भद्रवाह के किसान रफाकत हुसैन शेख गेंदे की खेती से सालाना 4 से 5 लाख रुपये कमा रहे हैं। जानिए कैसे फूलों की खेती ने उनकी आय और गांव के किसानों की किस्मत बदली।
जम्मू-कश्मीर की भद्रवाह घाटी में एक किसान ने पारंपरिक खेती से हटकर फूलों की खेती को आय का मजबूत साधन बना लिया है। गजोठ पंचायत के 43 वर्षीय किसान रफाकत हुसैन शेख आज गेंदे की खेती से हर साल करीब चार से पांच लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं। कभी धान और मक्का की खेती करने वाले रफाकत की यह सफलता अब इलाके के दूसरे किसानों को भी फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।
2010 में शुरू की गेंदे की खेती
रफाकत हुसैन ने वर्ष 2010 में गेंदे की खेती की शुरुआत की थी। उस समय बागवानी विभाग की ओर से उन्हें मुफ्त बीज और प्रोत्साहन मिला था। शुरुआत में उन्होंने सीमित जमीन पर फूल उगाए।
पहले ही साल उन्हें लगभग 15 हजार रुपये की आय हुई। यह रकम उनकी पारंपरिक खेती से होने वाली करीब पांच हजार रुपये की सालाना कमाई से लगभग तीन गुना अधिक थी। बेहतर आमदनी ने उन्हें फूलों की खेती का दायरा बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
30 कनाल जमीन पर करते हैं फूलों की खेती
शुरुआती सफलता के बाद रफाकत ने धीरे-धीरे खेती का क्षेत्र बढ़ाया। वर्तमान में वह करीब 30 कनाल किराये की जमीन पर गेंदे के फूल उगा रहे हैं। समय के साथ फूलों की खेती उनकी प्रमुख आजीविका बन गई।
रफाकत की सफलता का असर आसपास के किसानों पर भी पड़ा है। गजोठ क्षेत्र में करीब 400 से 500 किसान अब फूलों की खेती से जुड़ चुके हैं। इसके चलते स्थानीय स्तर पर गजोठ को जम्मू-कश्मीर की ‘गेंदे की राजधानी’ के रूप में पहचान मिलने लगी है।
भद्रवाह से जम्मू तक पहुंचते हैं गेंदे के फूल
भद्रवाह में तैयार होने वाले गेंदे के फूल रोजाना ट्रकों के माध्यम से जम्मू की मंडियों तक पहुंचाए जाते हैं। यहां इनकी प्रमुख मांग धार्मिक स्थलों पर रहती है।
रघुनाथ मंदिर और बाहु किले स्थित बावे वाली माता मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में गेंदे के फूलों का इस्तेमाल मालाएं और पूजा सामग्री तैयार करने के लिए किया जाता है।
त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान फूलों की मांग बढ़ने से किसानों को अच्छे बाजार भाव मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
धान और मक्का के मुकाबले कम पानी में तैयार होती है फसल
स्थानीय किसानों का कहना है कि गेंदे की खेती पारंपरिक धान और मक्का की तुलना में अपेक्षाकृत कम पानी और कम समय में तैयार हो जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में जहां सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं, वहां यह फसल किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प बन रही है।
फूलों की खेती के जरिए किसान अपनी आय को एक ही फसल पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग स्रोतों में बांट पा रहे हैं।
भद्रवाह की जलवायु बनी मददगार
भद्रवाह घाटी अपनी ठंडी जलवायु और ऊंचाई के कारण कई विशेष फसलों के लिए अनुकूल मानी जाती है। यही वजह है कि यहां पहले से ही लैवेंडर की खेती को पहचान मिली हुई है।
अब गेंदे की खेती ने भी क्षेत्र के कृषि परिदृश्य में अपनी जगह बना ली है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार यहां की जलवायु गेंदे के फूलों की गुणवत्ता और रंग के लिए अनुकूल है, जिसके कारण जम्मू के बाजारों और मंदिरों में इनकी मांग बनी हुई है।
बागवानी विभाग ने किसानों को दिया शुरुआती सहारा
गेंदे की खेती को बढ़ावा देने में बागवानी विभाग की भूमिका भी अहम रही है। शुरुआती चरण में किसानों को मुफ्त बीज और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया। इसके बाद कई किसानों ने अपने अनुभव और स्थानीय बाजार की मांग के आधार पर फूलों की खेती का विस्तार किया।
रफाकत हुसैन की सफलता इसी बदलाव का उदाहरण है। उनकी कहानी उन किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है, जो पारंपरिक अनाज की खेती से आगे बढ़कर अधिक मुनाफे वाली फसलों की तलाश कर रहे हैं।
परिवहन की चुनौती के बावजूद किसानों को फायदा
भद्रवाह जैसे पहाड़ी क्षेत्र में खेती की उपज को बाजार तक पहुंचाना हमेशा आसान नहीं होता। इसके बावजूद गेंदे के फूल कम समय में तोड़कर मंडियों तक भेजे जा सकते हैं।
स्थानीय किसानों के अनुसार समय पर बाजार पहुंचने के कारण फूलों को लंबे समय तक भंडारण की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहाड़ी इलाकों में फूलों की खेती को एक व्यावहारिक व्यवसाय के रूप में बढ़ावा मिल रहा है।
युवाओं में भी बढ़ रही फूलों की खेती की दिलचस्पी
गजोठ और आसपास के गांवों में युवा भी अब गेंदे की खेती को रोजगार के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। स्थानीय स्तर पर खेती से कमाई की संभावना बढ़ने से युवाओं को अपने गांव में ही स्वरोजगार शुरू करने का अवसर मिल रहा है।
रफाकत हुसैन की सफलता ने यह दिखाया है कि सही फसल का चुनाव, बाजार की मांग और सरकारी सहयोग मिलकर पारंपरिक खेती की तुलना में किसानों की आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
फूलों की खेती का रकबा बढ़ाने की तैयारी
स्थानीय बागवानी अधिकारियों के अनुसार आने वाले समय में क्षेत्र में फूलों की खेती का रकबा बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य अधिक किसानों को गेंदे जैसी लाभकारी फसलों से जोड़ना और ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए अवसर पैदा करना है।
भद्रवाह में गेंदे की खेती अब केवल एक वैकल्पिक फसल नहीं रह गई है। रफाकत हुसैन जैसे किसानों की सफलता के बाद यह पहाड़ी क्षेत्र में किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने का एक नया माध्यम बनती दिखाई दे रही है।

