फतेहपुर में धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप बढ़ा है। जानें कीट की पहचान, नीम तेल और जैविक उपायों से नियंत्रण समेत कृषि विभाग की जरूरी सलाह।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में इन दिनों धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप बढ़ने की जानकारी सामने आई है। लगातार बारिश के बाद मौसम में बढ़ी गर्मी और खेतों में बनी अधिक नमी को कीट के सक्रिय होने की प्रमुख वजह माना जा रहा है। धान की फसल में कीट की मौजूदगी से किसानों की चिंता बढ़ गई है। इसे देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने और शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी है।
जिला कृषि रक्षा अधिकारी रंजीत कुमार के अनुसार पत्ती लपेटक कीट धान की पत्तियों को मोड़कर या आपस में लपेटकर उनके अंदर छिप जाता है। इसके बाद कीट पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसानों के लिए समय रहते कीट की पहचान करना और प्रबंधन शुरू करना जरूरी है।
धान में बालियां निकलने के समय बढ़ी चिंता
फतेहपुर जिले में इस समय कई क्षेत्रों में धान की फसल बालियां निकलने की अवस्था में पहुंच चुकी है। फसल की यह अवस्था उत्पादन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होती है। इस दौरान पत्ती लपेटक कीट का अधिक प्रकोप होने पर पौधों की पत्तियां प्रभावित हो सकती हैं, जिसका असर आगे दाने भरने की प्रक्रिया और संभावित उपज पर पड़ सकता है।
कृषि विभाग को जिले के अलग-अलग गांवों से पत्ती लपेटक कीट के प्रकोप से संबंधित शिकायतें मिलने के बाद किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की गई है। विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेत में पत्तियों को ध्यान से देखें और किसी भी संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नियंत्रण के उपाय अपनाएं।
शुरुआती प्रकोप में रस्सी से करें कीट नियंत्रण
पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप यदि शुरुआती चरण में है तो किसानों को तुरंत रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। कृषि विभाग के अनुसार करीब 10 से 12 मीटर लंबी रस्सी को धान के पौधों के ऊपर से धीरे-धीरे खींचकर कीट की सूंडियों को नीचे गिराया जा सकता है।
यह तरीका कम खर्च में अपनाया जा सकता है और छोटे तथा सीमांत किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। शुरुआती अवस्था में इस विधि से खेत में मौजूद कीटों की संख्या कम करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद भी अगर प्रकोप बना रहता है तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार जैविक या रासायनिक नियंत्रण का विकल्प अपनाया जा सकता है।
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नीम तेल से भी किया जा सकता है प्रबंधन
अगर धान की फसल में पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप बढ़ जाता है, तो नीम तेल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। कृषि विभाग की सलाह के अनुसार नीम तेल को 3 से 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की मात्रा में मिलाकर फसल पर छिड़काव किया जा सकता है।
इसके अलावा जैविक कीटनाशक बैसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bacillus thuringiensis) का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसकी करीब 1 से 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की मात्रा बताई गई है। हालांकि किसी भी जैविक या रासायनिक उत्पाद का प्रयोग करते समय उसके लेबल पर दिए निर्देश और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देना जरूरी है।
यूरिया और नाइट्रोजन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें
कृषि विभाग ने किसानों को धान की फसल में जरूरत से अधिक नाइट्रोजन और यूरिया डालने से बचने की सलाह दी है। अधिक नाइट्रोजन से पौधों की पत्तियां ज्यादा कोमल और हरी हो सकती हैं, जिससे कुछ कीटों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
इसलिए किसानों को मिट्टी की स्थिति और फसल की आवश्यकता के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए। संतुलित पोषण से फसल की बेहतर बढ़वार बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
छिड़काव करते समय इन बातों का रखें ध्यान
धान में कीटनाशक या जैविक उत्पाद का छिड़काव करते समय मौसम का ध्यान रखना जरूरी है। कृषि विभाग ने किसानों को तेज धूप के समय छिड़काव करने के बजाय सुबह या शाम का समय चुनने की सलाह दी है। इससे पत्तियों पर दवा के प्रभावी रूप से पहुंचने में मदद मिल सकती है।
खेत में पानी का स्तर भी फसल की स्थिति के अनुसार उचित रखना चाहिए। इसके साथ ही खेत की मेड़ों, आसपास के खरपतवार और घास-फूस की नियमित सफाई करें, क्योंकि ये कीटों के छिपने और बने रहने का स्थान बन सकते हैं।
आसपास के खेतों की भी करें निगरानी
पत्ती लपेटक कीट के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए केवल एक खेत पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं हो सकता। आसपास के खेतों में भी नियमित निरीक्षण करना जरूरी है। यदि कई खेतों में एक साथ कीट का प्रकोप दिखाई दे तो किसान सामूहिक रूप से कृषि विभाग या स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर प्रबंधन की रणनीति तैयार कर सकते हैं।
किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि वे धान की फसल में पत्तियों को नियमित रूप से जांचते रहें। शुरुआती अवस्था में कीट की पहचान होने पर कम लागत वाले उपायों से प्रकोप को नियंत्रित करने की संभावना बढ़ जाती है और फसल को होने वाले संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।

