हरदा कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को नरवाई न जलाने की सलाह दी है। जानें फसल अवशेष प्रबंधन, वेस्ट डीकंपोजर और मिट्टी की सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी।
फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाली नरवाई को जलाने की बजाय उसका उचित प्रबंधन करने की सलाह कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने किसानों को दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार नरवाई जलाने से न केवल खेत की मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है, बल्कि वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से फसल अवशेषों को आग लगाने से बचने और आधुनिक कृषि यंत्रों तथा जैविक तकनीकों की मदद से उनका खेत में ही प्रबंधन करने की अपील की है।
नरवाई जलाने से मिट्टी को होता है नुकसान
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मुताबिक फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थ नष्ट होते हैं। इसके अलावा खेती के लिए उपयोगी सूक्ष्मजीव भी प्रभावित होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नरवाई में मौजूद कई पोषक तत्व भी आग लगाने के कारण नष्ट हो जाते हैं। इससे लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है और किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ने की संभावना रहती है।
एक टन फसल अवशेष जलाने पर कितना प्रदूषण?
विशेषज्ञों के अनुसार एक टन फसल अवशेष जलाने पर बड़ी मात्रा में प्रदूषक गैसें और कण वातावरण में पहुंचते हैं। अनुमान के मुताबिक इससे करीब:
- 3 किलोग्राम पार्टिकुलेट मैटर
- 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड
- 1460 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड
- 199 किलोग्राम राख
- 2 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड
उत्सर्जित हो सकती है।
फसल अवशेषों से निकलने वाले एरोसोल और धुएं के कण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसका असर विशेष रूप से नाक, गले और फेफड़ों पर पड़ सकता है।
नरवाई जलाने से खेत के पोषक तत्व भी होते हैं कम
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि पराली या नरवाई को आग लगाने से खेत में मौजूद महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का भी नुकसान होता है। करीब एक टन फसल अवशेष जलाने पर लगभग 10 से 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 से 40 किलोग्राम पोटाश और 5 से 7 किलोग्राम सल्फर का नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा करीब 600 से 800 किलोग्राम ऑर्गेनिक कार्बन भी नष्ट हो सकता है। इसका सीधा प्रभाव मिट्टी के स्वास्थ्य और उसकी उत्पादन क्षमता पर पड़ सकता है।
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इन कृषि यंत्रों से करें नरवाई का प्रबंधन
कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को फसल अवशेषों को खेत में ही उपयोग करने के लिए विभिन्न कृषि मशीनों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। इनमें प्रमुख रूप से:
- जीरो टिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल
- हैप्पी सीडर
- मल्चर
- स्ट्रॉ बेलर
- स्ट्रॉ रीपर
- रीपर कम बाइंडर
- हे रैक
- वेस्ट डीकंपोजर
शामिल हैं।
इन तकनीकों की मदद से फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है।
वेस्ट डीकंपोजर से जल्दी सड़ेंगे फसल अवशेष
वैज्ञानिकों के अनुसार वेस्ट डीकंपोजर नरवाई प्रबंधन का एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। इसमें मौजूद जीवाणु और कवक फसल अवशेषों को विघटित करने में सहायता करते हैं।
अवशेषों के सड़ने के बाद उनसे प्राप्त पोषक तत्व वापस मिट्टी में मिलते हैं। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है और लंबे समय में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की संभावना रहती है।
यूरिया की मदद से तेजी से होगा अपघटन
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ऑर्गेनिक कार्बन सूक्ष्मजीवों के लिए भोजन का काम करता है। नमी की पर्याप्त स्थिति में प्रति एकड़ करीब 20 से 25 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल करने से सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ सकती है और फसल अवशेषों के अपघटन की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
इससे खेत में पड़े अवशेष धीरे-धीरे मिट्टी में मिल जाते हैं और खेत की जैविक संरचना को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
मिट्टी की संरचना और जलधारण क्षमता में सुधार
फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बनाए रखने में मदद मिलती है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी की संरचना, वायु संचार और जलधारण क्षमता में सुधार हो सकता है।
इस तरह नरवाई को जलाने की बजाय खेत में ही प्रबंधित करना किसानों के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ मिट्टी की सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद हो सकता है।
किसानों के लिए नरवाई प्रबंधन क्यों जरूरी?
कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों का कहना है कि फसल अवशेषों को आग लगाने से तत्काल खेत साफ हो जाता है, लेकिन इसका नुकसान लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। मिट्टी के पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों के नुकसान के साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ता है।
इसके विपरीत नरवाई का वैज्ञानिक प्रबंधन करने से फसल अवशेषों को मिट्टी के लिए जैविक संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए किसानों को फसल अवशेष जलाने के बजाय उपलब्ध कृषि मशीनों और डीकंपोजर तकनीक का उपयोग करने की सलाह दी गई है, ताकि खेत की उर्वरता बनी रहे और खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सके।

