महाराष्ट्र में मानसून की जल्द विदाई से 265 तहसीलें सूखे की चपेट में हैं। सोयाबीन, प्याज, कपास और गन्ने की फसल पर संकट बढ़ा है।
महाराष्ट्र में मानसून की समय से पहले विदाई ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। राज्य की 358 तहसीलों में से 265 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है। कम बारिश का असर सोयाबीन, कपास, प्याज और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों पर पड़ने की आशंका है।
सामान्य समय से पांच दिन पहले विदा हुआ मानसून
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम मानसून 3 अक्टूबर को मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई हिस्सों से लौट गया। इस बार मानसून की वापसी सामान्य तारीख की तुलना में करीब पांच दिन पहले हुई है।
मुंबई में मानसून की यह वापसी पिछले करीब 25 वर्षों में दूसरी सबसे जल्दी वापसी बताई जा रही है। मानसून की जल्द विदाई ऐसे समय हुई है, जब राज्य के बड़े हिस्से में बारिश की कमी के कारण कृषि संकट गहराता जा रहा है।
महाराष्ट्र में 19 फीसदी कम बारिश
इस मानसून सीजन में महाराष्ट्र में कुल बारिश सामान्य औसत से लगभग 19 प्रतिशत कम रही। सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा क्षेत्र में दिखाई दिया, जहां बारिश में करीब 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
राज्य में सूखे की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 358 में से 265 तहसीलों को आधिकारिक रूप से सूखा प्रभावित घोषित किया गया है।
जिलेवार आंकड़ों में यवतमाल सबसे आगे है, जहां 16 तहसीलें सूखे की चपेट में हैं। जलगांव में 15, जबकि नांदेड, अमरावती और नागपुर में 14-14 तहसीलों को प्रभावित घोषित किया गया है।
फसल नुकसान का सर्वे शुरू
राज्य सरकार ने प्रभावित इलाकों में फसल नुकसान का आकलन तेज करने के निर्देश दिए हैं। जिला कलेक्टरों को मैदानी सर्वेक्षण कराने और नुकसान से जुड़े पंचनामे तैयार करने को कहा गया है।
फसल नुकसान का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए अधिकारियों को तस्वीरों के साथ GPS आधारित जानकारी जुटाने के निर्देश भी दिए गए हैं। इन रिपोर्टों के आधार पर किसानों को मुआवजा और दूसरी राहत देने को लेकर आगे फैसला लिया जाएगा।
किसानों के लिए राहत की तैयारी
महाराष्ट्र के राजस्व विभाग ने सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का आकलन शुरू कर दिया है। सरकार की शुरुआती राहत व्यवस्था में फसल ऋण के पुनर्गठन, कृषि बिजली बिलों में राहत और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत अतिरिक्त काम उपलब्ध कराने जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि, वास्तविक नुकसान का स्तर सर्वे पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
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मराठवाड़ा में सबसे ज्यादा चिंता
कम बारिश का सबसे गंभीर असर मराठवाड़ा में देखने को मिला है। करीब 40 प्रतिशत बारिश की कमी ने खरीफ फसलों की स्थिति पर दबाव बढ़ाया है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन में कमी का पूरा असर तुरंत सामने नहीं आता। कटाई के बाद जब फसल मंडियों में पहुंचती है, तब उत्पादन और आपूर्ति की वास्तविक स्थिति ज्यादा स्पष्ट होती है। ऐसे में अगले दो से तीन महीने कृषि बाजार के लिए अहम हो सकते हैं।
महाराष्ट्र की फसल पर असर का देशभर में प्रभाव
महाराष्ट्र देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य का कपास, गन्ना, सोयाबीन और प्याज के राष्ट्रीय उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान है।
ऐसे में यदि सूखे के कारण इन फसलों का उत्पादन घटता है, तो इसका असर केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा। देश के कई हिस्सों में कृषि जिंसों की उपलब्धता और कीमतों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने सरकार को संभावित उत्पादन कमी से निपटने के लिए पहले से आकस्मिक योजना तैयार करने की सलाह दी है। इसमें उत्पादन का शुरुआती अनुमान, जरूरत पड़ने पर आयात की तैयारी और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देना शामिल हो सकता है।
प्याज की कीमतों पर बढ़ सकता है दबाव
महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े प्याज उत्पादक राज्यों में से एक है। ऐसे में सूखे के कारण प्याज की पैदावार प्रभावित होने पर आने वाले महीनों में इसकी आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है।
प्याज के मामले में भंडारण भी एक बड़ी चुनौती है। यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है, तो मंडियों में आवक घट सकती है और बाजार में कीमतों का दबाव बढ़ सकता है।
गन्ने से चीनी और एथेनॉल उत्पादन पर असर
गन्ने की उपलब्धता में कमी का असर चीनी उद्योग पर पड़ने के साथ-साथ एथेनॉल उत्पादन पर भी दिखाई दे सकता है। महाराष्ट्र देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है, इसलिए राज्य में उत्पादन घटने का असर राष्ट्रीय आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
कपास और दालों को लेकर भी चिंता
कम बारिश का असर कपास उत्पादन पर भी पड़ने की आशंका है। घरेलू उत्पादन में संभावित कमी की स्थिति में भारत को आयात पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
इसी तरह दालों की घरेलू उपलब्धता को बनाए रखने के लिए शुल्क-मुक्त आयात की व्यवस्था मार्च 2027 तक जारी रखी गई है। महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति आने वाले महीनों में दालों समेत कई कृषि जिंसों की आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
महाराष्ट्र में मानसून की जल्दी विदाई और कई तहसीलों में सूखे की स्थिति सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। फिलहाल फसल नुकसान का विस्तृत आकलन जारी है।
आने वाले महीनों में मंडियों में फसल की आवक, उत्पादन के आंकड़े और बाजार कीमतों से सूखे के वास्तविक आर्थिक प्रभाव का पता चलेगा। किसानों को राहत देने के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकार के सामने कृषि आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने की भी चुनौती होगी।

