शहडोल में धान की फसल पर सफेद माहू का प्रकोप बढ़ रहा है। जानें इसके लक्षण, बचाव के उपाय और कीट नियंत्रण के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह।
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में धान की फसल पर सफेद माहू (White-backed Plant Hopper) कीट का प्रकोप किसानों की चिंता बढ़ा रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते इस कीट की पहचान करके उचित नियंत्रण नहीं किया गया, तो धान की पैदावार में 50 से 60 प्रतिशत तक नुकसान होने की आशंका है। फिलहाल गोहपारू विकासखंड के पोंडी गांव सहित आसपास के क्षेत्रों में किसानों के खेतों में इस कीट की मौजूदगी देखी जा रही है।
धान की फसल में कीट का हमला ऐसे समय सामने आया है, जब फसल बाली निकलने की अवस्था में पहुंच रही है। यह चरण उपज के लिहाज से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार समय पर बचाव के उपाय अपनाने की जरूरत है।
पोंडी गांव में धान की फसल पर दिखा कीट का प्रकोप
शहडोल जिले के गोहपारू विकासखंड के पोंडी गांव में सफेद माहू के हमले की जानकारी सामने आई है। स्थानीय किसान अरविंद यादव के अनुसार, उनके खेतों के साथ आसपास के कई किसानों की धान की फसल में भी इस कीट का प्रकोप दिखाई दे रहा है। कुछ खेतों में पौधों पर इसके असर के लक्षण नजर आने लगे हैं।
क्षेत्र में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, इसलिए कीट का फैलाव किसानों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देने और प्रभावित पौधों की समय पर पहचान करने की सलाह दी है।
बाली निकलने से पहले हमला करता है सफेद माहू
कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति के मुताबिक, सफेद माहू धान की फसल में बाली निकलने से पहले भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए कीट के प्रकोप को शुरुआती स्तर पर पहचानना और उचित नियंत्रण करना जरूरी है।
सफेद माहू एक रस चूसने वाला कीट है, जो धान के पौधों के तने के निचले हिस्से में छिपकर रहता है। यह पौधों से रस खींचता है, जिससे उनकी बढ़वार प्रभावित होती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां पीली पड़ सकती हैं और धीरे-धीरे सूखने लगती हैं। गंभीर स्थिति में पौधे सूख सकते हैं, जिसे हॉपर बर्न कहा जाता है।
चूंकि यह कीट पौधे के निचले हिस्से में छिपा रहता है, इसलिए कई बार किसान शुरुआती चरण में इसके हमले को पहचान नहीं पाते। जब तक फसल में स्पष्ट नुकसान दिखाई देता है, तब तक कीट की संख्या काफी बढ़ सकती है।
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धान को सफेद माहू से बचाने के लिए क्या करें?
कृषि वैज्ञानिकों ने धान की फसल को सुरक्षित रखने के लिए कुछ जरूरी उपाय अपनाने की सलाह दी है।
- खेत में पानी नियंत्रित रखें: खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा न होने दें। जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखें।
- यूरिया का संतुलित इस्तेमाल करें: जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन वाली खाद डालने से बचें। खाद का उपयोग मिट्टी और फसल की आवश्यकता के अनुसार करें।
- खरपतवार हटाएं: खेत और मेड़ों पर उगने वाले खरपतवार की नियमित सफाई करें, ताकि कीटों के छिपने और पनपने की जगह कम हो।
- फसल की निगरानी करें: पौधों के निचले तने और पत्तियों के आसपास नियमित रूप से कीटों की जांच करें।
- सही समय पर नियंत्रण करें: कीट की पहचान होने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर उपयुक्त नियंत्रण विधि अपनाएं।
बादल छाए रहने, अधिक नमी और खेत में लगातार पानी भरा रहने जैसी परिस्थितियां कीट की समस्या को बढ़ा सकती हैं। इसलिए फसल की स्थिति और स्थानीय मौसम के अनुसार प्रबंधन करना जरूरी है।
सफेद माहू के नियंत्रण के लिए कौन-सी दवा उपयोगी है?
उपलब्ध जानकारी में रासायनिक नियंत्रण के लिए थायोमेथोक्सम 25% WG का उल्लेख किया गया है। इसमें प्रति लगभग 15 लीटर पानी की टंकी में 5 ग्राम दवा मिलाने की सलाह दी गई है। एक एकड़ के लिए लगभग 10 टंकियों के बराबर घोल की मात्रा भी बताई गई है।
हालांकि, किसी कीटनाशक का इस्तेमाल करने से पहले उसके वर्तमान पंजीकृत लेबल, धान की फसल के लिए स्वीकृत उपयोग, लक्षित कीट और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह की पुष्टि करना जरूरी है। केवल सामान्य मात्रा के आधार पर छिड़काव न करें।
दवा की मात्रा, पानी की जरूरत और छिड़काव की विधि खेत की स्थिति, इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण और उत्पाद के निर्देशों के अनुसार अलग हो सकती है। छिड़काव के दौरान सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करें और लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें।
नीम तेल और जैविक उपायों पर भी ध्यान
कम प्रकोप की स्थिति में नीम आधारित उत्पादों को एकीकृत कीट प्रबंधन के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी में एक लीटर नीम तेल को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करने का उल्लेख है। लेकिन नीम तेल की सही मात्रा उसके फॉर्मूलेशन और उत्पाद के निर्देशों पर निर्भर करती है, इसलिए इस मात्रा को सभी उत्पादों के लिए समान न मानें।
जैविक खेती करने वाले किसान निमास्त्र जैसे पारंपरिक जैविक घोलों पर भी विचार कर सकते हैं। इनके उपयोग से पहले कृषि विशेषज्ञ से सही विधि और प्रभावशीलता की जानकारी लेना उचित है। गंभीर प्रकोप की स्थिति में केवल घरेलू या जैविक उपायों पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाना चाहिए।
शहडोल के किसानों को क्यों सतर्क रहने की जरूरत?
धान की बाली निकलने और दाने बनने की प्रक्रिया फसल की अंतिम उपज निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस दौरान पौधों पर कीटों का अधिक दबाव होने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
गोहपारू क्षेत्र के अलावा जिले के अन्य धान उत्पादक इलाकों के किसानों को भी नियमित रूप से खेतों की जांच करने की सलाह दी गई है। पौधों के निचले हिस्से में कीटों के समूह दिखाई देने, पत्तियों के पीले पड़ने या पौधों के सूखने जैसे लक्षण मिलने पर तुरंत कृषि विभाग या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करना चाहिए।
समय पर पहचान, संतुलित खाद प्रबंधन, खेत में उचित जल निकासी और सही कीट नियंत्रण उपाय अपनाकर नुकसान के जोखिम को कम किया जा सकता है। फिलहाल किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि वे धान की फसल की नियमित निगरानी करें और किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल प्रमाणित कृषि सलाह के अनुसार ही करें।

