धान में तना छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके से बचाव के तरीके जानें। ICAR के वैज्ञानिकों की सलाह और कीट प्रबंधन के उपाय पढ़ें।
धान की फसल में अक्टूबर के पहले पखवाड़े के दौरान तना छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके जैसे कीट किसानों की चिंता बढ़ा सकते हैं। इन कीटों से फसल को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक ने किसानों के लिए कृषि सलाह जारी की है। इसमें कीटों की निगरानी, जैविक नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर कीटनाशकों के उपयोग से जुड़े उपाय बताए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि खेत में कीटों की स्थिति का नियमित निरीक्षण करें और बिना आवश्यकता कीटनाशकों का छिड़काव न करें। समय पर पहचान और उचित प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
धान की फसल में यूरिया की दूसरी खुराक देने की सलाह
संस्थान के अनुसार, जिन खेतों में रोपाई की गई धान की फसल पुष्पगुच्छ निकलने की अवस्था में पहुंच गई है, वहां प्रति एकड़ 17.5 किलोग्राम यूरिया की दूसरी टॉप ड्रेसिंग देने की सलाह दी गई है। रेतीली मिट्टी वाले खेतों में इसके साथ प्रति एकड़ 13 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश देने का भी सुझाव है।
हालांकि, उर्वरक का इस्तेमाल फसल की अवस्था, मिट्टी की स्थिति और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। खासकर भूरे फुदके का प्रकोप दिखाई देने पर नाइट्रोजन उर्वरक का अतिरिक्त इस्तेमाल नुकसान बढ़ा सकता है।
तना छेदक और पत्ती लपेटक की निगरानी के लिए लगाएं फेरोमोन ट्रैप
धान की फसल में तना छेदक और पत्ती लपेटक कीटों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रति एकड़ चार से पांच फेरोमोन ट्रैप लगाने का सुझाव दिया है।
जब ट्रैप में नर पतंगों की संख्या चार से पांच प्रति ट्रैप तक पहुंच जाए, तब जरूरत के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाए जा सकते हैं। सलाह में निम्नलिखित कीटनाशकों का उल्लेख किया गया है:
- क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5% एससी: 60 मिलीलीटर प्रति एकड़।
- टेट्रानिलिप्रोल 200 एससी: 100 से 120 मिलीलीटर प्रति एकड़।
- फ्लूबेंडियामाइड 20% डब्ल्यूजी: 50 ग्राम प्रति एकड़।
जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम और ट्राइकोग्रामा काइलोनिस के परजीवी कार्ड इस्तेमाल करने का भी सुझाव दिया गया है। सलाह के अनुसार, तीन कार्ड प्रति हेक्टेयर की दर से पांच बार, सात से दस दिन के अंतराल पर इनका उपयोग किया जा सकता है।
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भूरे फुदके से बचाव के लिए खेत में पानी का प्रबंधन जरूरी
भूरा फुदका यानी ब्राउन प्लांट हॉपर धान की फसल को नुकसान पहुंचाने वाला प्रमुख कीट है। संस्थान के अनुसार, प्रति पौधा पांच से दस कीट इसकी आर्थिक क्षति का स्तर माना गया है।
इसके नियंत्रण के लिए सबसे पहले खेत में बारी-बारी से पानी भरने और खेत को सुखाने की पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है। इससे खेत में पानी का उचित प्रबंधन किया जा सकता है और कीट के प्रकोप को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
यदि समस्या बनी रहती है, तो जारी सलाह में इन कीटनाशकों का उल्लेख है:
- ट्राइफ्लूमेजोपाइरिम 10% एससी: 94 मिलीलीटर प्रति एकड़।
- डाइनोटेफ्यूरान 20% एसजी: 60 से 80 ग्राम प्रति एकड़।
- पायमेट्रोजिन 50% डब्ल्यूजी: 120 ग्राम प्रति एकड़।
वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से आगाह किया है कि भूरे फुदके के प्रकोप के दौरान नाइट्रोजन उर्वरक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे कीटों की संख्या बढ़ने का खतरा हो सकता है।
शुरुआती अवस्था में थ्रिप्स कीट पर भी रखें नजर
जल्दी रोपी गई धान की फसल में थ्रिप्स कीट की समस्या भी सामने आ सकती है। इसके प्रबंधन के लिए सलाह में एज़ाडिरेक्टिन 0.15% की एक लीटर प्रति एकड़, लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5% ईसी की 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ या थायोमेथोक्सम 25% डब्ल्यूजी की 40 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा का उल्लेख किया गया है। थायोमेथोक्सम के लिए 200 लीटर पानी में घोल बनाने की बात कही गई है।
वहीं, गॉल मिज कीट के नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 5% एससी की 400 से 600 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा का उल्लेख किया गया है।
किसानों को किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले उत्पाद के लेबल, पंजीकृत उपयोग और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार मात्रा की पुष्टि करनी चाहिए।
केस वर्म, हिस्पा और स्वार्मिंग कैटरपिलर से बचाव के उपाय
धान की फसल में केस वर्म, हिस्पा और स्वार्मिंग कैटरपिलर जैसे कीट भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। उपलब्ध सलाह में क्लोरपायरीफॉस 20% ईसी की 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ या क्विनालफॉस 25% ईसी की 800 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, इन कीटनाशकों का इस्तेमाल करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि संबंधित उत्पाद धान में उस विशेष कीट के नियंत्रण के लिए वर्तमान नियमों के तहत पंजीकृत और अनुमोदित हो। केवल सामान्य सलाह के आधार पर रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए।
बाद में रोपी गई फसल में स्वार्मिंग कैटरपिलर दिखाई देने पर संस्थान की सलाह में प्रति हेक्टेयर दो लीटर केरोसिन के उपयोग के साथ खेत में रस्सी खींचकर पौधों को हिलाने की विधि का उल्लेख है। इस उपाय को अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से पुष्टि करना जरूरी है, क्योंकि केरोसिन से फसल, मिट्टी और जलीय पर्यावरण को नुकसान हो सकता है। सुरक्षित और स्वीकृत विकल्पों को प्राथमिकता दें।
फसल की नियमित निगरानी से घट सकता है नुकसान
केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक ने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और कीटों की पहचान के बाद ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी है। शुरुआती अवस्था में कीटों का पता चलने से फसल को गंभीर नुकसान से बचाने और अनावश्यक कीटनाशक खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।
संस्थान में धान स्वास्थ्य क्लिनिक की सुविधा भी उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है, जहां किसान फसल के नमूने लेकर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
धान उत्पादकों के लिए जरूरी है कि वे कीटों की पहचान, खेत में पानी का प्रबंधन और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल पर ध्यान दें। किसी भी कीटनाशक का छिड़काव करने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विस्तार अधिकारी से सलाह लेना बेहतर रहेगा।

