ICAR और FCI ने अनाज भंडारण में कीट नियंत्रण के लिए नई तकनीकों पर काम शुरू किया है। जानें नाइट्रोजन, CO2 और फॉस्फीन तकनीक की पूरी जानकारी।
देश में गेहूं और चावल के सुरक्षित भंडारण को लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों संस्थानों ने अनाज के भंडारण के दौरान होने वाले कीट प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षित और टिकाऊ तकनीकों पर काम करने का फैसला किया है। इसके लिए 30 सितंबर को एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसकी जानकारी 1 अक्टूबर को सार्वजनिक की गई।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य सरकारी गोदामों में लंबे समय तक रखे जाने वाले गेहूं और चावल की गुणवत्ता को बनाए रखना तथा भंडारण के दौरान होने वाले नुकसान को कम करना है।
पुराने फ्यूमिगेशन रसायनों का असर हो रहा कम
अनाज के भंडारण में कीटों को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय से कई तरह के फ्यूमिगेंट्स का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इनमें एल्युमिनियम फॉस्फाइड और मैलाथियान जैसे रसायन प्रमुख हैं।
हालांकि, देश के कुछ प्रमुख राज्यों में भंडारण कीटों में इन रसायनों के प्रति प्रतिरोध काफी बढ़ गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ क्षेत्रों में यह प्रतिरोध 72 से 100 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि पारंपरिक रसायनों का प्रभाव कई जगहों पर पहले की तुलना में काफी कम हो गया है।
ऐसे में अनाज को नुकसान से बचाने के लिए वैकल्पिक और अधिक प्रभावी तकनीकों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
ICAR-CIPHET और FCI मिलकर करेंगे काम
इस समझौते पर ICAR की ओर से ICAR-CIPHET, लुधियाना के निदेशक डॉ. नचिकेत कोटवालीवाले और FCI की ओर से कार्यकारी निदेशक डॉ. ए.के. सिन्हा ने हस्ताक्षर किए।
इस अवसर पर कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट भी मौजूद रहे। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग भी इस पहल से जुड़ा हुआ है।
देश में किसानों से खरीदा गया बड़ी मात्रा में गेहूं और चावल सरकारी गोदामों में कई महीनों तक रखा जाता है। इस दौरान कीटों के कारण अनाज की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ-साथ भंडारण नुकसान भी बढ़ सकता है।
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इन चार तकनीकों पर होगा परीक्षण
नई परियोजना के तहत अलग-अलग भंडारण परिस्थितियों के लिए गैस आधारित तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा। धातु के साइलो में रखे गेहूं के लिए 99 प्रतिशत से अधिक शुद्धता वाली नाइट्रोजन गैस के इस्तेमाल का परीक्षण किया जाएगा।
इस तकनीक में भंडारण वातावरण में ऑक्सीजन की उपलब्धता कम करके कीटों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाएगा। वहीं, बोरियों में रखे गेहूं और चावल के लिए कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन के संयोजन का परीक्षण किया जाएगा।
हर्मेटिक यानी हवा-रोधी कवर में रखे अनाज के लिए कार्बन डाइऑक्साइड आधारित तकनीक को भी जांचा जाएगा। इन तकनीकों की प्रभावशीलता के साथ-साथ अनाज की गुणवत्ता और लागत से जुड़े पहलुओं का भी अध्ययन किया जाएगा।
रासायनिक अवशेष कम करने पर जोर
इस परियोजना में ऐसे विकल्पों पर ध्यान दिया जा रहा है, जिनसे पारंपरिक जहरीले फ्यूमिगेंट्स पर निर्भरता कम की जा सके। गैस आधारित तकनीकों में भंडारण वातावरण को इस तरह नियंत्रित किया जाता है कि कीटों के लिए अनुकूल परिस्थितियां समाप्त हो जाएं।
इससे अनाज में अवांछित रासायनिक अवशेषों की समस्या को कम करने और लंबे समय तक खाद्यान्न की गुणवत्ता बनाए रखने की संभावना है। हालांकि, किसी तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले उसके वैज्ञानिक परीक्षण और सुरक्षा मानकों की जांच की जाएगी।
दो चरणों में पूरी होगी परियोजना
ICAR और FCI की यह परियोजना दो चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण में करीब दो वर्षों तक ICAR-CIPHET की ओर से प्रमुख तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा। इस दौरान उनकी कीट नियंत्रण क्षमता, लागत और अनाज की गुणवत्ता पर प्रभाव का मूल्यांकन होगा।
इसके बाद दूसरे चरण में लगभग एक वर्ष तक देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इन तकनीकों के बहु-स्थान परीक्षण किए जाएंगे। इसका उद्देश्य अलग-अलग तापमान, नमी और भंडारण परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी Standard Operating Procedure (SOP) तैयार करना है।
पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गेहूं और चावल उत्पादक राज्यों के सरकारी गोदाम इन परीक्षणों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सफल परीक्षण के बाद बड़े स्तर पर हो सकता है इस्तेमाल
नई तकनीकों के परीक्षण के परिणाम आने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि इन्हें FCI के गोदामों में किस स्तर पर लागू किया जा सकता है। यदि परीक्षणों में तकनीकें प्रभावी, सुरक्षित और लागत के लिहाज से व्यवहारिक पाई जाती हैं, तो भविष्य में सरकारी गोदामों में इनके इस्तेमाल का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
इससे भंडारण के दौरान होने वाले अनाज के नुकसान को कम करने और सरकारी खाद्यान्न भंडार की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है सुरक्षित भंडारण
सरकार जब किसानों से गेहूं और चावल की खरीद MSP पर करती है, तो उसके बाद खाद्यान्न की गुणवत्ता बनाए रखना भंडारण एजेंसियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। यदि भंडारण के दौरान कीटों के कारण अनाज खराब होता है, तो इसका असर पूरी खाद्यान्न आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ सकता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक अब कटाई के बाद की तकनीकों और भंडारण प्रबंधन को भी फसल सुरक्षा जितना महत्वपूर्ण मान रहे हैं। ICAR-CIPHET पहले से ही कटाई के बाद की तकनीकों पर शोध करने वाला प्रमुख संस्थान है। इस समझौते के बाद अनाज भंडारण में वैज्ञानिक कीट नियंत्रण के क्षेत्र में इसका काम और व्यापक होने की उम्मीद है।
आने वाले समय में संस्थान की टीमें विभिन्न राज्यों में FCI के गोदामों का अध्ययन कर वहां मौजूद भंडारण व्यवस्था और तकनीकी जरूरतों का आकलन भी कर सकती हैं। इससे देश में सुरक्षित और टिकाऊ खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है।

