इससे सीमित सिंचाई उपलब्ध होने पर भी फसल उत्पादन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
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समय पर बुवाई और मिट्टी की नमी का संरक्षण जरूरी
कृषि विज्ञान केंद्र, चंदनगांव की कृषि वैज्ञानिक डॉ. सरिता सिंह ने किसानों को खेत में मौजूद नमी का अधिकतम उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने समय पर बुवाई, उचित बीज दर और नमी संरक्षण की तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का उपयोग फसल की महत्वपूर्ण विकास अवस्थाओं में प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। इससे सीमित जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है और फसल को आवश्यकतानुसार पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
स्प्रिंकलर और माइक्रो इरीगेशन से बचाएं पानी
उप संचालक कृषि मोरिस नाथ ने किसानों से अपील की कि वे अपनी भूमि और सिंचाई संसाधनों के अनुसार ही रबी फसलों का चयन करें। उन्होंने पानी की बचत के लिए माइक्रो इरीगेशन तकनीक को बढ़ावा देने और स्प्रिंकलर प्रणाली के उपयोग के प्रति किसानों को जागरूक करने की आवश्यकता बताई।
कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आधुनिक तकनीकों को अपनाने से उपलब्ध जल का बेहतर उपयोग करने में सहायता मिल सकती है।
जीरो टिलेज पद्धति से नमी संरक्षण पर जोर
बैठक में सहायक कृषि यंत्री अश्विनी सिंह ने आगामी रबी सीजन में मिट्टी की नमी को सुरक्षित रखने के लिए जीरो टिलेज पद्धति अपनाने की सलाह दी। उन्होंने खरीफ फसलों के अवशेषों का उचित प्रबंधन करते हुए रबी फसलों की बुवाई करने पर जोर दिया।
जीरो टिलेज जैसी तकनीकों का उद्देश्य खेत की तैयारी में संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और मिट्टी की नमी को संरक्षित रखने में सहायता करना है।
बैठक में कृषि विभाग के अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, खाद-बीज व्यापारी संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा, व्यापारियों, फसल बीमा कंपनी के प्रतिनिधि तथा अन्य संबंधित अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी रबी सीजन के लिए किसानों को समय रहते आवश्यक मार्गदर्शन और बीज उपलब्धता की जानकारी देना रहा।

