ओडिशा के कालाहांडी में 150 आदिवासी किसानों को उन्नत कार्प मछली, मीठे पानी के झींगा पालन, गुणवत्तापूर्ण बीज और आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग दी गई।
ओडिशा के कालाहांडी जिले में आदिवासी मछली किसानों और हैचरी संचालकों को आधुनिक जलीय कृषि तकनीकों की जानकारी दी गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान (CIFA), भुवनेश्वर की ओर से आयोजित कार्यशाला में 150 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें 50 महिला किसान भी शामिल थीं। कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिक तरीकों से मछली उत्पादन बढ़ाना और ग्रामीण परिवारों की आमदनी के नए अवसर विकसित करना है।
कालाहांडी में मछली पालन को बढ़ावा देने की पहल
ओडिशा के कालाहांडी जिले में मछली पालन से जुड़े आदिवासी समुदायों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान ने जिले की फिनस्पायर हैचरी में इस कार्यशाला का आयोजन किया।
यह कार्यक्रम अनुसूचित जनजाति उपयोजना (TSP) के अंतर्गत आयोजित किया गया। इसका मुख्य विषय टिकाऊ जलीय कृषि उत्पादन के लिए कार्प मछली और मीठे पानी के झींगे की उन्नत किस्मों तथा वैज्ञानिक पालन पद्धतियों पर केंद्रित था।
जिले के सभी 13 ब्लॉकों से आए 150 आदिवासी मछली किसानों और हैचरी मालिकों ने इसमें भाग लिया। प्रतिभागियों में 50 महिलाएं शामिल थीं, जो मत्स्य पालन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को भी दर्शाता है।
उन्नत कार्प किस्मों और झींगा पालन की दी गई जानकारी
कार्यशाला के दौरान वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों को आनुवंशिक रूप से बेहतर कार्प मछलियों, मीठे पानी में झींगा पालन और गुणवत्तापूर्ण मछली बीज तैयार करने की तकनीकों के बारे में जानकारी दी।
प्रशिक्षण में मुख्य रूप से इन विषयों पर चर्चा हुई:
- उन्नत कार्प मछली की किस्मों का चयन और पालन।
- मीठे पानी के झींगे के उत्पादन की वैज्ञानिक विधियां।
- हैचरी में प्रजनन के लिए बेहतर मूल स्टॉक का प्रबंधन।
- नर्सरी में मछली के बीज की देखभाल और बेहतर जीवित रहने की दर।
- गुणवत्तापूर्ण मछली बीज का उत्पादन और उपलब्धता।
- तालाब के पानी की गुणवत्ता और रोग नियंत्रण।
- मछली पालन के लिए बाजार की संभावनाएं और उत्पादन प्रबंधन।
वैज्ञानिकों ने समझाया कि बेहतर गुणवत्ता वाले बीज और उचित प्रबंधन अपनाने से मछली पालन की उत्पादकता में सुधार किया जा सकता है। इससे किसानों को कम संसाधनों में बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद मिल सकती है।
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किसान-वैज्ञानिक संवाद में उठे अहम सवाल
कार्यशाला में किसानों और वैज्ञानिकों के बीच संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। इस दौरान प्रतिभागियों ने मछली बीज की उपलब्धता, पालन के दौरान आने वाली समस्याओं, बीमारी से बचाव और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने से संबंधित सवाल पूछे।
हैचरी संचालकों को भी प्रजनन स्टॉक और नर्सरी प्रबंधन की बेहतर तकनीकों से अवगत कराया गया। गुणवत्तापूर्ण बीज का स्थानीय स्तर पर उत्पादन करने से किसानों की बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में ओडिशा सरकार के मत्स्य विभाग के 10 अधिकारी भी मौजूद रहे। सरकारी अधिकारियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी से किसानों को तकनीकी जानकारी के साथ विभागीय सहयोग से जुड़े विषयों पर चर्चा करने का अवसर मिला।
बेहतर मछली बीज से बढ़ सकती है किसानों की कमाई
मछली पालन में बीज की गुणवत्ता का सीधा संबंध उत्पादन और आर्थिक लाभ से होता है। यदि किसान बेहतर नस्ल का बीज चुनते हैं और शुरुआती अवस्था में उसकी उचित देखभाल करते हैं, तो तालाब में मछलियों की वृद्धि और जीवित रहने की संभावना बेहतर हो सकती है।
इसके अलावा, नर्सरी प्रबंधन के दौरान पानी की गुणवत्ता, पर्याप्त घुलित ऑक्सीजन और मछलियों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है। शुरुआती चरण में बीज की मृत्यु दर कम रखने से उत्पादन संबंधी नुकसान घटाने में मदद मिल सकती है।
आनुवंशिक रूप से उन्नत कार्प किस्में उचित परिस्थितियों में बेहतर वृद्धि क्षमता दिखा सकती हैं। हालांकि, वास्तविक उत्पादन तालाब की स्थिति, पानी की गुणवत्ता, भोजन, प्रबंधन और स्थानीय पर्यावरण पर भी निर्भर करता है।
आदिवासी परिवारों के लिए आय का नया विकल्प बन सकता है मत्स्य पालन
कालाहांडी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मछली पालन ग्रामीण परिवारों की आजीविका को मजबूत करने का एक विकल्प बन सकता है। परंपरागत तरीके से पालन करने वाले किसानों को वैज्ञानिक जानकारी और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध होने पर अपनी उत्पादन क्षमता सुधारने का अवसर मिलता है।
यदि किसान स्थानीय मांग के अनुसार मछली उत्पादन की योजना बनाते हैं, तो इससे घरेलू पोषण के साथ-साथ अतिरिक्त आय के अवसर भी विकसित हो सकते हैं। वहीं, हैचरी संचालक बेहतर बीज उत्पादन और नर्सरी प्रबंधन के जरिए अपने कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं।
ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को खेती के साथ-साथ मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के विविध साधन विकसित करने में मदद मिल सकती है।
महिला किसानों की भागीदारी रही खास
कार्यशाला में शामिल 150 प्रतिभागियों में 50 महिला किसानों की मौजूदगी उल्लेखनीय रही। इससे पता चलता है कि आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएं भी मछली पालन और उससे जुड़ी गतिविधियों में भागीदारी कर रही हैं।
महिला किसानों को वैज्ञानिक पालन विधियों, बीज प्रबंधन और उत्पादन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने से परिवार आधारित मत्स्य व्यवसाय को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण से टिकाऊ जलीय कृषि को मिलेगा बढ़ावा
ICAR के केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान की इस पहल का उद्देश्य आदिवासी किसानों और हैचरी संचालकों तक आधुनिक तकनीकी जानकारी पहुंचाना है। बेहतर बीज, वैज्ञानिक प्रबंधन और रोग नियंत्रण संबंधी उपायों को अपनाकर किसान मछली पालन की दक्षता में सुधार कर सकते हैं।
कालाहांडी जिले के सभी 13 ब्लॉकों से किसानों की भागीदारी इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के व्यापक दायरे को दर्शाती है। ऐसे प्रयास स्थानीय स्तर पर तकनीकी जागरूकता बढ़ाने और टिकाऊ जलीय कृषि को प्रोत्साहित करने में उपयोगी हो सकते हैं।

