निमाड़ में बीटी कपास पर गुलाबी सुंडी का प्रकोप बढ़ा। किसान 6-8 बार छिड़काव के बाद भी परेशान हैं। जानें वैज्ञानिकों की सलाह और बचाव के उपाय।
मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में इस बार कपास किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर जिलों में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी के प्रकोप की शिकायतें सामने आ रही हैं। किसानों का कहना है कि बीटी कपास लगाने के बावजूद कीट का असर कम नहीं हो रहा है और उन्हें एक ही सीजन में छह से आठ बार तक कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ रहा है।
बार-बार दवा डालने के बावजूद खेतों में गुलाबी सुंडी का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हो रहा। किसानों के अनुसार इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ-साथ कपास की पैदावार और गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
बीटी कपास पर भी क्यों बढ़ा गुलाबी सुंडी का असर?
बीटी कपास को मुख्य रूप से कुछ प्रमुख कीटों से फसल की सुरक्षा के उद्देश्य से विकसित किया गया था। ऐसे में किसानों का कहना है कि यदि बीटी कपास में भी गुलाबी सुंडी को नियंत्रित करने के लिए लगातार कीटनाशक डालना पड़ रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कीट प्रबंधन में केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय समेकित कीट प्रबंधन (IPM) और अनुशंसित कृषि तकनीकों का पालन करना जरूरी है।
वैज्ञानिक ने बताया ज्यादा छिड़काव का कारण
भगवंतराव कृषि महाविद्यालय के पूर्व वरिष्ठ कपास वैज्ञानिक सतीश पारसाई के मुताबिक बीटी कपास को कीट नियंत्रण को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। उनका कहना है कि यदि किसान लगातार कई बार कीटनाशक का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं, तो खेती में निर्धारित तकनीकी उपायों के पालन की समीक्षा जरूरी है।
उन्होंने यह भी बताया कि जरूरत से ज्यादा कीटनाशक इस्तेमाल करने से किसानों की लागत बढ़ती है और लाभ घट सकता है। इसके अलावा लगातार रसायनों के प्रयोग का असर खेतों में मौजूद लाभकारी जीवों और कीटों पर भी पड़ सकता है।
फायदेमंद कीटों और पक्षियों पर भी असर
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में बार-बार रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल लक्षित कीटों को ही प्रभावित नहीं करता। इसका असर कई ऐसे जीवों पर भी पड़ सकता है जो प्राकृतिक रूप से कीटों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
किसानों और विशेषज्ञों के अनुसार दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से खेतों में फायदेमंद कीटों, बिच्छुओं और पक्षियों की संख्या में कमी देखने को मिल सकती है। इससे प्राकृतिक कीट नियंत्रण की व्यवस्था कमजोर होने का खतरा रहता है।
गुलाबी सुंडी के नियंत्रण को लेकर क्या सलाह?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) की सामान्य सलाह के अनुसार गुलाबी सुंडी के शुरुआती प्रकोप में कुछ अनुशंसित कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
शुरुआती स्थिति में क्विनालफॉस या थायोडिकार्ब जैसे विकल्पों की सलाह दी जाती है। वहीं अक्टूबर के बाद जब खेत में कीट से होने वाला नुकसान आर्थिक सीमा तक पहुंच जाए, तभी सिंथेटिक पायरेथ्रॉइड समूह के कीटनाशकों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है।
नवंबर से पहले पायरेथ्रॉइड से बचने की सलाह
कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि नवंबर से पहले पायरेथ्रॉइड समूह की दवाओं का छिड़काव नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह अलग-अलग कीटनाशकों को बिना विशेषज्ञ सलाह के मिलाकर इस्तेमाल करने से भी बचने की सलाह दी जाती है।
ऐसा इसलिए क्योंकि समय से पहले या अनावश्यक रूप से इन रसायनों का इस्तेमाल करने से सफेद मक्खी जैसे दूसरे कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका हो सकती है।
also read: एक बीघा जमीन से 6 लाख रुपये की कमाई, मौसमी और अंतरफसल ने…
दवा छिड़कने से पहले नुकसान का आकलन जरूरी
विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि केवल कीट दिखाई देने पर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव करने के बजाय पहले फसल में नुकसान का स्तर जांचा जाए। यदि कीट की संख्या आर्थिक नुकसान की सीमा से नीचे है, तो अनावश्यक दवा का इस्तेमाल करने से बचना बेहतर है।
इससे खेती की लागत कम रखने के साथ-साथ खेत में मौजूद प्राकृतिक शत्रु कीटों को भी संरक्षण मिल सकता है।
निमाड़ की कपास अर्थव्यवस्था पर बढ़ी चिंता
निमाड़ क्षेत्र में कपास लंबे समय से किसानों की आय का महत्वपूर्ण आधार रहा है। ऐसे में गुलाबी सुंडी का बढ़ता प्रकोप केवल खेतों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे स्थानीय कृषि कारोबार पर पड़ सकता है।
किसानों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी नियंत्रण उपाय नहीं किए गए तो अगले सीजन में भी कीट की समस्या गंभीर बनी रह सकती है।
कपास की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है असर
कपास कारोबार से जुड़े व्यापारियों के अनुसार गुलाबी सुंडी के कारण फसल की गुणवत्ता प्रभावित होने की स्थिति में किसानों को मंडियों में अपेक्षाकृत कम कीमत मिल सकती है।
फसल की गुणवत्ता और रेशे की स्थिति खराब होने पर किसानों की बाजार आय पर सीधा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ खेत स्तर पर ही गुलाबी सुंडी के प्रभाव को नियंत्रित करने और आसपास के किसानों के साथ मिलकर सामूहिक कीट प्रबंधन अपनाने पर जोर दे रहे हैं।
नई कीट प्रतिरोधी किस्मों की मांग बढ़ी
मौजूदा बीटी कपास में गुलाबी सुंडी के प्रकोप की शिकायतों ने किसानों के बीच इन किस्मों की प्रभावशीलता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। लगातार बढ़ती लागत और बार-बार कीटनाशक छिड़काव से किसान आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों का मानना है कि भविष्य में बेहतर कीट प्रतिरोधी कपास किस्मों, वैज्ञानिक सलाह और समय पर निगरानी की जरूरत होगी।
यदि किसानों को सही समय पर कीट की पहचान, फसल निगरानी और उचित नियंत्रण उपायों की जानकारी मिलती है, तो कीटनाशकों पर अनावश्यक खर्च कम किया जा सकता है और कपास उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।

