Pregnancy Tests: जानें प्रेग्नेंसी में किस महीने कौन सा टेस्ट और स्कैन जरूरी है, NT स्कैन, एनोमली स्कैन और ग्लूकोज टेस्ट की पूरी जानकारी।
Pregnancy Tests: गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे की सेहत पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी होता है। प्रेग्नेंसी कंफर्म होने के बाद नियमित डॉक्टर विजिट के साथ कुछ जरूरी ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और अन्य जांचें कराई जाती हैं। इनका उद्देश्य गर्भावस्था की प्रगति, बच्चे के विकास और मां की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करना होता है।
हर महिला की प्रेग्नेंसी अलग होती है, इसलिए सभी जांचों का समय और जरूरत डॉक्टर की सलाह के अनुसार तय की जानी चाहिए। आइए जानते हैं गर्भावस्था के अलग-अलग चरणों में आमतौर पर कौन सी जांचें की जाती हैं।
पहली तिमाही: प्रेग्नेंसी के शुरुआती तीन महीने
गर्भावस्था के शुरुआती सप्ताहों में डॉक्टर कुछ बेसिक जांचों के साथ अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं।
6 से 8 सप्ताह: शुरुआती अल्ट्रासाउंड
लगभग 6 से 8 सप्ताह के आसपास अल्ट्रासाउंड के जरिए गर्भावस्था की स्थिति और गर्भ के स्थान की जानकारी ली जा सकती है। इस चरण में भ्रूण की धड़कन और गर्भावस्था की प्रगति का आकलन भी किया जा सकता है।
हालांकि, अल्ट्रासाउंड का सही समय आपकी आखिरी माहवारी की तारीख और डॉक्टर के आकलन पर निर्भर करता है।
11 से 13 सप्ताह: NT स्कैन और स्क्रीनिंग
11 से 13 सप्ताह के आसपास NT (Nuchal Translucency) स्कैन किया जाता है। इसके साथ डॉक्टर कुछ मामलों में डबल मार्कर या अन्य क्रोमोसोमल स्क्रीनिंग टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।
इन जांचों का उद्देश्य डाउन सिंड्रोम समेत कुछ क्रोमोसोम संबंधी स्थितियों के जोखिम का आकलन करना होता है। ये स्क्रीनिंग टेस्ट होते हैं, इसलिए इनके परिणाम किसी बीमारी की निश्चित पुष्टि नहीं करते।
दूसरी तिमाही: चौथे से छठे महीने तक
गर्भावस्था के दूसरे चरण में बच्चे के अंगों के विकास और मां की स्वास्थ्य स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
18 से 22 सप्ताह: एनोमली या लेवल-2 स्कैन
लगभग 18 से 22 सप्ताह के बीच Anomaly Scan किया जाता है। इसे कई जगह लेवल-2 स्कैन भी कहा जाता है।
इस अल्ट्रासाउंड में बच्चे के शरीर की संरचना और विकास को विस्तार से देखा जाता है। डॉक्टर बच्चे के मस्तिष्क, हृदय, रीढ़, हाथ-पैर, गुर्दे और अन्य प्रमुख अंगों की जांच कर सकते हैं।
24 से 28 सप्ताह: गर्भावस्था में डायबिटीज की जांच
इस अवधि में डॉक्टर OGTT/GTT (Oral Glucose Tolerance Test) की सलाह दे सकते हैं। इसका उपयोग गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज यानी Gestational Diabetes की पहचान के लिए किया जाता है।
इसी दौरान डॉक्टर हीमोग्लोबिन और अन्य रक्त जांचों के जरिए एनीमिया या खून की कमी की भी जांच कर सकते हैं।
also read: Folded Pillow Side Effects: तकिया मोड़कर सोते हैं तो हो जाएं सावधान…
तीसरी तिमाही: सातवें से नौवें महीने तक
गर्भावस्था के अंतिम चरण में बच्चे के विकास के साथ-साथ प्रसव की तैयारी पर भी ध्यान दिया जाता है।
28 से 32 सप्ताह: ग्रोथ स्कैन
डॉक्टर जरूरत के अनुसार Growth Scan की सलाह दे सकते हैं। इसमें बच्चे की ग्रोथ, अनुमानित वजन, प्लेसेंटा और गर्भ में मौजूद एम्नियोटिक फ्लूइड जैसी चीजों का आकलन किया जा सकता है।
यह जांच हर गर्भवती महिला के लिए एक ही समय पर या एक ही संख्या में जरूरी हो, ऐसा नहीं है। इसकी आवश्यकता डॉक्टर गर्भावस्था की स्थिति के अनुसार तय करते हैं।
32 से 36 सप्ताह: डॉप्लर टेस्ट
कुछ गर्भावस्थाओं में Doppler Ultrasound की जरूरत पड़ सकती है। इसके जरिए गर्भनाल और बच्चे से जुड़े रक्त प्रवाह का आकलन किया जाता है।
डॉप्लर की जरूरत सामान्य गर्भावस्था में हमेशा नहीं होती। डॉक्टर इसे किसी विशेष चिकित्सकीय कारण या जोखिम की स्थिति में सुझा सकते हैं।
आखिरी हफ्तों में कौन सी जांचें होती हैं?
डिलीवरी के करीब डॉक्टर मां और बच्चे की स्थिति के अनुसार अलग-अलग जांच कर सकते हैं। इनमें ब्लड प्रेशर, वजन, यूरिन टेस्ट और कुछ मामलों में NST (Non-Stress Test) शामिल हो सकता है। इन जांचों से डॉक्टर को बच्चे की स्थिति और गर्भावस्था की प्रगति पर नजर रखने में मदद मिलती है।
प्रेग्नेंसी टेस्ट से पहले किन बातों का ध्यान रखें?
1. हर टेस्ट के लिए खाली पेट जाना जरूरी नहीं
सभी प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए फास्टिंग आवश्यक नहीं होती। उदाहरण के लिए, कुछ ग्लूकोज टेस्ट में निर्धारित समय तक खाली पेट रहने की जरूरत हो सकती है, जबकि अल्ट्रासाउंड के लिए अलग निर्देश हो सकते हैं। इसलिए किसी भी जांच से पहले डॉक्टर या डायग्नोस्टिक सेंटर से तैयारी के बारे में जरूर पूछें।
2. स्कैन की तारीख को लेकर लापरवाही न करें
कुछ प्रेग्नेंसी स्कैन एक विशेष गर्भावधि में अधिक उपयोगी होते हैं। इसलिए डॉक्टर द्वारा बताई गई तारीख के आसपास जांच कराने की कोशिश करें। अगर किसी कारण से निर्धारित समय पर स्कैन नहीं हो पाया है, तो खुद से चिंता करने के बजाय डॉक्टर से अगला सही समय पूछें।
3. पुरानी मेडिकल रिपोर्ट साथ रखें
हर प्रेग्नेंसी विजिट पर अपनी पिछली ब्लड रिपोर्ट, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट, दवाइयों की जानकारी और अन्य मेडिकल रिकॉर्ड साथ रखना उपयोगी होता है। इससे डॉक्टर गर्भावस्था की अब तक की प्रगति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
4. दूसरी महिलाओं से अपनी प्रेग्नेंसी की तुलना न करें
हर गर्भावस्था का अनुभव अलग होता है। किसी दूसरी महिला को जो टेस्ट या स्कैन करवाया गया है, जरूरी नहीं कि वही आपके लिए भी आवश्यक हो। जांचों का फैसला आपकी उम्र, मेडिकल हिस्ट्री, गर्भावस्था की स्थिति और डॉक्टर की सलाह के आधार पर किया जाता है।
5. अल्ट्रासाउंड से पहले जांच केंद्र के निर्देश जानें
कुछ शुरुआती अल्ट्रासाउंड में भरा हुआ ब्लैडर उपयोगी हो सकता है, जबकि बाद के स्कैन में इसकी जरूरत नहीं होती। इसलिए हर बार जांच केंद्र से पहले ही पूछ लें कि पानी कितना पीना है या कोई अन्य तैयारी करनी है।
कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच के अलावा कुछ लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। तेज पेट दर्द, भारी रक्तस्राव, पानी जैसा फ्लूइड निकलना, तेज सिरदर्द, नजर धुंधली होना, अचानक ज्यादा सूजन या बच्चे की गतिविधियों में स्पष्ट कमी महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर या नजदीकी अस्पताल से संपर्क करें।

