भदोही में धान की फसल पर जीवाणु झुलसा और खैरा रोग का प्रकोप है। कृषि विभाग ने किसानों को बचाव, उपचार और दवा के सही इस्तेमाल की सलाह दी।
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में धान की फसल पर जीवाणु झुलसा और खैरा रोग का प्रकोप किसानों के लिए चिंता का कारण बन गया है। फसल में रोग के लक्षण सामने आने के बाद कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क करते हुए बचाव और उपचार को लेकर विस्तृत एडवाइजरी जारी की है।
उप कृषि निदेशक राम प्रवेश और जिला कृषि अधिकारी इरम मिर्जा ने किसानों से अपील की है कि वे धान के खेतों की नियमित निगरानी करें और रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही जरूरी कदम उठाएं। विभाग का कहना है कि समय पर रोग की पहचान और उचित उपचार से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
धान में कैसे पहचानें जीवाणु झुलसा रोग?
कृषि विभाग के अनुसार जीवाणु झुलसा रोग में धान की पत्तियों पर सबसे पहले किनारों और ऊपरी हिस्से से सूखने के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। धीरे-धीरे पत्तियां मुड़ने लगती हैं और उनका सामान्य आकार प्रभावित हो जाता है।
यदि शुरुआती अवस्था में रोग की पहचान नहीं हो पाती तो संक्रमण तेजी से फैल सकता है और खेत के बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकता है। इसलिए किसानों को पत्तियों में किसी भी असामान्य बदलाव पर तुरंत ध्यान देने की सलाह दी गई है।
जीवाणु झुलसा के लिए कृषि विभाग की सलाह
कृषि विभाग ने जीवाणु झुलसा के नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90 प्रतिशत और टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत के मिश्रण वाली दवा के इस्तेमाल की सलाह दी है।
विभाग के अनुसार इसकी 200 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ लेकर करीब 120 लीटर पानी में घोल तैयार कर फसल पर छिड़काव किया जा सकता है। रोग के लक्षण दिखाई देने के तुरंत बाद उपचार शुरू करने की सलाह दी गई है।
अधिकारियों के मुताबिक उपचार में देरी होने पर रोग खेत में तेजी से फैल सकता है, जिससे बाद में नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।
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खैरा रोग जिंक की कमी से जुड़ी समस्या
धान की फसल में दूसरा प्रमुख खतरा खैरा रोग का है। कृषि विभाग के अनुसार यह समस्या मुख्य रूप से मिट्टी में जिंक की कमी के कारण होती है।
खैरा रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां पीली दिखाई देने लगती हैं। इसके अलावा पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे भी नजर आ सकते हैं। समय पर पोषक तत्वों की कमी पूरी नहीं होने पर पौधों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
जिंक सल्फेट और यूरिया के घोल की सलाह
खैरा रोग से प्रभावित धान की फसल के लिए कृषि विभाग ने प्रति एकड़ 2 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 8 किलोग्राम यूरिया के घोल का छिड़काव करने की सलाह दी है।
विभाग के अनुसार समय रहते उपचार किए जाने पर पौधों की वृद्धि सामान्य होने में मदद मिल सकती है और फसल की उपज पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम किया जा सकता है।
जलभराव से भी किसानों को सावधान रहने की सलाह
कृषि विभाग ने किसानों को दवा का छिड़काव करने से पहले खेत में पानी की निकासी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है। अधिकारियों के मुताबिक खेत में अत्यधिक जलभराव रहने पर जीवाणु झुलसा के फैलने की संभावना बढ़ सकती है।
इसलिए किसानों को खेत में अनावश्यक पानी जमा नहीं होने देने और जरूरत के अनुसार जल निकासी की व्यवस्था बनाए रखने की सलाह दी गई है।
गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक कर रहा विभाग
रोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए कृषि विभाग की टीमें जिले के विभिन्न ब्लॉकों में खेतों का निरीक्षण कर रही हैं। इन टीमों का उद्देश्य प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने के साथ-साथ किसानों को रोगों के लक्षण और नियंत्रण के सही तरीके की जानकारी देना है।
इसके अलावा किसानों को जागरूक करने के लिए अलग-अलग गांवों में कृषि जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जा रहे हैं। इन शिविरों में कृषि रक्षा से जुड़े अधिकारी किसानों को फसल की निगरानी और दवाओं के उचित इस्तेमाल की जानकारी दे रहे हैं।
खुद के बचाए बीज के इस्तेमाल पर भी सावधानी
कृषि विभाग के अनुसार जिन खेतों में किसान पिछले वर्षों से बचाए हुए बीज का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहां जीवाणु झुलसा जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में अगले सीजन में प्रमाणित और उपचारित बीज का इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि स्वस्थ और प्रमाणित बीज का चयन फसल में कई तरह की शुरुआती समस्याओं को कम करने में मदद कर सकता है।
दवा इस्तेमाल करने से पहले विशेषज्ञों से लें सलाह
कृषि विभाग ने किसानों को किसी भी रोग के लक्षण दिखाई देने पर बिना पुष्टि के दवा का इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी है। किसानों को पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि रक्षा कार्यालय से संपर्क कर रोग की सही पहचान कराने को कहा गया है। विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही उपयुक्त दवा और उसकी मात्रा का इस्तेमाल करना किसानों के लिए बेहतर रहेगा।
मिट्टी की जांच से पहले ही पता चलेगी जिंक की कमी
कृषि विभाग किसानों को नियमित रूप से मिट्टी परीक्षण कराने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है। जिन खेतों की मिट्टी में पहले से जिंक की कमी होती है, वहां खैरा रोग की समस्या ज्यादा देखने को मिल सकती है।
मिट्टी की जांच से खेत में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति का पता चल जाता है। इसके आधार पर किसान अगली फसल की बुवाई से पहले जरूरी पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने की योजना बना सकते हैं।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
भदोही में धान की फसल को रोगों से बचाने के लिए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी, उचित जल निकासी, प्रमाणित बीज और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। रोग के शुरुआती लक्षण दिखने पर विशेषज्ञों से सलाह लेकर समय पर उपचार करना फसल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

