भारी बारिश के बाद धान की फसल में झूठा कंड, ब्लास्ट और बैक्टीरियल ब्लाइट का खतरा बढ़ा। जानें ICAR की सलाह, बचाव के उपाय और फसल प्रबंधन के तरीके।
लगातार बारिश और खेतों में जलभराव की स्थिति के कारण धान की फसल में झूठा कंड (फॉल्स स्मट), ब्लास्ट और बैक्टीरियल ब्लाइट जैसे रोगों का खतरा बढ़ सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक ने अक्टूबर के पहले पखवाड़े के लिए जारी कृषि सलाह में किसानों को फसल की निगरानी करने और रोगों की रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाने की सलाह दी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बारिश के बाद खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने, अधिक नमी और लगातार बादल छाए रहने से धान में फफूंद तथा जीवाणुजनित रोगों के फैलने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में जल निकासी, संतुलित पोषण और समय पर रोग की पहचान करना महत्वपूर्ण है।
जलभराव वाले खेतों से अतिरिक्त पानी निकालने की सलाह
केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान के अनुसार, जिन खेतों में भारी बारिश के कारण पानी जमा हो गया है, वहां सबसे पहले अतिरिक्त पानी निकालने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके बाद जारी सलाह में प्रति एकड़ पांच किलोग्राम पोटाश देने का उल्लेख किया गया है, ताकि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व मिल सकें।
किसानों को खेतों का नियमित निरीक्षण करने और पौधों पर रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करने की सलाह दी गई है।
बाली निकलने से पहले झूठे कंड रोग की रोकथाम जरूरी
धान में झूठा कंड यानी फॉल्स स्मट का खतरा विशेष रूप से बाली निकलने की अवस्था के आसपास रहता है। इस रोग में धान की बालियों के कुछ दानों पर पीले या हरे रंग के फफूंदयुक्त गोले दिखाई दे सकते हैं।
जारी कृषि सलाह में रोग की रोकथाम के लिए बाली निकलने से पहले निम्नलिखित विकल्पों का उल्लेख किया गया है:
- कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77%: 400 ग्राम प्रति एकड़।
- टेबुकोनाज़ोल 25%: 400 ग्राम प्रति एकड़।
जरूरत के अनुसार सात दिन बाद दोबारा छिड़काव करने का भी उल्लेख है। हालांकि, दवा के चयन और मात्रा की पुष्टि उत्पाद के लेबल तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर करनी चाहिए। रोग के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने के बाद नियंत्रण कठिन हो सकता है, इसलिए समय पर निगरानी जरूरी है।
धान में ब्लास्ट रोग से बचाव के लिए क्या करें?
धान का ब्लास्ट रोग पत्तियों और पौधों के अन्य हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। अधिक नमी और अनुकूल मौसम में इसका प्रसार तेजी से हो सकता है।
संस्थान की सलाह में ब्लास्ट के प्रबंधन के लिए इन फफूंदनाशकों का उल्लेख किया गया है:
- टेबुकोनाज़ोल 50% और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन 25% का मिश्रण: 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी।
- एडिफेनफॉस 50 ईसी: 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी।
- ट्राइसाइक्लाज़ोल 75 डब्ल्यूपी: 0.6 ग्राम प्रति लीटर पानी।
भारी जलभराव वाले खेतों के लिए सलाह में दस लीटर पानी में उक्त मिश्रण की चार ग्राम मात्रा या आइसोप्रोथियोलेन 40 ईसी की 15 मिलीलीटर मात्रा का उल्लेख है। जरूरत पड़ने पर सात से दस दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करने की बात भी कही गई है।
इन रसायनों का उपयोग करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संबंधित उत्पाद धान में ब्लास्ट रोग के नियंत्रण के लिए पंजीकृत हो और उसकी अनुशंसित मात्रा स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हो।
also read: धान की फसल पर तना छेदक और भूरे फुदके का खतरा, ICAR के वैज्ञानिकों…
बैक्टीरियल ब्लाइट और लीफ स्ट्रीक से बचाव
भारी बारिश और अधिक नमी के बीच धान में बैक्टीरियल ब्लाइट तथा बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक जैसे जीवाणुजनित रोगों पर भी नजर रखना जरूरी है।
दी गई कृषि सलाह में प्लांटोमाइसिन और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के मिश्रण का उल्लेख किया गया है। इसमें प्रति लीटर पानी में दोनों की एक-एक ग्राम मात्रा तथा जलभराव वाले खेतों के लिए दस लीटर पानी में एक ग्राम प्लांटोमाइसिन और 20 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का सुझाव शामिल है।
हालांकि, जीवाणुजनित रोगों के लिए किसी भी रसायन का उपयोग करने से पहले उसके वर्तमान पंजीकरण, अनुमोदित उपयोग और लेबल निर्देशों की पुष्टि करें। रोग की सही पहचान के बिना दवा का छिड़काव करने से अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता।
धान की रोपाई नहीं हुई तो इन फसलों पर कर सकते हैं विचार
जिन खेतों में अत्यधिक बारिश के कारण धान की बुवाई या रोपाई नहीं हो पाई है, वहां किसान स्थानीय मौसम, मिट्टी और उपलब्ध समय के अनुसार कम अवधि वाली वैकल्पिक फसलों पर विचार कर सकते हैं।
संस्थान की सलाह में चौलाई, रागी, कुल्थी, मूंग, उड़द, लोबिया, शकरकंद और तिल जैसी फसलों का उल्लेख किया गया है। उपयुक्त फसल का चयन स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए, ताकि उपलब्ध खेत और मौसम का बेहतर उपयोग किया जा सके।
धान की फसल का नियमित निरीक्षण करना जरूरी
वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार बादल छाए रहने और वातावरण में नमी अधिक होने पर फफूंद तथा जीवाणुजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए किसानों को खेत में पौधों की स्थिति नियमित रूप से देखनी चाहिए।
घनी फसल में हवा का संचार कम होने से नमी लंबे समय तक बनी रह सकती है। खेत की उचित देखभाल, जरूरत के अनुसार अतिरिक्त पानी की निकासी और संतुलित उर्वरक प्रबंधन रोगों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।
संस्थान ने धान स्वास्थ्य क्लिनिक की सुविधा का भी उल्लेख किया है, जहां किसान अपनी फसल के नमूने लेकर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह क्लिनिक कटक में सोमवार से शुक्रवार सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक संचालित होता है।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
बारिश के बाद धान की फसल में किसी भी प्रकार के रोग के लक्षण दिखने पर जल्दबाजी में रसायनों का इस्तेमाल करने के बजाय पहले रोग की पहचान कराएं। एक ही प्रकार के फफूंदनाशक का बार-बार इस्तेमाल करने से प्रतिरोध विकसित होने का जोखिम हो सकता है, इसलिए दवाओं का चयन विशेषज्ञों के निर्देशों के अनुसार करें।
किसानों को सलाह दी जाती है कि किसी भी रसायन का छिड़काव करने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विस्तार अधिकारी से संपर्क करें। सही समय पर निगरानी, जल निकासी और प्रमाणित कृषि सलाह के पालन से धान की फसल को नुकसान से बचाने में मदद मिल सकती है।

