सदाबहार की खेती से किसान औषधीय फसल के जरिए अतिरिक्त आय कमा सकते हैं। जानें इसकी उन्नत किस्में, मिट्टी, बुवाई, सिंचाई, कटाई और उपज की जानकारी।
सदाबहार यानी पेरीविंकल एक ऐसी बहुवर्षीय फसल है, जिसका उपयोग सजावटी पौधे के साथ-साथ औषधीय महत्व के कारण भी किया जाता है। देश के कई हिस्सों में यह पौधा बंजर, रेतीली और कम उपजाऊ जमीन पर भी आसानी से विकसित हो जाता है। इसके विभिन्न हिस्सों में पाए जाने वाले जैव सक्रिय यौगिकों के कारण औषधीय उद्योग में इसकी मांग रहती है।
सदाबहार के पौधे पर गुलाबी और सफेद रंग के आकर्षक फूल आते हैं। यही कारण है कि इसे घरों और बगीचों में सजावटी पौधे के रूप में भी लगाया जाता है। वहीं, इसकी पत्तियों और जड़ों का इस्तेमाल औषधीय कच्चे माल के रूप में किया जाता है। ऐसे में उचित बाजार और प्रसंस्करण उद्योग से जुड़कर किसान इस फसल को अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में अपना सकते हैं।
सदाबहार का औषधीय महत्व
सदाबहार में कई प्रकार के इंडोल एल्केलॉइड पाए जाते हैं। इसकी जड़ों में राउबेसिन यानी अजमालिसिन और सर्पेंटाइन जैसे यौगिक पाए जाते हैं। वहीं पत्तियों में विनब्लास्टिन और विनक्रिस्टिन जैसे एल्केलॉइड मौजूद होते हैं, जिनका उपयोग औषधीय क्षेत्र में किया जाता है।
इन यौगिकों के कारण सदाबहार का महत्व फार्मास्यूटिकल उद्योग में बढ़ जाता है। हालांकि, किसी बीमारी के इलाज के लिए पौधे या इससे बने उत्पादों का उपयोग चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।
अलग-अलग मिट्टी में हो सकती है सदाबहार की खेती
सदाबहार उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अच्छी तरह बढ़ता है। सामान्य तौर पर लगभग 100 सेंटीमीटर या उससे अधिक समान रूप से वितरित वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी वर्षा आधारित खेती की जा सकती है।
यह पौधा कई प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन अत्यधिक क्षारीय और पानी के जमाव वाली जमीन इसके लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। व्यावसायिक उत्पादन के लिए हल्की दोमट या रेतीली मिट्टी, जिसमें पर्याप्त जैविक पदार्थ हो और जल निकासी अच्छी हो, बेहतर रहती है।
बीज से तैयार करें सदाबहार की फसल
सदाबहार का प्रमुख प्रवर्धन बीजों के माध्यम से किया जाता है। ताजे बीजों की अंकुरण क्षमता बेहतर रहती है, जबकि लंबे समय तक रखे गए बीजों की गुणवत्ता और अंकुरण क्षमता कम हो सकती है।
बड़े क्षेत्र में खेती के लिए सीधे खेत में बीज की बुवाई की जा सकती है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए लगभग 2 से 3 किलोग्राम बीज पर्याप्त माने जाते हैं। बीजों को करीब 10 गुना मात्रा में रेत के साथ मिलाकर खेत में समान रूप से बोया जा सकता है।
मानसून की शुरुआत में लगभग 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी कतारों में बुवाई करने के बाद पौधों को छांटकर करीब 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर रखा जाता है।
नर्सरी विधि से भी तैयार कर सकते हैं पौधे
नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए करीब 500 ग्राम बीजों की आवश्यकता एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त हो सकती है। बीजों को मार्च-अप्रैल में तैयार क्यारियों में लगभग 1.5 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जाता है।
बुवाई के बाद बीजों को हल्की मिट्टी और सड़ी हुई पत्तियों की खाद से ढककर क्यारी में नमी बनाए रखी जाती है। सामान्य परिस्थितियों में करीब 10 दिन में अंकुर निकलने लगते हैं।
लगभग दो महीने बाद जब पौधे 6 से 7 सेंटीमीटर ऊंचे हो जाएं, तब उन्हें मुख्य खेत में लगाया जा सकता है। पौधों की रोपाई 45×30 सेंटीमीटर या 45×45 सेंटीमीटर की दूरी पर की जा सकती है।
सदाबहार की फसल में सिंचाई और निराई-गुड़ाई
सदाबहार को सूखा सहन करने वाली फसल माना जाता है, इसलिए इसे लगातार सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। जिन क्षेत्रों में पूरे वर्ष पर्याप्त और समान वर्षा होती है, वहां अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता कम हो सकती है।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फसल की जरूरत के अनुसार लगभग 4 से 5 सिंचाई की जा सकती हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए सामान्यतः दो बार निराई-गुड़ाई की जरूरत पड़ती है। पहली निराई बुवाई या रोपाई के करीब 60 दिन बाद और दूसरी इसके लगभग 60 दिन बाद की जा सकती है।
खाद और उर्वरक प्रबंधन
सदाबहार की खेती में अत्यधिक खाद की आवश्यकता नहीं होती। बेहतर पत्तियों और जड़ों का उत्पादन लेने के लिए करीब 15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी हुई खाद देने की सिफारिश की जाती है।
इसके अलावा आधार खाद के रूप में लगभग 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फॉस्फोरस और 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की मात्रा का इस्तेमाल किया जा सकता है। वास्तविक मात्रा मिट्टी परीक्षण और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर तय करना बेहतर है।
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सदाबहार की प्रमुख किस्में
सदाबहार की कई स्थानीय किस्में फूलों के रंग के आधार पर पहचानी जाती हैं। इनमें अल्बा, रोजियस और ऑसिलाटा प्रमुख हैं।
1. अल्बा
अल्बा प्रकार के पौधों में सफेद रंग के फूल दिखाई देते हैं। इसे सदाबहार के सफेद फूल वाले स्थानीय प्रकार के रूप में जाना जाता है।
2. रोजियस
रोजियस में गुलाबी रंग के फूल आते हैं। सजावटी उपयोग के कारण भी यह प्रकार लोकप्रिय है।
3. ऑसिलाटा
ऑसिलाटा प्रकार के फूल सफेद होते हैं, लेकिन उनके बीच में गुलाबी या बैंगनी रंग का निशान दिखाई देता है।
4. निर्मल
निर्मल किस्म को सीमैप, लखनऊ द्वारा विकसित किया गया है। यह सफेद फूलों वाली किस्म है। इससे लगभग 1,200 किलोग्राम सूखी पत्तियां और करीब 80 किलोग्राम जड़ें प्रति हेक्टेयर प्राप्त होने की जानकारी दी गई है। यह कॉलर रॉट और रूट रॉट के प्रति प्रतिरोधी बताई जाती है।
5. धवल
धवल किस्म निर्मल के बीजों पर रासायनिक उत्परिवर्तन तकनीक के माध्यम से विकसित की गई है। इसे भी सीमैप, लखनऊ ने विकसित किया है। इसकी पत्तियों की उपज लगभग 1,352 से 2,557 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बताई जाती है। इसमें पत्तियों में एल्केलॉइड की मात्रा करीब 0.89 से 1.40 प्रतिशत और जड़ों में 1.60 से 2.22 प्रतिशत तक हो सकती है। यह डाई-बैक रोग के प्रति प्रतिरोधी बताई जाती है।
6. प्रभात
प्रभात किस्म हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में विकसित की गई है। इसकी फसल अवधि करीब 8 से 10 महीने रहती है। इससे लगभग 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी जड़ें और 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी पत्तियां प्राप्त की जा सकती हैं। इसके पौधे में गहरे बैंगनी रंग का तना, चमकदार पत्तियां और गहरे गुलाबी फूल पाए जाते हैं।
कब करें सदाबहार की कटाई?
सदाबहार की जड़ों को सामान्यतः लगभग एक वर्ष बाद खोदा जाता है। पत्तियों की पहली तुड़ाई बुवाई के करीब छह महीने बाद और दूसरी तुड़ाई लगभग नौ महीने बाद की जा सकती है। अंतिम बार पूरे पौधे की कटाई एक वर्ष के आसपास की जाती है।
बीज तैयार करने के लिए पूरी तरह पके फलों को पौधे से तोड़कर छाया में सुखाया जाता है। इसके बाद हल्की मड़ाई करके बीज अलग किए जाते हैं। स्वस्थ और समान अंकुरण के लिए पके हुए फलों से प्राप्त बीजों का इस्तेमाल बेहतर माना जाता है।
जड़ों की खुदाई और प्रसंस्करण
जड़ों की कटाई के समय पौधे को जमीन से लगभग 7.5 सेंटीमीटर ऊपर से काटा जाता है। इसके बाद खेत में पर्याप्त सिंचाई कर जुताई की जाती है, जिससे मिट्टी के भीतर मौजूद जड़ों को निकालना आसान हो जाता है।
निकाली गई जड़ों को अच्छी तरह साफ करने के बाद धोकर छाया में सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें बंडल बनाकर बाजार या संबंधित औषधीय उद्योग के लिए भेजा जा सकता है।
सदाबहार की संभावित उपज
वर्षा आधारित खेती में एक हेक्टेयर क्षेत्र से औसतन लगभग 0.75 टन सूखी जड़ें, 1 टन सूखे तने और करीब 2 टन सूखी पत्तियां प्राप्त हो सकती हैं।
वहीं सिंचित परिस्थितियों में उपज बढ़कर लगभग 1.5 टन सूखी जड़ें, 1.5 टन सूखे तने और 3 टन सूखी पत्तियों तक पहुंच सकती है। वास्तविक उत्पादन मिट्टी, जलवायु, किस्म, पोषण, सिंचाई और खेत प्रबंधन पर निर्भर करता है।
किसानों के लिए क्यों बन सकता है आय का विकल्प?
सदाबहार की खासियत यह है कि यह कम उपजाऊ और अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों में भी विकसित हो सकता है। औषधीय उद्योग में इसके कच्चे माल की मांग होने के कारण किसानों के लिए यह पारंपरिक फसलों के साथ एक वैकल्पिक औषधीय फसल बन सकती है।
हालांकि, बड़े स्तर पर इसकी खेती शुरू करने से पहले किसान को स्थानीय बाजार, खरीदार, औषधीय प्रसंस्करण इकाइयों और कृषि विशेषज्ञों से जानकारी जरूर लेनी चाहिए। इससे उत्पादन के साथ-साथ बिक्री और बेहतर मूल्य प्राप्त करने की योजना भी पहले से तैयार की जा सकेगी।

