केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों की मांगों पर प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनाई है। जानें गन्ने की कीमत, चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य और तौल प्रक्रिया की जांच से जुड़ी पूरी जानकारी।
गन्ने की कीमत बढ़ाने और चीनी उद्योग से जुड़ी समस्याओं को लेकर किसानों की मांगों के बीच केंद्र सरकार ने उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद करेंगे। समिति गन्ने के लाभकारी मूल्य, चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य और चीनी मिलों में गन्ने की तौल से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी।
यह फैसला 12 अक्टूबर को दिल्ली में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी और कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के किसान प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। सरकार ने बैठक में एक सप्ताह के भीतर समिति गठित करने की बात कही थी। इसके दो दिन बाद ही समिति की अध्यक्षता के लिए रमेश चंद के नाम पर सहमति बन गई।
समिति के गठन को गन्ना किसानों की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर विचार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, सरकार ने अभी गन्ने या चीनी की कीमतों में किसी तत्काल बदलाव की घोषणा नहीं की है।
गन्ने की कीमत को लेकर क्यों नाराज हैं किसान?
कर्नाटक के गन्ना किसान पिछले कुछ समय से अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। बेलगावी जिले में 13 और 14 अक्टूबर को किसानों ने कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा पर स्थित कोग्नोली टोल प्लाजा के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-48 पर यातायात बाधित किया था। इस कारण पुणे-कोल्हापुर मार्ग पर आवाजाही प्रभावित हुई।
किसान संगठनों का कहना है कि गन्ने की खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसानों को बेहतर कीमत मिलनी चाहिए। कर्नाटक राज्य रैयत संघ के नेता चुन्नप्पा पुजेरी ने दिल्ली में हुई बैठक के बाद कहा था कि गन्ने की कीमत को लेकर कोई ठोस फैसला नहीं होने के कारण किसान चर्चा के नतीजों से संतुष्ट नहीं हैं।
वहीं, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बैठक को रचनात्मक बताते हुए किसानों से सड़क पर यातायात बाधित करने से बचने की अपील की थी।
किसान संगठनों की प्रमुख मांगों में गन्ने का भाव 5,500 रुपये प्रति टन करना, चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य 60 रुपये प्रति किलोग्राम निर्धारित करना, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना और कर्नाटक में उत्पादित इथेनॉल की सरकारी खरीद सुनिश्चित करना शामिल है।
रमेश चंद समिति किन पांच मुद्दों की करेगी जांच?
केंद्र सरकार की ओर से गठित समिति गन्ना किसानों और चीनी उद्योग से संबंधित पांच प्रमुख विषयों पर विचार करेगी। इसका उद्देश्य मूल्य निर्धारण, उत्पादन लागत और मिलों में होने वाली प्रक्रियाओं से जुड़ी समस्याओं का आकलन करना है।
1. गन्ने के लाभकारी मूल्य में बढ़ोतरी की मांग
समिति खेती की लागत और किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए गन्ने का लाभकारी मूल्य बढ़ाने की मांग की समीक्षा करेगी। इसमें यह समझने का प्रयास होगा कि किसानों को उनकी उत्पादन लागत के अनुरूप उचित कीमत कैसे मिल सकती है।
2. चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य की समीक्षा
चीनी मिलों के गेट से बिक्री के लिए निर्धारित न्यूनतम मूल्य में संशोधन की मांग पर भी विचार किया जाएगा। इसके तहत चीनी उत्पादन की लागत और मिलों की वित्तीय स्थिति का आकलन किया जाएगा।
3. चीनी रिकवरी दर की जांच
समिति चीनी रिकवरी की गणना, रिपोर्टिंग और सत्यापन की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करेगी। रिकवरी दर से यह पता चलता है कि गन्ने की एक निश्चित मात्रा से कितनी चीनी प्राप्त होती है। इस आंकड़े का चीनी मिलों और किसानों के बीच भुगतान व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है।
4. गन्ने की तौल प्रक्रिया में पारदर्शिता
चीनी मिलों में गन्ने का वजन करने की प्रक्रिया की जांच भी समिति के कार्यक्षेत्र में शामिल है। इसमें तौल मशीनों के कैलिब्रेशन, निरीक्षण और वजन की सटीकता से जुड़े पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा।
5. मशीन से कटाई किए गए गन्ने पर वजन कटौती
मशीनों से काटे गए गन्ने के वजन में की जाने वाली कटौती और उसके कारण किसानों को मिलने वाले भुगतान पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जांच होगी। इसका उद्देश्य यह समझना है कि तौल और कटौती की प्रक्रिया में किसानों को किसी तरह की आर्थिक परेशानी तो नहीं हो रही है।
समिति में कौन-कौन होंगे शामिल?
प्रोफेसर रमेश चंद इस उच्चस्तरीय समिति की अध्यक्षता करेंगे। वह नीति आयोग के पूर्व सदस्य होने के साथ ICAR के राष्ट्रीय कृषि आर्थिक एवं नीति अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक और 15वें वित्त आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं।
समिति में कृषि आयुक्त, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव (चीनी) और उपभोक्ता मामले विभाग में विधिक माप विज्ञान से जुड़े संयुक्त सचिव सदस्य के रूप में शामिल होंगे।
इस संरचना के जरिए कृषि उत्पादन, चीनी उद्योग और तौल व्यवस्था से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर विशेषज्ञों की राय लेने का प्रयास किया जाएगा।
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कब तक आएगी समिति की रिपोर्ट?
सरकार के अनुसार, समिति किसान प्रतिनिधियों, चीनी मिल संघों, राज्य सरकारों और संबंधित विशेषज्ञों से बातचीत करेगी। इन सभी पक्षों के विचारों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर समिति अपनी सिफारिशें तैयार करेगी।
समिति को यथाशीघ्र रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है। रिपोर्ट मिलने के बाद सक्षम प्राधिकारी उसकी सिफारिशों पर विचार करेगा।
फिलहाल समिति की रिपोर्ट जमा करने की कोई निश्चित तारीख सार्वजनिक नहीं की गई है। इसी तरह गन्ने के भाव या चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य में तत्काल संशोधन को लेकर भी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
किसान संगठनों की नजर अब समिति की कार्रवाई और उसकी सिफारिशों पर है। उनका कहना है कि मांगों पर जल्द समाधान नहीं निकलने की स्थिति में आंदोलन को दोबारा तेज किया जा सकता है।
FRP और SAP में क्या है अंतर?
गन्ने की कीमत को समझने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) और राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) के बीच अंतर जानना जरूरी है।
केंद्र सरकार हर साल गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी FRP निर्धारित करती है। वहीं, कुछ राज्य सरकारें अपने यहां के किसानों के लिए इससे अलग राज्य परामर्शित मूल्य यानी SAP घोषित करती हैं।
कर्नाटक में किसानों की मांग राज्य स्तर पर निर्धारित होने वाले गन्ने के मूल्य से जुड़ी है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में गन्ने की तौल और चीनी रिकवरी दर की पारदर्शिता प्रमुख मुद्दों में शामिल है।
पेराई सीजन से पहले इन मांगों को लेकर बढ़े विवाद के कारण किसानों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में समिति से उम्मीद की जा रही है कि वह किसानों की शिकायतों और चीनी उद्योग की आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करके समाधान के विकल्प सुझाएगी।
गन्ना किसानों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इन राज्यों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं, जबकि चीनी मिलें और उनसे जुड़े उद्योग भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराते हैं।
गन्ने की कीमत, चीनी रिकवरी और तौल की पारदर्शिता का सीधा संबंध किसानों की आमदनी से है। यदि इन प्रक्रियाओं में सुधार होता है, तो किसानों को भुगतान से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।
रमेश चंद समिति की सिफारिशें इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं, क्योंकि इनके प्रभाव केवल कर्नाटक और महाराष्ट्र तक सीमित रहने के बजाय देश के अन्य गन्ना उत्पादक राज्यों की मूल्य निर्धारण और भुगतान व्यवस्था से जुड़े विमर्श को भी प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, किसानों को वास्तविक राहत कितनी मिलेगी, यह समिति की सिफारिशों, सरकार के निर्णय और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। फिलहाल किसानों की प्रमुख उम्मीद यही है कि उनकी मांगों पर ठोस फैसला लिया जाए और गन्ने की खेती को आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी बनाया जाए।

